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तरबूज-खरबूज से ज्यादा ताकतवर, दिखने में जेली और शरीर रखता है बर्फ सा ठंडा, जानें आइस एप्पल के फायदे

आइस एप्पल जिसे ताड़गोला भी कहा जाता है, पोषक तत्वों से भरा गर्मी का सुपरफ्रूट है. वैसे तो इस मौसम में मार्केट में हर तरफ तरबूज और खरबूज का बोलबाला होता है. लेकिन इस बीच ताड़गोला कहीं दब सा जाता है, जबकि इसके फायदे दोनों से ज्यादा हैं. यदि आप सिर्फ ताड़गोल खा लें तो आपको तरबूज और खरबूज दोनों के न्यूट्रिएंट्स एक साथ एक ही बार में मिल जाते हैं. ताड़गोला पाम की एक प्रजाति ताड़ के पेड़ पर लगने वाला फल है. बिहार, बंगाल और झारखंड में इसे आप सड़कों के किनारे और खेतों में आसानी से देख सकते हैं. लेकिन चौंकाने वाली बात है कि इसके फायदों के बारे में लोग कम ही जानते हैं. यदि आप भी इसमें से एक हैं, तो लेख आपके लिए है. क्योंकि इस साल गर्मी से बचने के लिए सिर्फ कूलर और एसी काम नहीं आएंगे. सेहत को बनाए रखने के लिए ज्यादा से ज्यादा ऐसे फलों और सब्जियों को खाने की जरूरत है, जो आपको अंदर से ठंडा और हाइड्रेट रखे. ताड़गोला के फायदेआइस एप्पल यानी ताड़गोला शरीर को ठंडक देने वाला फल है. इसमें 90 प्रतिशत पानी होता है, जो इसे तरबूज को कड़ी टक्कर देने वाला फल बनाता है. इसलिए गर्मियों में यह शरीर को हाइड्रेट रखने में मदद करता है. इसे खाने से शरीर में पानी और जरूरी मिनरल्स की कमी पूरी होती है. यह थकान, सिरदर्द और शरीर में सूखापन जैसी समस्याओं से बचाने में सहायक होता है. आइस एप्पल में एंटीऑक्सीडेंट पाए जाते हैं, जो शरीर को फ्री रेडिकल्स से होने वाले नुकसान से बचाते हैं. इससे हार्ट डिजीज, डायबिटीज और अन्य बीमारियों का खतरा कम हो सकता है. यह शरीर की रोगों से लड़ने की क्षमता को मजबूत बनाता है और लंबे समय तक स्वस्थ रहने में मदद करता है. इस फल में फाइबर अच्छी मात्रा में होता है, जो पाचन क्रिया को सही रखता है. यह कब्ज की समस्या को कम करने और पेट को साफ रखने में मदद करता है. आइस एप्पल पेट की जलन, गैस और अपच जैसी परेशानियों में भी राहत देता है. इसे खाने से आंतों में अच्छे बैक्टीरिया बढ़ते हैं, जिससे पाचन तंत्र स्वस्थ रहता है. आइस एप्पल का ग्लाइसेमिक इंडेक्स कम होता है, इसलिए यह ब्लड शुगर को तेजी से नहीं बढ़ाता. इसमें मौजूद प्राकृतिक शुगर धीरे-धीरे ऊर्जा देती है. फाइबर की वजह से शरीर में शुगर धीरे अवशोषित होती है, जिससे डायबिटीज के मरीजों को लाभ मिल सकता है. इसके विटामिन और एंटीऑक्सीडेंट त्वचा को चमकदार और मुलायम बनाते हैं. यह त्वचा की नमी बनाए रखता है और झुर्रियों को कम करने में सहायक होता है. आइस एप्पल में विटामिन C और कई जरूरी पोषक तत्व पाए जाते हैं. यह शरीर की इम्यूनिटी बढ़ाने में मदद करता है और संक्रमण से बचाव करता है. नियमित सेवन से शरीर मजबूत और स्वस्थ बना रहता है. इस बात का रखें ध्यानइसमें कोई दोराय नहीं कि ताड़गोला गर्मी के मौसम का सुपरफ्रूट है, लेकिन यदि आप इसे ज्यादा मात्रा में खाते हैं, तो ये नुकसान भी कर सकता है. इसलिए रोजाना थोड़ी मात्रा में सेवन करना सेहतमंद माना जाता है. सेहत, रिलेशनशिप, लाइफ या धर्म-ज्योतिष से जुड़ी है कोई निजी उलझन तो हमें करें WhatsApp, आपका नाम गोपनीय रखकर देंगे जानकारी. Disclaimer: इस खबर में दी गई दवा/औषधि और स्वास्थ्य से जुड़ी सलाह, एक्सपर्ट्स से की गई बातचीत के आधार पर है. यह सामान्य जानकारी है, व्यक्तिगत सलाह नहीं. इसलिए डॉक्टर्स से परामर्श के बाद ही कोई चीज उपयोग करें. Local-18 किसी भी उपयोग से होने वाले नुकसान के लिए जिम्मेदार नहीं होगा.

