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Bhojshala Temple Dispute: 95-Year-Old Shares Unheard Struggle

Bhojshala Temple Dispute: 95-Year-Old Shares Unheard Struggle

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यह कहते हुए 95 साल के विमल गोधा की आंखें चमक जाती हैं। गोधा उन लोगों में शामिल हैं जिन्होंने भोजशाला को वाग्देवी का मंदिर साबित करने के लिए संघर्ष किया। भोज उत्सव समिति ने भी इसमें बढ़चढ़कर हिस्सा लिया।

समिति के संरक्षक अशोक कुमार जैन ने भोजशाला में हनुमान चालीसा पाठ की शुरुआत कराई थी। 16 मई को हाईकोर्ट की इंदौर बेंच ने भोजशाला को वाग्देवी का मंदिर माना। फैसले के बाद भास्कर ने आंदोलन से जुड़े लोगों से बात की, जिन्होंने संघर्ष की यादें साझा कीं।

हाईकोर्ट के फैसले के बाद भोजशाला के बाहर खुशियां मनाते हिंदू संगठन के कार्यकर्ता।

सियासत और दमन का दौर विमल गोधा बताते हैं कि 1993 से 2003 के बीच दिग्विजय सिंह के नेतृत्व वाली कांग्रेस सरकार में आंदोलनकारियों और प्रशासन के बीच सीधा टकराव होता था। उस दौर में धारा 144, एहतियाती गिरफ्तारियां और बाहरी संतों के प्रवेश पर रोक आम थी।

विश्व हिंदू परिषद और बजरंग दल के कार्यकर्ताओं पर ‘शांति भंग’ के आरोप में कई मुकदमे दर्ज हुए। आंदोलनकारियों का आरोप था कि सरकार हिंदू पूजा अधिकारों को नियंत्रित कर रही थी, जबकि प्रशासन इसे सांप्रदायिक सद्भाव बनाए रखने की कवायद बताता था।

2003 का वो खौफनाक मंजर विमल बताते हैं कि यह संघर्ष केवल पुरुषों का नहीं था। इसमें महिलाओं ने भी अभूतपूर्व साहस दिखाया। 2003 के लाठीचार्ज को याद करते हुए वे कहते हैं, उस दिन बसंत पंचमी थी।

हम भोजशाला में पूजा करना चाहते थे, लेकिन दिग्विजय सरकार ने हमें रोकने के लिए भारी पुलिस बल तैनात किया था। हमने चार समूह बनाए थे ताकि अलग-अलग रास्तों से भोजशाला पहुंच सकें।

इस आंदोलन के बाद मिली पूजा की इजाजत गोधा बताते हैं कि इसमें महिलाओं को भी नहीं बख्शा गया। उस आंदोलन के बाद हर मंगलवार हिंदुओं को भोजशाला में आरती की परमिशन मिली थी। पांचवीं कक्षा से भोजशाला जा रहे विमल गोधा आज भी हर मंगलवार आरती में शामिल होते हैं। उनके लिए जीते-जी कोर्ट का फैसला देखना किसी सौभाग्य से कम नहीं है।

तस्वीर 2003 की है। विमल गोधा पुलिस को चकमा देकर भोजशाला की तरफ भागे थे।

तस्वीर 2003 की है। विमल गोधा पुलिस को चकमा देकर भोजशाला की तरफ भागे थे।

बचपन के बस्ते से सत्याग्रह तक का सफर भोज उत्सव समिति के संरक्षक अशोक कुमार जैन की कहानी भी ऐसी ही है। 1965 से आंदोलन से जुड़े अशोक बताते हैं कि बचपन में वे स्कूल से सीधे भोजशाला पहुंच जाते थे। वे कहते हैं, हम बसंत पंचमी मनाना और पूजा करना चाहते थे, लेकिन तत्कालीन कांग्रेस सरकार के समय हमें बाहर धकेला जाता था और झूठे केस लगाए जाते थे।

1992 में साध्वी ऋतंभरा के आह्वान के बाद यहां हर मंगलवार हनुमान चालीसा पाठ शुरू हुआ। दिग्विजय सिंह सरकार के दौरान इस पर प्रतिबंध लगा तो आंदोलन और उग्र हो गया। अंततः 4 अप्रैल 2003 को एएसआई के आदेश के बाद यहां नियमित पूजा-अर्चना का मार्ग प्रशस्त हुआ।

