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अल्ट्रा-रिच का ट्रेंड:अमीर लोग दर्जनों-सैकड़ों बच्चे पैदा करने को ‘प्रोजेक्ट’ मान रहे; यह वंश बचाने नहीं, शक्ति-प्रभाव का नया प्रतीक बना

अल्ट्रा-रिच का ट्रेंड:अमीर लोग दर्जनों-सैकड़ों बच्चे पैदा करने को ‘प्रोजेक्ट’ मान रहे; यह वंश बचाने नहीं, शक्ति-प्रभाव का नया प्रतीक बना
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  • Wealthy People Are Treating Having Dozens And Hundreds Of Children As A ‘project’; It’s Not About Preserving Lineage, But Rather About Becoming A New Symbol Of Power And Influence.

द न्यू यॉर्क टाइम्स. वॉशिंगटन8 मिनट पहले

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मीडिया रिपोर्टों में कहीं स्पर्म डोनेशन से 100 से ज्यादा बच्चे, कहीं 200 बच्चों की इच्छा तो कहीं 300 बच्चे पैदा करने के दावे सामने आए हैं। इस ट्रेंड को ‘किडमैक्सिंग’ कहा जा रहा है। – प्रतीकात्मक फोटो

विकसित देशों में जन्मदर रिकॉर्ड निचले स्तर पर है। बहुत से लोग कहते हैं कि वे एक बच्चे का खर्च नहीं उठा पा रहे हैं। वहीं, एक छोटा-सा वर्ग अति धनी लोगों का है, जो तकनीक और लगभग असीम संसाधनों के दम पर ज्यादा से ज्यादा बच्चे पैदा कर रहा है।

मीडिया रिपोर्टों में कहीं स्पर्म डोनेशन से 100 से ज्यादा बच्चे, कहीं 200 बच्चों की इच्छा तो कहीं 300 बच्चे पैदा करने के दावे सामने आए हैं। इस ट्रेंड को ‘किडमैक्सिंग’ कहा जा रहा है। यानी बच्चों की संख्या का ही ताकत, विरासत, प्रभाव और भविष्य पर कब्जे का प्रतीक बन जाना। यह कहानी असमानता का सबसे ठोस रूप भी दिखाती है।

एक ओर लोग आईवीएफ के लिए कर्ज लेते हैं। दूसरी तरफ अरबपति दो करोड़ रु. या इससे ज्यादा खर्च कर सरोगेसी और डोनर एग्स से ‘ऑर्डर’ की तरह बच्चे बनवा रहे हैं। इसमें सबसे चर्चित नामों में इलॉन मस्क हैं। उनके 14 बच्चे हैं।

टेलीग्राम के संस्थापक पावेल डुरोव का दावा है कि उनके स्पर्म डोनेशन से 100 से ज्यादा बच्चे पैदा हुए हैं। अमेरिकी बीमा उद्योगपति ग्रेग लिंडबर्ग ने ‘बेबी प्रोजेक्ट’ चलाया। इसमें मॉडल्स को धोखे से एग डोनेशन के लिए फंसाने के आरोप भी लगे। उनके 12 बच्चों की बात सामने आई है। वहीं, यौन अपराधी जेफ्री एपस्टीन ने एक समय अपने डीएनए को ‘फैलाने’ की सनक तक जाहिर की थी।

कैलिफोर्निया यूनिवर्सिटी की आर्ली रसेल कहती हैं, ‘अरबपति एक साथ कई सरोगेट्स के जरिए ‘बैच’ में बच्चे पैदा करवा सकते हैं। आईवीएफ तकनीक अब सिर्फ संतान पाने का जरिया नहीं है। यह लिंग चयन, बीमारी और कुछ जीन संबंधी गुणों को चुनने का औजार बन चुकी है। इसका खर्च अरबपति ही उठा सकते हैं।’

मनोवैज्ञानिक ​कहते हैं कि जैसे पुराने समय के राजा अपनी वंशावली को शक्ति का स्रोत मानते थे, वैसे ही आज के कुछ टेक-किंग्स अपने खून को भविष्य की पूंजी मान रहे हैं। फर्क बस इतना है कि अब तलवार की जगह तकनीक है।

नतीजा: ‘परिवार’ की भावना और सोच ही खतरे में पड़ी

अमेरिकी लेखिका अन्ना लोई सुसमैन के अनुसार, अरबपतियों की इस सनक की शिकार कुछ महिलाएं और बच्चे हैं। सरोगेट माताओं के शोषण, सहमति उल्लंघन, बच्चों की देखभाल पर सवाल उठे हैं। कई मामलों में बच्चे ननों के भरोसे, दूसरे देशों में पले-बढ़े, जबकि पिता के लिए वे सिर्फ आंकड़े बनकर रह गए। समाजशास्त्री इवा इलूज चेतावनी देती हैं, ‘अगर इस पर सख्ती और नैतिक चर्चा नहीं हुई, तो परिवार की नींव ही हिल जाएगी।’

