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AIIMS Bhopal Govt IVF Center Offers Hope for Parenthood at Half Cost

AIIMS Bhopal Govt IVF Center Offers Hope for Parenthood at Half Cost

नि:संतान दंपतियों के लिए यह खबर राहत भरी और निराशाजनक दोनों है। एक तरफ जहां एम्स भोपाल में प्रदेश का पहला सरकारी इन विट्रो फर्टिलाइजेशन (आईवीएफ) सेंटर हाईटेक मशीनों के साथ तैयार है। महिला के गर्भ में भ्रूण इंप्लांट करने वाले एक्सपर्ट एम्ब्रायोलॉजिस्ट

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हालांकि, एम्स प्रबंधन का कहना है कि लाइसेंस के लिए आवेदन कर दिया गया है। यह प्रक्रिया भी जल्द पूरी हो जाएगी। यह स्थिति तब है जब संस्थान में आईवीएफ शुरू करने की घोषणा साल 2022 में हुई थी, जो 4 साल बाद भी अधूरी है। मध्यप्रदेश में आईवीएफ की मांग तेजी से बढ़ रही है। इससे जुड़े आंकड़े भी इसी ओर संकेत देते हैं। प्रदेश में 10 सालों में फर्टिलिटी रेट यानी प्रजनन क्षमता में 12.58 प्रतिशत की गिरावट आई है।

सरकारी सेंटर में आधे से कम खर्च में होगा इलाज बता दें, दिल्ली और रायपुर के बाद एम्स भोपाल देश का तीसरा और एमपी का पहला ऐसा सरकारी संस्थान होगा, जहां यह सुविधा मिलेगी। वर्तमान में प्रदेश के करीब 10 हजार दंपती हर साल निजी सेंटरों पर आईवीएफ कराते हैं, जहां एक साइकिल का खर्च 1.5 लाख से 3 लाख रुपए तक आता है।

एम्स में यही इलाज महज 50 हजार से 75 हजार रुपए में होगा। इसकी अहमियत का अंदाजा इससे भी लगाया जा सकता है कि केंद्र सरकार ने इस सेंटर के लिए करीब 20 करोड़ रुपए का बजट मुहैया कराया है।

सेंटर में सभी हाईटेक सुविधाएं रहेंगी मौजूद एम्स में तैयार सेंटर में आईवीएफ, ICSI, IUI, टेस्ट ट्यूब बेबी और अन्य प्रजनन तकनीकों पर उपचार, परामर्श और टेस्टिंग सुविधाएं मौजूद होंगी। लैब, एम्ब्रियो फ्रीजिंग और हाई-एंड इन्क्यूबेटर भी स्थापित किए गए हैं। विशेष बात यह है कि डॉक्टरों के प्रशिक्षण के लिए डिजिटल स्किल लैब बनाई गई है, जिसमें एआई आधारित सिम्युलेटर की मदद से भ्रूण ट्रांसफर और हिस्टेरोस्कोपी का प्रशिक्षण दिया जाएगा।

12.8 फीसदी कम हुआ फर्टिलिटी रेट मध्यप्रदेश में लगातार फर्टिलिटी रेट गिरता जा रहा है। रजिस्ट्रार जनरल ऑफ इंडिया के सैंपल रजिस्ट्रेशन सर्वे की रिपोर्ट बताती है कि बीते 10 साल में मध्यप्रदेश में जन्मदर में 12.8 फीसदी की कमी आई है। ऐसे में नए कपल्स में माता-पिता बनने के लिए आईवीएफ तकनीक की मांग तेजी से बढ़ी है।

ऐसा है जनसंख्या का अनुमान स्वास्थ्य एवं परिवार कल्याण मंत्रालय के ताजा विश्लेषण के अनुसार 2024 में मप्र के 20 से 29 साल आयुवर्ग के युवाओं की आबादी 1 करोड़ 53 लाख 82 हजार है। 2047 तक इसी कैटेगरी में युवाओं की संख्या 1 करोड़ 49 लाख 93 हजार ही रहेगी।