विवाद की जड़ें: राजा भोज से ब्रिटिश म्यूजियम तक भोजशाला का इतिहास 11वीं सदी के राजा भोज से जुड़ा है। उन्होंने इसे संस्कृत शिक्षा और कला के केंद्र के रूप में स्थापित किया था। यहां मां सरस्वती (वाग्देवी) का भव्य मंदिर था। बाद में यहां कमाल मौला मस्जिद बनी, जिससे यह स्थल दो समुदायों के दावे का केंद्र बन गया।

वाग्देवी की ‘घर वापसी’ का इंतजार इस विवाद का सबसे भावुक पहलू मां वाग्देवी की वह प्रतिमा है, जिसे 1875-1880 के आसपास ब्रिटिश अधिकारी भारत से लंदन ले गए थे। काले पत्थर की यह सुंदर प्रतिमा आज ब्रिटिश म्यूजियम में रखी है। हिंदू संगठनों का मानना है कि जब तक मूल प्रतिमा वापस नहीं आती, संघर्ष अधूरा है।

फिलहाल, ग्वालियर में एक नई प्रतिमा तैयार कराई गई है, जिसे प्रतीक स्वरूप स्थापित करने की योजना है।

ब्रिटिश म्यूजियम ग्रेट रसल स्ट्रीट में मां वाग्देवी की यह प्रतिमा रखी हुई है।

ब्रिटिश म्यूजियम ग्रेट रसल स्ट्रीट में मां वाग्देवी की यह प्रतिमा रखी हुई है।

ऐसे चला कोर्ट में मामला….

साल 2022 में याचिका दायर यह मामला 2022 में तब शुरू हुआ था, जब रंजना अग्निहोत्री और उनके साथियों ने हिंदू फ्रंट फॉर जस्टिस की ओर से हाईकोर्ट में याचिका दायर कर भोजशाला का धार्मिक स्वरूप तय करने और हिंदू समाज को पूर्ण अधिकार देने की मांग की थी। इसी प्रकरण में 2024 में भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण विभाग ने भोजशाला परिसर का 98 दिन तक वैज्ञानिक सर्वेक्षण किया था।

इसके बाद 23 जनवरी 2026 को वसंत पंचमी पर सुप्रीम कोर्ट ने दिनभर निर्बाध पूजा-अर्चना की अनुमति दी थी। 6 अप्रैल 2026 से हाईकोर्ट में नियमित सुनवाई शुरू हुई, जो 12 मई तक चली।

हिंदू पक्ष ने मंदिर होने के तर्क दिए 6 से 9 अप्रैल तक हिंदू पक्ष की ओर से विष्णु शंकर जैन, विनय जोशी और मुख्य याचिकाकर्ता आशीष गोयल ने भोजशाला को मंदिर बताते हुए तर्क रखे। याचिकाकर्ता पक्ष ने कोर्ट में कई ऐतिहासिक और पुरातात्विक साक्ष्य भी पेश किए। इनमें ASI सर्वेक्षणों और ऐतिहासिक अभिलेखों में मंदिर स्थापत्य के अवशेष, स्तंभ, शिलालेख और देवी सरस्वती से जुड़े प्रतीकों का उल्लेख शामिल था।

याचिकाकर्ताओं ने दावा किया कि ब्रिटिशकालीन गजेटियर और इतिहासकारों के दस्तावेजों में भोजशाला को मां सरस्वती का मंदिर और विद्या केंद्र बताया गया है। साथ ही परिसर में संस्कृत और प्राचीन नागरी लिपि के शिलालेख मिलने तथा लंबे समय से वसंत पंचमी सहित अन्य अवसरों पर पूजा-अर्चना की परंपरा का भी हवाला दिया गया।

याचिकाकर्ता पक्ष का कहना था कि परिसर के कई संरचनात्मक तत्व इस्लामी स्थापत्य से पहले के हैं, जो मंदिर स्वरूप की ओर संकेत करते हैं। मुख्य याचिका के साथ चार अन्य याचिकाएं और एक अपील भी क्लब की गई थीं।

मुस्लिम पक्ष ने सर्वे रिपोर्ट पर उठाए सवाल मुस्लिम पक्ष ने कोर्ट में तर्क दिया था कि परिसर लंबे समय से कमाल मौला मस्जिद के रूप में उपयोग में रहा है और धार्मिक स्वरूप तय करने का अधिकार सिविल कोर्ट को है। सुप्रीम कोर्ट के वरिष्ठ अधिवक्ता सलमान खुर्शीद ने ASI सर्वे रिपोर्ट पर सवाल उठाते हुए कहा कि सर्वे के दौरान उपलब्ध कराई गई तस्वीरें और वीडियोग्राफी स्पष्ट नहीं थीं।