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knee pain at 30| knee problems in youth|30 की उम्र में युवाओं को म‍िल रहा दर्द और धोखा, अपने नहीं घुटने हैं धोखेबाज, क्या है वजह? टॉप सर्जन ने बता दी

आखिर क्यों कमजोर हो रहे हैं युवाओं के घुटने?घुटना शरीर के सबसे महत्वपूर्ण और सबसे ज्यादा दबाव सहने वाले जोड़ों में से एक है. चलना, बैठना, दौड़ना, सीढ़ियां चढ़ना, वजन उठाना. लगभग हर गतिविधि में घुटनों की भूमिका होती है. लेकिन जब शरीर को पर्याप्त मूवमेंट नहीं मिलता और आसपास की मांसपेशियां कमजोर होने लगती हैं, तो घुटनों पर अतिरिक्त दबाव पड़ता है. धीरे-धीरे यह दबाव कार्टिलेज को नुकसान पहुंचाने लगता है और दर्द की शुरुआत हो जाती है. आज का शहरी जीवन इस समस्या को और बढ़ा रहा है. सुबह से रात तक लैपटॉप के सामने बैठकर काम करना, घंटों मोबाइल स्क्रीन पर समय बिताना और दिनभर बहुत कम चलना-फिरना शरीर की प्राकृतिक कार्यप्रणाली को प्रभावित कर रहा है. लगातार बैठने से क्वाड्रिसेप्स और हिप मसल्स कमजोर होने लगती हैं, जो घुटनों को स्थिर रखने में अहम भूमिका निभाती हैं. जब ये मांसपेशियां कमजोर होती हैं, तो पूरा दबाव सीधे घुटनों के कार्टिलेज पर पड़ता है और घिसाव तेजी से बढ़ने लगता है. कम उम्र में घुटनों के दर्द के पीछे छिपे बड़े कारण 1. लंबे समय तक बैठकर काम करनाडेस्क जॉब आज घुटनों की समस्याओं की सबसे बड़ी वजह बन चुकी है. लगातार कई घंटों तक बैठने से घुटनों की मूवमेंट कम हो जाती है और ब्लड सर्कुलेशन प्रभावित होता है. यही कारण है कि कई युवा मीटिंग के बाद उठते समय जकड़न महसूस करते हैं या लंबे समय तक ड्राइव करने के बाद घुटनों में दर्द महसूस करते हैं. शुरुआती संकेतों में शामिल हैं- 2. तेजी से बढ़ता वजन और मोटापामोटापा घुटनों के लिए सबसे बड़ा जोखिम कारक माना जाता है. शरीर का अतिरिक्त वजन सीधे घुटनों पर दबाव बढ़ाता है. विशेषज्ञों के अनुसार, चलने के दौरान शरीर का हर अतिरिक्त किलो वजन घुटनों पर कई गुना अधिक दबाव डालता है.रिसर्च के मुताबिक, मोटापे से ग्रस्त महिलाओं में घुटनों के ऑस्टियोआर्थराइटिस का खतरा लगभग 4 गुना तक बढ़ जाता है, जबकि पुरुषों में यह खतरा लगभग 5 गुना तक हो सकता है. यही कारण है कि कम उम्र में बढ़ता वजन अब घुटनों की बीमारी का प्रमुख कारण बनता जा रहा है. 3. “वीकेंड वॉरियर” फिटनेस कल्चरआजकल कई लोग पूरे सप्ताह शारीरिक रूप से निष्क्रिय रहते हैं और फिर वीकेंड पर अचानक भारी वर्कआउट, रनिंग, ट्रेकिंग या खेलकूद शुरू कर देते हैं. बिना सही तैयारी, बिना स्ट्रेचिंग और गलत तकनीक के साथ किया गया हाई-इम्पैक्ट वर्कआउट घुटनों पर अचानक अत्यधिक दबाव डालता है.