23 साल बाद युवा आबादी बढ़ने की बजाय कम हो जाएगी। इसके विपरीत 2024 में मप्र के 60 साल से ज्यादा उम्र के लोगों की आबादी 57 लाख 12 हजार है। 2047 तक इसी कैटेगरी में बुजुर्गों की संख्या 1 करोड़ 82 लाख तक पहुंच जाएगी।

उम्र के साथ घटती है सफलता की संभावना विशेषज्ञों के अनुसार आईवीएफ की सफलता काफी हद तक महिला की उम्र पर निर्भर करती है। इसी कारण विशेषज्ञ समय रहते उपचार शुरू करने की सलाह देते हैं।

IVF नियम सख्त हुए, एज लिमिट पर बहस जारी

  • महिला की अधिकतम उम्र 50 साल, पुरुष की 55 साल तय की गई है।
  • 50 साल से अधिक आयु होने पर विशेष अनुमति लेनी पड़ती है।
  • एक बार में केवल दो भ्रूण ही ट्रांसफर किए जा सकते हैं।
  • हर प्रक्रिया की रिपोर्ट जिला कमेटी, राज्य बोर्ड और केंद्र को भेजनी होती है।

कपल्स ऐसी स्थिति से भी बचें

  • मोटापे से बचें। महिलाओं में अनियमित मासिक चक्र, थायरॉयड और पॉलीसिस्टिक ओवरी सिंड्रोम यानी PCOS जैसी समस्या हो तो तुरंत डॉक्टर की सलाह लें।
  • गोद में रखकर लैपटॉप न चलाएं, पर्याप्त नींद, व्यायाम और पोषण आहार लें।
  • तनाव प्रबंधन के लिए योग, ध्यान और प्राणायाम अपनाएं। काउंसलिंग के जरिए भी सही फैसले ले सकते हैं।

ये खबर भी पढ़ें…

22 से 28 साल के लड़के बन रहे लड़की

एमपी के राजगढ़ का रहने वाला सोमेश जैसे ही 10 साल का हुआ, वह लड़कियों की तरह व्यवहार करता और उनके तरह कपड़े पहनना पसंद करने लगा। परिवार को भी अहसास हो गया कि वह अंदर से एक लड़की है। 24 साल के होने पर उसने अपना जेंडर चेंज करवाया और सर्जरी करवाकर लड़की बन गया।पूरी खबर पढ़ें

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नि:संतान दंपतियों के लिए यह खबर राहत भरी और निराशाजनक दोनों है। एक तरफ जहां एम्स भोपाल में प्रदेश का पहला सरकारी इन विट्रो फर्टिलाइजेशन (आईवीएफ) सेंटर हाईटेक मशीनों के साथ तैयार है। महिला के गर्भ में भ्रूण इंप्लांट करने वाले एक्सपर्ट एम्ब्रायोलॉजिस्ट

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हालांकि, एम्स प्रबंधन का कहना है कि लाइसेंस के लिए आवेदन कर दिया गया है। यह प्रक्रिया भी जल्द पूरी हो जाएगी। यह स्थिति तब है जब संस्थान में आईवीएफ शुरू करने की घोषणा साल 2022 में हुई थी, जो 4 साल बाद भी अधूरी है। मध्यप्रदेश में आईवीएफ की मांग तेजी से बढ़ रही है। इससे जुड़े आंकड़े भी इसी ओर संकेत देते हैं। प्रदेश में 10 सालों में फर्टिलिटी रेट यानी प्रजनन क्षमता में 12.58 प्रतिशत की गिरावट आई है।

सरकारी सेंटर में आधे से कम खर्च में होगा इलाज बता दें, दिल्ली और रायपुर के बाद एम्स भोपाल देश का तीसरा और एमपी का पहला ऐसा सरकारी संस्थान होगा, जहां यह सुविधा मिलेगी। वर्तमान में प्रदेश के करीब 10 हजार दंपती हर साल निजी सेंटरों पर आईवीएफ कराते हैं, जहां एक साइकिल का खर्च 1.5 लाख से 3 लाख रुपए तक आता है।