उन्होंने यह भी कहा कि अयोध्या मामले के विपरीत भोजशाला में कोई स्थापित मूर्ति मौजूद नहीं है।

फैसले की 7 बड़ी बातें…

  1. धार्मिक चरित्र मंदिर का: कोर्ट ने माना कि भोजशाला पहले हिंदू मंदिर और संस्कृत शिक्षा केंद्र था। इसके लिए ASI की रिपोर्ट और पुराने दस्तावेजों को आधार बनाया गया।
  2. वक्फ संपत्ति का दावा खारिज: कोर्ट ने वक्फ संपत्ति वाला दावा नहीं माना। कोर्ट ने कहा कि यह साबित करने के पर्याप्त सबूत नहीं मिले कि यह वक्फ की जमीन है।
  3. एएसआई की रिपोर्ट अहम: ASI की रिपोर्ट को कोर्ट ने अहम माना। रिपोर्ट में मूर्तियां, शिलालेख और मंदिर शैली के स्तंभों का जिक्र किया गया है।
  4. जैन समुदाय का दावा अमान्य: जैन समुदाय का दावा भी खारिज कर दिया गया। कोर्ट ने नहीं माना कि यह मूल रूप से जैन मंदिर था।
  5. प्लेसेस ऑफ वर्शिप एक्ट: प्लेसेस ऑफ वर्शिप एक्ट यहां लागू नहीं होगा। कोर्ट ने कहा कि भोजशाला 1904 से संरक्षित स्मारक है, इसलिए यह उस कानून से बाहर है।
  6. अयोध्या फैसले का जिक्र: कोर्ट ने अयोध्या मामले में सुप्रीम कोर्ट द्वारा तय सिद्धांतों का हवाला दिया। इनमें एएसआई रिपोर्ट के महत्व के आधार पर निर्णय शामिल है।
  7. मूर्ति की पुनर्स्थापना: कोर्ट ने अयोध्या फैसले का भी हवाला दिया। फैसले में ASI रिपोर्ट और ऐतिहासिक सबूतों के महत्व का जिक्र किया गया।
भोजशाला परिसर में शुक्रवार को नमाज पढ़ी जाती है।

भोजशाला परिसर में शुक्रवार को नमाज पढ़ी जाती है।

ये भी जान लीजिए…

सवाल- भोजशाला परिसर पर अब हिंदुओं का अधिकार हो जाएगा?

  • भोजशाला पर सिर्फ हिंदुओं का कब्जा नहीं होगा। यह एक संरक्षित स्मारक है और इसकी देखरेख ASI ही करेगी।

सवाल- अब भोजशाला में शुक्रवार को नमाज नहीं पढ़ी जाएगी?

  • हाई कोर्ट ने 2003 का वह नियम हटा दिया है, जिसमें शुक्रवार को नमाज की अनुमति थी। प्रशासन को कोर्ट का आदेश मानना होगा।

सवाल- तो क्या अब वहां रोज पूजा हो सकेगी?

  • कोर्ट ने भोजशाला को हिंदू मंदिर और संस्कृत पाठशाला माना है। पहले मंगलवार को पूजा होती थी, अब हर दिन पूजा की जा सकेगी।

सवाल- हाई कोर्ट के फैसले को सुप्रीम कोर्ट में चुनौती दी जा सकती है?

  • जिस पक्ष को फैसले से आपत्ति होगी, वह SLP (Special Leave Petition) दाखिल कर सकता है।

ये खबर भी पढ़ें…

1. भोजशाला फैसले के बाद नई कानूनी जंग की तैयारी

चर्चित धार के भोजशाला मामले में मध्य प्रदेश हाई कोर्ट की इंदौर बेंच द्वारा हिंदू पक्ष में फैसला सुनाए जाने के बाद अब इस कानूनी लड़ाई का अगला पड़ाव सुप्रीम कोर्ट बनने जा रहा है। मुस्लिम पक्ष और जैन समाज से जुड़े पक्षकारों ने साफ संकेत दिए हैं कि वे फैसले को सुप्रीम कोर्ट में चुनौती देंगे। पढ़ें पूरी खबर…