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द न्यू यॉर्क टाइम्स. वॉशिंगटन8 मिनट पहले

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मीडिया रिपोर्टों में कहीं स्पर्म डोनेशन से 100 से ज्यादा बच्चे, कहीं 200 बच्चों की इच्छा तो कहीं 300 बच्चे पैदा करने के दावे सामने आए हैं। इस ट्रेंड को ‘किडमैक्सिंग’ कहा जा रहा है। – प्रतीकात्मक फोटो

विकसित देशों में जन्मदर रिकॉर्ड निचले स्तर पर है। बहुत से लोग कहते हैं कि वे एक बच्चे का खर्च नहीं उठा पा रहे हैं। वहीं, एक छोटा-सा वर्ग अति धनी लोगों का है, जो तकनीक और लगभग असीम संसाधनों के दम पर ज्यादा से ज्यादा बच्चे पैदा कर रहा है।

मीडिया रिपोर्टों में कहीं स्पर्म डोनेशन से 100 से ज्यादा बच्चे, कहीं 200 बच्चों की इच्छा तो कहीं 300 बच्चे पैदा करने के दावे सामने आए हैं। इस ट्रेंड को ‘किडमैक्सिंग’ कहा जा रहा है। यानी बच्चों की संख्या का ही ताकत, विरासत, प्रभाव और भविष्य पर कब्जे का प्रतीक बन जाना। यह कहानी असमानता का सबसे ठोस रूप भी दिखाती है।

एक ओर लोग आईवीएफ के लिए कर्ज लेते हैं। दूसरी तरफ अरबपति दो करोड़ रु. या इससे ज्यादा खर्च कर सरोगेसी और डोनर एग्स से ‘ऑर्डर’ की तरह बच्चे बनवा रहे हैं। इसमें सबसे चर्चित नामों में इलॉन मस्क हैं। उनके 14 बच्चे हैं।

टेलीग्राम के संस्थापक पावेल डुरोव का दावा है कि उनके स्पर्म डोनेशन से 100 से ज्यादा बच्चे पैदा हुए हैं। अमेरिकी बीमा उद्योगपति ग्रेग लिंडबर्ग ने ‘बेबी प्रोजेक्ट’ चलाया। इसमें मॉडल्स को धोखे से एग डोनेशन के लिए फंसाने के आरोप भी लगे। उनके 12 बच्चों की बात सामने आई है। वहीं, यौन अपराधी जेफ्री एपस्टीन ने एक समय अपने डीएनए को ‘फैलाने’ की सनक तक जाहिर की थी।

कैलिफोर्निया यूनिवर्सिटी की आर्ली रसेल कहती हैं, ‘अरबपति एक साथ कई सरोगेट्स के जरिए ‘बैच’ में बच्चे पैदा करवा सकते हैं। आईवीएफ तकनीक अब सिर्फ संतान पाने का जरिया नहीं है। यह लिंग चयन, बीमारी और कुछ जीन संबंधी गुणों को चुनने का औजार बन चुकी है। इसका खर्च अरबपति ही उठा सकते हैं।’

मनोवैज्ञानिक ​कहते हैं कि जैसे पुराने समय के राजा अपनी वंशावली को शक्ति का स्रोत मानते थे, वैसे ही आज के कुछ टेक-किंग्स अपने खून को भविष्य की पूंजी मान रहे हैं। फर्क बस इतना है कि अब तलवार की जगह तकनीक है।

नतीजा: ‘परिवार’ की भावना और सोच ही खतरे में पड़ी

अमेरिकी लेखिका अन्ना लोई सुसमैन के अनुसार, अरबपतियों की इस सनक की शिकार कुछ महिलाएं और बच्चे हैं। सरोगेट माताओं के शोषण, सहमति उल्लंघन, बच्चों की देखभाल पर सवाल उठे हैं। कई मामलों में बच्चे ननों के भरोसे, दूसरे देशों में पले-बढ़े, जबकि पिता के लिए वे सिर्फ आंकड़े बनकर रह गए। समाजशास्त्री इवा इलूज चेतावनी देती हैं, ‘अगर इस पर सख्ती और नैतिक चर्चा नहीं हुई, तो परिवार की नींव ही हिल जाएगी।’

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