कंक्रीट सतह पर दौड़ना, गलत फुटवियर पहनना और जरूरत से ज्यादा एक्सरसाइज करना भी सूजन और माइक्रो-इंजरी का कारण बन सकता है. लंबे समय तक ऐसा होने पर घुटनों की संरचना प्रभावित होने लगती है. 4. कार्टिलेज का शुरुआती घिसावघुटनों में होने वाला नुकसान हमेशा तुरंत दर्द के रूप में सामने नहीं आता. कई बार कार्टिलेज धीरे-धीरे घिसना शुरू हो जाता है और व्यक्ति को लंबे समय तक इसका एहसास तक नहीं होता. डॉक्टरों के मुताबिक, 30 की उम्र तक कई लोगों में शुरुआती कार्टिलेज डैमेज और बोन स्पर्स बनने लगते हैं.अगर समय रहते ध्यान न दिया जाए, तो यही शुरुआती बदलाव आगे चलकर ऑस्टियोआर्थराइटिस में बदल सकते हैं. 5. पोषण की कमी और लगातार तनावघुटनों की मजबूती केवल एक्सरसाइज पर निर्भर नहीं करती, बल्कि सही पोषण भी उतना ही जरूरी है. विटामिन D, कैल्शियम, मैग्नीशियम और प्रोटीन की कमी हड्डियों और मांसपेशियों को कमजोर बनाती है. इसके अलावा, लगातार तनाव और खराब नींद शरीर में सूजन बढ़ा सकते हैं, जिससे रिकवरी धीमी हो जाती है.फास्ट फूड, प्रोसेस्ड डाइट और अनियमित खानपान भी जोड़ों की सेहत पर नकारात्मक असर डालते हैं. किन संकेतों को भूलकर भी नजरअंदाज न करेंअगर कम उम्र में ये लक्षण दिखाई दे रहे हैं, तो उन्हें हल्के में लेने की गलती नहीं करनी चाहिए: क्या कम उम्र में घुटनों की समस्या को रोका जा सकता है?विशेषज्ञों का मानना है कि शुरुआती चरण में घुटनों की अधिकांश समस्याओं को नियंत्रित किया जा सकता है और कई मामलों में स्थिति को सुधारा भी जा सकता है. इसके लिए कुछ आसान लेकिन जरूरी बदलाव अपनाने की जरूरत है. घुटनों को स्वस्थ रखने के लिए अपनाएं ये आदतें जागरूकता ही सबसे बड़ा बचाव30 की उम्र में घुटनों का दर्द अब दुर्लभ नहीं रहा, लेकिन इसे सामान्य समझना बड़ी गलती हो सकती है. शरीर समय रहते संकेत देना शुरू कर देता है, लेकिन ज्यादातर लोग उन्हें नजरअंदाज कर देते हैं. यही लापरवाही आगे चलकर क्रॉनिक ऑस्टियोआर्थराइटिस, लगातार दर्द और चलने-फिरने में गंभीर परेशानी का कारण बन सकती है. विशेषज्ञों का कहना है कि नियमित शारीरिक गतिविधि, वजन नियंत्रण, मजबूत मांसपेशियां और सही जीवनशैली लंबे समय तक जोड़ों को स्वस्थ रखने की सबसे प्रभावी रणनीति हैं. छोटी-छोटी आदतों में बदलाव करके कम उम्र में होने वाले घुटनों के दर्द से काफी हद तक बचा जा सकता है.शरीर हमेशा समय रहते चेतावनी देता है. जरूरत सिर्फ उसे समझने और सही समय पर कदम उठाने की है.