2. वो 15 तस्वीरें देखिए जो मंदिर होने का आधार बनीं

मध्य प्रदेश के धार की भोजशाला मामले में हाईकोर्ट ने शुक्रवार को फैसला सुना दिया। कोर्ट ने भोजशाला को वाग्देवी मंदिर माना है। इस मामले में भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण (ASI) की रिपोर्ट और कोर्ट में पेश की गईं 15 तस्वीरें अहम आधार बनीं। पढ़ें पूरी खबर…

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Bhojshala Temple Dispute: 95-Year-Old Shares Unheard Struggle

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यह कहते हुए 95 साल के विमल गोधा की आंखें चमक जाती हैं। गोधा उन लोगों में शामिल हैं जिन्होंने भोजशाला को वाग्देवी का मंदिर साबित करने के लिए संघर्ष किया। भोज उत्सव समिति ने भी इसमें बढ़चढ़कर हिस्सा लिया।

समिति के संरक्षक अशोक कुमार जैन ने भोजशाला में हनुमान चालीसा पाठ की शुरुआत कराई थी। 16 मई को हाईकोर्ट की इंदौर बेंच ने भोजशाला को वाग्देवी का मंदिर माना। फैसले के बाद भास्कर ने आंदोलन से जुड़े लोगों से बात की, जिन्होंने संघर्ष की यादें साझा कीं।

हाईकोर्ट के फैसले के बाद भोजशाला के बाहर खुशियां मनाते हिंदू संगठन के कार्यकर्ता।

सियासत और दमन का दौर विमल गोधा बताते हैं कि 1993 से 2003 के बीच दिग्विजय सिंह के नेतृत्व वाली कांग्रेस सरकार में आंदोलनकारियों और प्रशासन के बीच सीधा टकराव होता था। उस दौर में धारा 144, एहतियाती गिरफ्तारियां और बाहरी संतों के प्रवेश पर रोक आम थी।

विश्व हिंदू परिषद और बजरंग दल के कार्यकर्ताओं पर ‘शांति भंग’ के आरोप में कई मुकदमे दर्ज हुए। आंदोलनकारियों का आरोप था कि सरकार हिंदू पूजा अधिकारों को नियंत्रित कर रही थी, जबकि प्रशासन इसे सांप्रदायिक सद्भाव बनाए रखने की कवायद बताता था।

2003 का वो खौफनाक मंजर विमल बताते हैं कि यह संघर्ष केवल पुरुषों का नहीं था। इसमें महिलाओं ने भी अभूतपूर्व साहस दिखाया। 2003 के लाठीचार्ज को याद करते हुए वे कहते हैं, उस दिन बसंत पंचमी थी।

हम भोजशाला में पूजा करना चाहते थे, लेकिन दिग्विजय सरकार ने हमें रोकने के लिए भारी पुलिस बल तैनात किया था। हमने चार समूह बनाए थे ताकि अलग-अलग रास्तों से भोजशाला पहुंच सकें।

इस आंदोलन के बाद मिली पूजा की इजाजत गोधा बताते हैं कि इसमें महिलाओं को भी नहीं बख्शा गया। उस आंदोलन के बाद हर मंगलवार हिंदुओं को भोजशाला में आरती की परमिशन मिली थी। पांचवीं कक्षा से भोजशाला जा रहे विमल गोधा आज भी हर मंगलवार आरती में शामिल होते हैं। उनके लिए जीते-जी कोर्ट का फैसला देखना किसी सौभाग्य से कम नहीं है।

तस्वीर 2003 की है। विमल गोधा पुलिस को चकमा देकर भोजशाला की तरफ भागे थे।

तस्वीर 2003 की है। विमल गोधा पुलिस को चकमा देकर भोजशाला की तरफ भागे थे।

बचपन के बस्ते से सत्याग्रह तक का सफर भोज उत्सव समिति के संरक्षक अशोक कुमार जैन की कहानी भी ऐसी ही है। 1965 से आंदोलन से जुड़े अशोक बताते हैं कि बचपन में वे स्कूल से सीधे भोजशाला पहुंच जाते थे। वे कहते हैं, हम बसंत पंचमी मनाना और पूजा करना चाहते थे, लेकिन तत्कालीन कांग्रेस सरकार के समय हमें बाहर धकेला जाता था और झूठे केस लगाए जाते थे।

1992 में साध्वी ऋतंभरा के आह्वान के बाद यहां हर मंगलवार हनुमान चालीसा पाठ शुरू हुआ। दिग्विजय सिंह सरकार के दौरान इस पर प्रतिबंध लगा तो आंदोलन और उग्र हो गया। अंततः 4 अप्रैल 2003 को एएसआई के आदेश के बाद यहां नियमित पूजा-अर्चना का मार्ग प्रशस्त हुआ।