एम्स में यही इलाज महज 50 हजार से 75 हजार रुपए में होगा। इसकी अहमियत का अंदाजा इससे भी लगाया जा सकता है कि केंद्र सरकार ने इस सेंटर के लिए करीब 20 करोड़ रुपए का बजट मुहैया कराया है।

सेंटर में सभी हाईटेक सुविधाएं रहेंगी मौजूद एम्स में तैयार सेंटर में आईवीएफ, ICSI, IUI, टेस्ट ट्यूब बेबी और अन्य प्रजनन तकनीकों पर उपचार, परामर्श और टेस्टिंग सुविधाएं मौजूद होंगी। लैब, एम्ब्रियो फ्रीजिंग और हाई-एंड इन्क्यूबेटर भी स्थापित किए गए हैं। विशेष बात यह है कि डॉक्टरों के प्रशिक्षण के लिए डिजिटल स्किल लैब बनाई गई है, जिसमें एआई आधारित सिम्युलेटर की मदद से भ्रूण ट्रांसफर और हिस्टेरोस्कोपी का प्रशिक्षण दिया जाएगा।

12.8 फीसदी कम हुआ फर्टिलिटी रेट मध्यप्रदेश में लगातार फर्टिलिटी रेट गिरता जा रहा है। रजिस्ट्रार जनरल ऑफ इंडिया के सैंपल रजिस्ट्रेशन सर्वे की रिपोर्ट बताती है कि बीते 10 साल में मध्यप्रदेश में जन्मदर में 12.8 फीसदी की कमी आई है। ऐसे में नए कपल्स में माता-पिता बनने के लिए आईवीएफ तकनीक की मांग तेजी से बढ़ी है।

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23 साल बाद युवा आबादी बढ़ने की बजाय कम हो जाएगी। इसके विपरीत 2024 में मप्र के 60 साल से ज्यादा उम्र के लोगों की आबादी 57 लाख 12 हजार है। 2047 तक इसी कैटेगरी में बुजुर्गों की संख्या 1 करोड़ 82 लाख तक पहुंच जाएगी।

उम्र के साथ घटती है सफलता की संभावना विशेषज्ञों के अनुसार आईवीएफ की सफलता काफी हद तक महिला की उम्र पर निर्भर करती है। इसी कारण विशेषज्ञ समय रहते उपचार शुरू करने की सलाह देते हैं।

IVF नियम सख्त हुए, एज लिमिट पर बहस जारी

  • महिला की अधिकतम उम्र 50 साल, पुरुष की 55 साल तय की गई है।
  • 50 साल से अधिक आयु होने पर विशेष अनुमति लेनी पड़ती है।
  • एक बार में केवल दो भ्रूण ही ट्रांसफर किए जा सकते हैं।
  • हर प्रक्रिया की रिपोर्ट जिला कमेटी, राज्य बोर्ड और केंद्र को भेजनी होती है।

कपल्स ऐसी स्थिति से भी बचें

  • मोटापे से बचें। महिलाओं में अनियमित मासिक चक्र, थायरॉयड और पॉलीसिस्टिक ओवरी सिंड्रोम यानी PCOS जैसी समस्या हो तो तुरंत डॉक्टर की सलाह लें।
  • गोद में रखकर लैपटॉप न चलाएं, पर्याप्त नींद, व्यायाम और पोषण आहार लें।
  • तनाव प्रबंधन के लिए योग, ध्यान और प्राणायाम अपनाएं। काउंसलिंग के जरिए भी सही फैसले ले सकते हैं।

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22 से 28 साल के लड़के बन रहे लड़की

एमपी के राजगढ़ का रहने वाला सोमेश जैसे ही 10 साल का हुआ, वह लड़कियों की तरह व्यवहार करता और उनके तरह कपड़े पहनना पसंद करने लगा। परिवार को भी अहसास हो गया कि वह अंदर से एक लड़की है। 24 साल के होने पर उसने अपना जेंडर चेंज करवाया और सर्जरी करवाकर लड़की बन गया।पूरी खबर पढ़ें

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