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छोटे बच्चों का ब्लड शुगर लेवल कितना होना चाहिए? डॉक्टर से जान लीजिए काम की बात

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Normal Sugar Levels for Kids: डॉक्टर के अनुसार बच्चों का सामान्य फास्टिंग ब्लड शुगर लेवल 70 से 100 mg/dL के बीच सामान्य माना जाता है. बार-बार प्यास लगना, ज्यादा पेशाब आना और थकान जैसे लक्षण ब्लड शुगर गड़बड़ी का संकेत हो सकते हैं. बैलेंस्ड डाइट, नियमित जांच और एक्टिव लाइफस्टाइल से बच्चों को स्वस्थ रखने में मदद मिल सकती है.

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बच्चों का ब्लड शुगर लेवल लगभग 70 से 100 mg/dL के बीच सामान्य माना जाता है.

Children’s Blood Sugar Levels: अधिकतर वयस्क समय-समय पर अपना ब्लड शुगर लेवल चेक करते हैं, ताकि डायबिटीज जैसी बीमारी से बचने में मदद मिल सके. आमतौर पर 40 साल के बाद लोग डायबिटीज को लेकर विशेष सतर्कता बरतते हैं. हेल्थ एक्सपर्ट्स की मानें तो आजकल कई बच्चों को भी यह बीमारी होने लगी है. पैरेंट्स को समय-समय पर अपने बच्चों के ब्लड शुगर लेवल का भी टेस्ट कराना चाहिए, ताकि उनकी सेहत की मॉनिटरिंग की जा सके. ऐसे में यह समझना जरूरी है कि बच्चों के लिए सामान्य ब्लड शुगर लेवल कितना होना चाहिए और कब इसे असामान्य माना जाता है.

नई दिल्ली के सर गंगाराम हॉस्पिटल के प्रिवेंटिव हेल्थ एंड वेलनेस डिपार्टमेंट की डायरेक्टर डॉ. सोनिया रावत ने News18 को बताया स्वस्थ बच्चों में ब्लड शुगर लेवल आमतौर पर वयस्कों की तरह ही एक तय सीमा में रहता है. फास्टिंग यानी खाली पेट बच्चों का ब्लड शुगर लगभग 70 से 100 mg/dL के बीच सामान्य माना जाता है. खाने के बाद यह स्तर आमतौर पर 140 mg/dL से कम रहना चाहिए. बच्चों में ब्लड शुगर लेवल का बार-बार कम या ज्यादा होना सामान्य नहीं माना जाता. अगर ब्लड शुगर बहुत कम हो जाए, तो बच्चे में कमजोरी, चक्कर आना, पसीना आना, चिड़चिड़ापन या बेहोशी जैसे लक्षण दिख सकते हैं. वहीं अगर ब्लड शुगर लगातार ज्यादा रहे, तो यह डायबिटीज का संकेत हो सकता है, जिसे नजरअंदाज नहीं करना चाहिए.

डॉक्टर के मुताबिक टाइप 1 डायबिटीज बच्चों में होने वाली बीमारी है, जिसमें शरीर इंसुलिन बनाना बंद कर देता है. ऐसे मामलों में बच्चों को इंसुलिन थेरेपी और नियमित मॉनिटरिंग की जरूरत होती है. कुछ मामलों में टाइप 2 डायबिटीज भी देखने को मिल सकती है, जो मोटापा, गलत खानपान और कम शारीरिक गतिविधि से जुड़ी होती है. बच्चों का ब्लड शुगर केवल खानपान पर ही नहीं, बल्कि उनकी एक्टिविटी, तनाव और बीमारी की स्थिति पर भी निर्भर करता है. अगर बच्चा बहुत ज्यादा मीठा खाता है, फिजिकल एक्टिविटी कम करता है या बार-बार कान महसूस करता है, तो ब्लड शुगर की जांच कराना जरूरी हो सकता है.

एक्सपर्ट की मानें तो बच्चों के आहार में संतुलन होना चाहिए. साबुत अनाज, फल, सब्जियां और प्रोटीन से भरपूर भोजन ब्लड शुगर को कंट्रोल रखने में मदद कर सकता है. शुगरी ड्रिंक्स, जंक फूड और अत्यधिक प्रोसेस्ड फूड से बचना बेहतर माना जाता है. अगर किसी बच्चे में बार-बार प्यास लगना, ज्यादा पेशाब आना, अचानक वजन कम होना या थकान जैसे लक्षण दिखें, तो यह डायबिटीज का संकेत हो सकता है और तुरंत डॉक्टर से संपर्क करना चाहिए. शुरुआती पहचान और सही इलाज से बच्चों में ब्लड शुगर की समस्याओं को प्रभावी रूप से कंट्रोल किया जा सकता है.

सेहत, रिलेशनशिप, लाइफ या धर्म-ज्योतिष से जुड़ी है कोई निजी उलझन तो हमें करें WhatsApp, आपका नाम गोपनीय रखकर देंगे जानकारी.