विवाद की जड़ें: राजा भोज से ब्रिटिश म्यूजियम तक भोजशाला का इतिहास 11वीं सदी के राजा भोज से जुड़ा है। उन्होंने इसे संस्कृत शिक्षा और कला के केंद्र के रूप में स्थापित किया था। यहां मां सरस्वती (वाग्देवी) का भव्य मंदिर था। बाद में यहां कमाल मौला मस्जिद बनी, जिससे यह स्थल दो समुदायों के दावे का केंद्र बन गया।

वाग्देवी की ‘घर वापसी’ का इंतजार इस विवाद का सबसे भावुक पहलू मां वाग्देवी की वह प्रतिमा है, जिसे 1875-1880 के आसपास ब्रिटिश अधिकारी भारत से लंदन ले गए थे। काले पत्थर की यह सुंदर प्रतिमा आज ब्रिटिश म्यूजियम में रखी है। हिंदू संगठनों का मानना है कि जब तक मूल प्रतिमा वापस नहीं आती, संघर्ष अधूरा है।

फिलहाल, ग्वालियर में एक नई प्रतिमा तैयार कराई गई है, जिसे प्रतीक स्वरूप स्थापित करने की योजना है।

ब्रिटिश म्यूजियम ग्रेट रसल स्ट्रीट में मां वाग्देवी की यह प्रतिमा रखी हुई है।

ब्रिटिश म्यूजियम ग्रेट रसल स्ट्रीट में मां वाग्देवी की यह प्रतिमा रखी हुई है।

ऐसे चला कोर्ट में मामला….

साल 2022 में याचिका दायर यह मामला 2022 में तब शुरू हुआ था, जब रंजना अग्निहोत्री और उनके साथियों ने हिंदू फ्रंट फॉर जस्टिस की ओर से हाईकोर्ट में याचिका दायर कर भोजशाला का धार्मिक स्वरूप तय करने और हिंदू समाज को पूर्ण अधिकार देने की मांग की थी। इसी प्रकरण में 2024 में भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण विभाग ने भोजशाला परिसर का 98 दिन तक वैज्ञानिक सर्वेक्षण किया था।

इसके बाद 23 जनवरी 2026 को वसंत पंचमी पर सुप्रीम कोर्ट ने दिनभर निर्बाध पूजा-अर्चना की अनुमति दी थी। 6 अप्रैल 2026 से हाईकोर्ट में नियमित सुनवाई शुरू हुई, जो 12 मई तक चली।

हिंदू पक्ष ने मंदिर होने के तर्क दिए 6 से 9 अप्रैल तक हिंदू पक्ष की ओर से विष्णु शंकर जैन, विनय जोशी और मुख्य याचिकाकर्ता आशीष गोयल ने भोजशाला को मंदिर बताते हुए तर्क रखे। याचिकाकर्ता पक्ष ने कोर्ट में कई ऐतिहासिक और पुरातात्विक साक्ष्य भी पेश किए। इनमें ASI सर्वेक्षणों और ऐतिहासिक अभिलेखों में मंदिर स्थापत्य के अवशेष, स्तंभ, शिलालेख और देवी सरस्वती से जुड़े प्रतीकों का उल्लेख शामिल था।

याचिकाकर्ताओं ने दावा किया कि ब्रिटिशकालीन गजेटियर और इतिहासकारों के दस्तावेजों में भोजशाला को मां सरस्वती का मंदिर और विद्या केंद्र बताया गया है। साथ ही परिसर में संस्कृत और प्राचीन नागरी लिपि के शिलालेख मिलने तथा लंबे समय से वसंत पंचमी सहित अन्य अवसरों पर पूजा-अर्चना की परंपरा का भी हवाला दिया गया।

याचिकाकर्ता पक्ष का कहना था कि परिसर के कई संरचनात्मक तत्व इस्लामी स्थापत्य से पहले के हैं, जो मंदिर स्वरूप की ओर संकेत करते हैं। मुख्य याचिका के साथ चार अन्य याचिकाएं और एक अपील भी क्लब की गई थीं।