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घर बैठे करें कान की जांच, QR स्कैन करते ही शुरू होगी टेस्टिंग, कुछ मिनट में रिपोर्ट, जानिए कैसे

Last Updated:May 21, 2026, 15:50 IST Kanpur News : यह तकनीक ऐसे लोगों के लिए वरदान है जिन्हें धीरे-धीरे कम सुनाई देना शुरू हो गया है, लेकिन वे समय पर जांच नहीं करा पाते. आजकल ईयरफोन का ज्यादा इस्तेमाल, तेज आवाज और ध्वनि प्रदूषण की वजह से लोगों में सुनने की समस्या तेजी से बढ़ रही है. लोकल 18 से शोधकर्ता डॉ. याजुषी देओल बताती हैं कि यह तकनीक लोगों को शुरुआती स्तर पर ही सुनने की समस्या पहचानने में मदद करेगी. इससे समय रहते इलाज शुरू किया जा सकेगा, ताकि वह आगे चलकर गंभीर दिक्कतों में न बदले. गांव और दूरदराज के इलाकों में रहने वाले लोगों को इसका सबसे ज्यादा फायदा मिलेगा. कानपुर. यूपी स्थित कानपुर के लोगों के लिए राहत भरी खबर है. अब कान की सुनने की क्षमता जांचने के लिए अस्पतालों के लंबे चक्कर लगाने की जरूरत नहीं पड़ेगी. कानपुर के जीएसवीएम मेडिकल कॉलेज और बनारस हिंदू विश्वविद्यालय (बीएचयू) ने मिलकर एक खास एआई ऑडियोमीटर टूल तैयार किया है, जिससे लोग अपने मोबाइल फोन से ही सुनने की जांच कर सकेंगे. यह तकनीक खासतौर पर उन लोगों के लिए मददगार होगी जिन्हें धीरे-धीरे कम सुनाई देना शुरू हो गया है, लेकिन वे समय पर जांच नहीं करा पाते. अब सिर्फ क्यूआर कोड स्कैन करना होगा या वेब लिंक खोलना होगा. इसके बाद मोबाइल सीधे एआई टूल से जुड़ जाएगा और जांच शुरू हो जाएगी. इतने हर्ट्ज तक जांच इस नए सिस्टम में व्यक्ति को अलग-अलग ध्वनियां सुनाई जाएंगी. जैसे ही आवाज साफ सुनाई देगी, मोबाइल स्क्रीन पर क्लिक करना होगा. इसके बाद पूरी रिपोर्ट तैयार होकर सेव हो जाएगी. यह जांच 500 से 2000 हर्ट्ज की ध्वनि आवृत्ति तक सुनने की क्षमता को माप सकेगी. शोधकर्ता डॉ. याजुषी देओल ने बताया कि यह तकनीक लोगों को शुरुआती स्तर पर ही सुनने की समस्या पहचानने में मदद करेगी. इससे समय रहते इलाज शुरू किया जा सकेगा और गंभीर दिक्कतों से बचाव होगा. इनके लिए भी फायदेमंद जीएसवीएम मेडिकल कॉलेज के ईएनटी विभागाध्यक्ष डॉ. एस के कनौजिया ने बताया कि यह एआई आधारित टूल नवजात बच्चों, बुजुर्गों और कम सुनने वाले मरीजों के लिए काफी उपयोगी साबित होगा. इससे अस्पतालों की ओपीडी में भी मरीजों की स्क्रीनिंग तेजी से की जा सकेगी. उन्होंने कहा कि आजकल ईयरफोन का ज्यादा इस्तेमाल, तेज आवाज और ध्वनि प्रदूषण की वजह से लोगों में सुनने की समस्या तेजी से बढ़ रही है. ऐसे में यह तकनीक समय रहते समस्या पकड़ने में बड़ी भूमिका निभाएगी. कब से इस्तेमाल इस रिसर्च प्रोजेक्ट को इंडियन काउंसिल ऑफ मेडिकल रिसर्च (आईसीएमआर) का भी समर्थन मिला है. रिसर्च टीम के मुताबिक यह टूल करीब 80 प्रतिशत तक सटीक परिणाम देने में सफल रहा है. उम्मीद है कि इस साल के अंत तक इसे पूरी तरह इस्तेमाल के लिए तैयार कर दिया जाएगा. डॉक्टरों का मानना है कि आने वाले समय में यह तकनीक कान की बीमारियों की जांच और इलाज की प्रक्रिया को काफी आसान बना देगी. खासतौर पर गांव और दूरदराज के इलाकों में रहने वाले लोगों को इसका सबसे ज्यादा फायदा मिलेगा. About the Author Priyanshu Gupta प्रियांशु गुप्‍ता बीते 10 साल से भी ज्यादा समय से पत्रकारिता में सक्रिय हैं. 2015 में भारतीय जनसंचार संस्थान (IIMC), दिल्ली से जर्नलिज्म का ककहरा सीख अमर उजाला (प्रिंट, नोएडा ऑफिस) से अपने करियर की शुरुआत की. य…और पढ़ें News18 न्यूजलेटर अब ईमेल पर इनसाइड स्‍टोर‍ीज खबरों के पीछे की खबर अब आपके इनबॉक्‍स में सबमिट करें Location : Kanpur Nagar,Uttar Pradesh