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अमित उपाध्याय

अमित उपाध्याय News18 हिंदी की लाइफस्टाइल टीम के अनुभवी पत्रकार हैं, जिनके पास प्रिंट और डिजिटल मीडिया में 9 वर्षों से अधिक का अनुभव है। वे हेल्थ, वेलनेस और लाइफस्टाइल से जुड़ी रिसर्च-बेस्ड और डॉक्टर्स के इंटरव्…और पढ़ें

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Children’s Blood Sugar Levels: अधिकतर वयस्क समय-समय पर अपना ब्लड शुगर लेवल चेक करते हैं, ताकि डायबिटीज जैसी बीमारी से बचने में मदद मिल सके. आमतौर पर 40 साल के बाद लोग डायबिटीज को लेकर विशेष सतर्कता बरतते हैं. हेल्थ एक्सपर्ट्स की मानें तो आजकल कई बच्चों को भी यह बीमारी होने लगी है. पैरेंट्स को समय-समय पर अपने बच्चों के ब्लड शुगर लेवल का भी टेस्ट कराना चाहिए, ताकि उनकी सेहत की मॉनिटरिंग की जा सके. ऐसे में यह समझना जरूरी है कि बच्चों के लिए सामान्य ब्लड शुगर लेवल कितना होना चाहिए और कब इसे असामान्य माना जाता है.

नई दिल्ली के सर गंगाराम हॉस्पिटल के प्रिवेंटिव हेल्थ एंड वेलनेस डिपार्टमेंट की डायरेक्टर डॉ. सोनिया रावत ने News18 को बताया स्वस्थ बच्चों में ब्लड शुगर लेवल आमतौर पर वयस्कों की तरह ही एक तय सीमा में रहता है. फास्टिंग यानी खाली पेट बच्चों का ब्लड शुगर लगभग 70 से 100 mg/dL के बीच सामान्य माना जाता है. खाने के बाद यह स्तर आमतौर पर 140 mg/dL से कम रहना चाहिए. बच्चों में ब्लड शुगर लेवल का बार-बार कम या ज्यादा होना सामान्य नहीं माना जाता. अगर ब्लड शुगर बहुत कम हो जाए, तो बच्चे में कमजोरी, चक्कर आना, पसीना आना, चिड़चिड़ापन या बेहोशी जैसे लक्षण दिख सकते हैं. वहीं अगर ब्लड शुगर लगातार ज्यादा रहे, तो यह डायबिटीज का संकेत हो सकता है, जिसे नजरअंदाज नहीं करना चाहिए.

डॉक्टर के मुताबिक टाइप 1 डायबिटीज बच्चों में होने वाली बीमारी है, जिसमें शरीर इंसुलिन बनाना बंद कर देता है. ऐसे मामलों में बच्चों को इंसुलिन थेरेपी और नियमित मॉनिटरिंग की जरूरत होती है. कुछ मामलों में टाइप 2 डायबिटीज भी देखने को मिल सकती है, जो मोटापा, गलत खानपान और कम शारीरिक गतिविधि से जुड़ी होती है. बच्चों का ब्लड शुगर केवल खानपान पर ही नहीं, बल्कि उनकी एक्टिविटी, तनाव और बीमारी की स्थिति पर भी निर्भर करता है. अगर बच्चा बहुत ज्यादा मीठा खाता है, फिजिकल एक्टिविटी कम करता है या बार-बार कान महसूस करता है, तो ब्लड शुगर की जांच कराना जरूरी हो सकता है.

एक्सपर्ट की मानें तो बच्चों के आहार में संतुलन होना चाहिए. साबुत अनाज, फल, सब्जियां और प्रोटीन से भरपूर भोजन ब्लड शुगर को कंट्रोल रखने में मदद कर सकता है. शुगरी ड्रिंक्स, जंक फूड और अत्यधिक प्रोसेस्ड फूड से बचना बेहतर माना जाता है. अगर किसी बच्चे में बार-बार प्यास लगना, ज्यादा पेशाब आना, अचानक वजन कम होना या थकान जैसे लक्षण दिखें, तो यह डायबिटीज का संकेत हो सकता है और तुरंत डॉक्टर से संपर्क करना चाहिए. शुरुआती पहचान और सही इलाज से बच्चों में ब्लड शुगर की समस्याओं को प्रभावी रूप से कंट्रोल किया जा सकता है.

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अमित उपाध्याय News18 हिंदी की लाइफस्टाइल टीम के अनुभवी पत्रकार हैं, जिनके पास प्रिंट और डिजिटल मीडिया में 9 वर्षों से अधिक का अनुभव है। वे हेल्थ, वेलनेस और लाइफस्टाइल से जुड़ी रिसर्च-बेस्ड और डॉक्टर्स के इंटरव्…और पढ़ें

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