मुस्लिम पक्ष ने सर्वे रिपोर्ट पर उठाए सवाल मुस्लिम पक्ष ने कोर्ट में तर्क दिया था कि परिसर लंबे समय से कमाल मौला मस्जिद के रूप में उपयोग में रहा है और धार्मिक स्वरूप तय करने का अधिकार सिविल कोर्ट को है। सुप्रीम कोर्ट के वरिष्ठ अधिवक्ता सलमान खुर्शीद ने ASI सर्वे रिपोर्ट पर सवाल उठाते हुए कहा कि सर्वे के दौरान उपलब्ध कराई गई तस्वीरें और वीडियोग्राफी स्पष्ट नहीं थीं।

उन्होंने यह भी कहा कि अयोध्या मामले के विपरीत भोजशाला में कोई स्थापित मूर्ति मौजूद नहीं है।

फैसले की 7 बड़ी बातें…

  1. धार्मिक चरित्र मंदिर का: कोर्ट ने माना कि भोजशाला पहले हिंदू मंदिर और संस्कृत शिक्षा केंद्र था। इसके लिए ASI की रिपोर्ट और पुराने दस्तावेजों को आधार बनाया गया।
  2. वक्फ संपत्ति का दावा खारिज: कोर्ट ने वक्फ संपत्ति वाला दावा नहीं माना। कोर्ट ने कहा कि यह साबित करने के पर्याप्त सबूत नहीं मिले कि यह वक्फ की जमीन है।
  3. एएसआई की रिपोर्ट अहम: ASI की रिपोर्ट को कोर्ट ने अहम माना। रिपोर्ट में मूर्तियां, शिलालेख और मंदिर शैली के स्तंभों का जिक्र किया गया है।
  4. जैन समुदाय का दावा अमान्य: जैन समुदाय का दावा भी खारिज कर दिया गया। कोर्ट ने नहीं माना कि यह मूल रूप से जैन मंदिर था।
  5. प्लेसेस ऑफ वर्शिप एक्ट: प्लेसेस ऑफ वर्शिप एक्ट यहां लागू नहीं होगा। कोर्ट ने कहा कि भोजशाला 1904 से संरक्षित स्मारक है, इसलिए यह उस कानून से बाहर है।
  6. अयोध्या फैसले का जिक्र: कोर्ट ने अयोध्या मामले में सुप्रीम कोर्ट द्वारा तय सिद्धांतों का हवाला दिया। इनमें एएसआई रिपोर्ट के महत्व के आधार पर निर्णय शामिल है।
  7. मूर्ति की पुनर्स्थापना: कोर्ट ने अयोध्या फैसले का भी हवाला दिया। फैसले में ASI रिपोर्ट और ऐतिहासिक सबूतों के महत्व का जिक्र किया गया।
भोजशाला परिसर में शुक्रवार को नमाज पढ़ी जाती है।

भोजशाला परिसर में शुक्रवार को नमाज पढ़ी जाती है।

ये भी जान लीजिए…

सवाल- भोजशाला परिसर पर अब हिंदुओं का अधिकार हो जाएगा?

  • भोजशाला पर सिर्फ हिंदुओं का कब्जा नहीं होगा। यह एक संरक्षित स्मारक है और इसकी देखरेख ASI ही करेगी।

सवाल- अब भोजशाला में शुक्रवार को नमाज नहीं पढ़ी जाएगी?

  • हाई कोर्ट ने 2003 का वह नियम हटा दिया है, जिसमें शुक्रवार को नमाज की अनुमति थी। प्रशासन को कोर्ट का आदेश मानना होगा।

सवाल- तो क्या अब वहां रोज पूजा हो सकेगी?

  • कोर्ट ने भोजशाला को हिंदू मंदिर और संस्कृत पाठशाला माना है। पहले मंगलवार को पूजा होती थी, अब हर दिन पूजा की जा सकेगी।

सवाल- हाई कोर्ट के फैसले को सुप्रीम कोर्ट में चुनौती दी जा सकती है?

  • जिस पक्ष को फैसले से आपत्ति होगी, वह SLP (Special Leave Petition) दाखिल कर सकता है।

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1. भोजशाला फैसले के बाद नई कानूनी जंग की तैयारी

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2. वो 15 तस्वीरें देखिए जो मंदिर होने का आधार बनीं

मध्य प्रदेश के धार की भोजशाला मामले में हाईकोर्ट ने शुक्रवार को फैसला सुना दिया। कोर्ट ने भोजशाला को वाग्देवी मंदिर माना है। इस मामले में भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण (ASI) की रिपोर्ट और कोर्ट में पेश की गईं 15 तस्वीरें अहम आधार बनीं। पढ़ें पूरी खबर…

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