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दुनिया की सबसे खरनाक वायरल बीमारी कौन सी है जिसमें 100 % मौत तय है? इबोला तो इसके सामने कुछ भी नहीं

Last Updated:May 21, 2026, 15:32 IST Deadliest Viral Disease: अफ्रीकी देश कांगो में इबोला विस्फोट के बाद वायरल बीमारियों की खौफ दुनिया को हलकान कर दिया है. कोरोना के नए वैरिएंट और तरह-तरह के नए-नए वायरस से वैज्ञानिक बेहद चिंतित है. कौन सा वायरस कब तांडव दिखाने लगेगा, किसी को पता नहीं. ऐसे में अब तक जो वायरस इस धरती पर है, उनमें से कौन सा ऐसा वायरस है जो सबसे ज्यादा खतरनाक है. किस वायरस से मौत 100 फीसदी तय है. आइए इसके बारे में जानते हैं. दुनिया का सबसे घातक वायरस. कोरोना ने हमें किस तरह तबाह किया यह कहने की जरूरत नहीं. कोरोना के बाद कई अन्य वायरसों ने भी पिछले कुछ सालों से दुनिया को हलकान कर रखा है. सार्स, एवियन इंफ्लूएंजा, स्वाइन फ्लू, निपाह, मारबर्ग, इबोला जैसे खतरनाक वायरसों ने पिछले दो दशक से जिंदगी को तबाह कर दिया है. वर्तमान में यूगांडा में इबोला वायरस से हड़कंप मचा गया है. डब्यूएचओ ने इसे ग्लोबल हेल्थ इमरजेंसी घोषित कर दी है. ये वायरस इतने खतरनाक होते हैं कि अगर इंसानों में प्रवेश कर जाए तो 50 फीसदी मौत तय हो जाती है. इबोला वायरस तो ऐसा है जिसमें मौत की दर 50 से 90 फीसदी तक है. लेकिन दुनिया में एक ऐसा वायरस भी है जो अगर इंसान में पहुंच जाए तो इसमें 100 फीसदी मौत तय है. रेयरेस्ट ऑफ द रेयर केस में ही इस वायरस से मौत न हो. लेकिन अगर मौत नहीं होगी तो भी व्यक्ति काम का नहीं रहेगा. इस वायरस का नाम है रेबीज. सबसे खतरनाक वायरस-रेबीजरेबीज अब तक ज्ञात सबसे खतरनाक वायरस है. अगर रेबीज के वायरस इंसानों में पहुंच जाए मौत की गारंटी पक्की है. इसमें शत-प्रतिशत मृत्यु दर है. हालांकि वैक्सीन के जरिए इससे बचाव संभव है लेकिन एक बार अगर इसके लक्षण शरीर में दिखाई दे जाएं तो मौत दर लगभग 100% हो जाती है. यह वायरस आज भी  दुनिया भर में हर साल हजारों लोगों की जान ले रहा है. असली बात तो यह है कि रेबीज के वायरस अधिकांश जानवरों, सबसे ज्यादा कुत्तों में पहले से मौजूद रहता है. अगर कुत्ते को पहले से टीका न लगाया गया हो तो इसके इंसानों को काटने से यह बीमारी हो सकती है. आमतौर पर यह बीमारी कुत्तों और चमगादड़ों की लार से फैलता है. क्यों है इतना घातकरेबीज वायरस के इतना घातक होने की सबसे बड़ी वजह इसका सीधा सेंट्रल नर्वस सिस्टम यानी हमारे दिमाग और रीढ़ की हड्डी पर हमला करना है. जब कोई पहले से इंफेक्टेड जानवर किसी इंसान को काटता है तो यह वायरस मांसपेशियों के जरिए धीरे-धीरे नसों में प्रवेश करता है. इसके बाद यह नसों के रास्ते रीढ़ की हड्डी से होते हुए दिमाग तक पहुंच जाता है. दिमाग में पहुंचते ही यह वायरस तेजी से अपनी संख्या बढ़ाता है और वहां गंभीर सूजन पैदा कर देता है जिसे एक्यूट एन्सेफलाइटिस कहते हैं. एक बार जब दिमाग की कोशिकाएं क्षतिग्रस्त होने लगती हैं तो शरीर के अंगों पर से नियंत्रण खो जाता है. इस वायरस की सबसे खतरनाक बात यह है कि इसका इनक्यूबेशन पीरियड बहुत लंबा हो सकता है. संक्रमित होने के बाद हफ्तों या महीनों तक शरीर में कोई लक्षण नहीं दिखता. लेकिन जैसे ही पहला लक्षण जैसे पानी से डर लगना (हाइड्रोफोबिया) या हवा से डर लगना (एयरोफोबिया) सामने आता है तब तक बहुत देर हो चुकी होती है. लक्षण दिखने के बाद दुनिया में कहीं भी इसका कोई इलाज संभव नहीं है और मरीज की मौत लगभग तय हो जाती है. यही कारण है कि वैक्सीन न मिलने पर यह दुनिया का सौ फीसदी जानलेवा वायरस बन जाता है. लक्षण इतने खतरनाक कि कोई पास भी नहीं जा सकता रेबीज के अंतिम चरण में मरीज के लक्षण इतने भयानक होते हैं कि उन्हें देखकर कोई भी सिहर उठे. इस स्थिति को देखकर ही लोग मरीज के पास जाने से डरने लगते हैं. सबसे प्रमुख लक्षण है हाइड्रोफोबिया यानी पानी से बहुत ज्यादा डर लगना. जब मरीज पानी पीने की कोशिश करता है तो उसके गले की मांसपेशियों में बहुद जोर से ऐंठन होने लगती है. इससे टीस वाला दर्द होता है. यह ऐंठन इतनी तकलीफदेह होती है कि मरीज पानी की आवाज सुनकर या पानी को देखकर ही खौफ से कांपने और चीखने लगता है. इसके साथ ही मरीज का दिमाग पूरी तरह असंतुलित हो जाता है. वह अत्यधिक आक्रामक हो सकता है, अजीब हरकतें करता है, उसे मतिभ्रम होने लगता है और वह हिंसक रूप से छटपटाने लगता है. इस दौरान वायरस लार ग्रंथियों पर हमला करता है, जिससे मरीज के मुंह से लगातार अत्यधिक मात्रा में झाग और लार टपकती है. क्या मरीज को छूने से रेबीज हो सकता हैरेबीज को लेकर कुछ मिथक भी है. जैसे कहा जाता है कि रेबीज के मरीज को छून भर से किसी को बीमारी हो सकती है. यह बात पूरी तरह गलत है. सामान्य रूप से रेबीज के मरीज को केवल छूने, गले लगाने या उसकी देखभाल करने से संक्रमण नहीं फैलता है. रेबीज वायरस त्वचा को पार नहीं कर सकता. संक्रमण तब होता है जब मरीज की लार किसी दूसरे व्यक्ति के खुले घाव, कटी हुई त्वचा या खरोंच के माध्यम से शरीर के अंदर आ जाए. इसी तरह अगर मरीज की लार आंखों, नाक या मुंह के अंदर चली जाए या अपनी आक्रामक स्थिति में मरीज किसी को दांत से काट ले या ऐसी खरोंच मार दे जहां उसकी लार लगी हो तो इस स्थिति में उसे रेबीज हो सकता है. चूंकि मरीज के मुंह से बहुत ज्यादा लार निकलती है और वह अनियंत्रित होकर हाथ-पैर चलाता है, इसलिए अनजाने में उसकी लार दूसरों के संपर्क में आ सकती है. यही वजह है कि अस्पतालों में भी डॉक्टर और नर्स बेहद सावधानी बरतते हैं. वे पीपीई किट या सुरक्षात्मक गियर पहनते हैं और मरीज की देखभाल करने वाले स्टाफ को पहले ही रेबीज रोधी टीका लगा दिया जाता है. About the Author Lakshmi Narayan 18 साल से ज्यादा के लंबे करियर में लक्ष्मी नारायण ने डीडी न्यूज, आउटलुक, नई दुनिया, दैनिक जागरण, हिन्दुस्तान जैसे प्रतिष्ठित संस्थानों में अपनी सेवाएं दी हैं। समसामयिक विषयों के विभिन्न

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High BP symptoms| हाई बीपी है ‘साइलेंट किलर’ लेकिन ये 6 लक्षण हैं पुख्ता सबूत, तुरंत पकड़ में आ जाएगी बीमारी, डॉक्टर ने बताई काम की बात

Last Updated:May 21, 2026, 15:24 IST High Blood Pressure Symptoms and signs: हाई बीपी को साइलेंट क‍िलर कहा जाता है लेक‍िन डॉ पूजा त्रेहन ने हाई बीपी के 6 प्रमुख लक्षण बताए हैं, ज‍िन्‍हें पहचान कर हार्ट अटैक जैसी बीमार‍ियों से बचा जा सकता है. अक्‍सर लोग इन लक्षणों को नींद की कमी या थकान समझकर इग्‍नोर कर देते हैं. हाई ब्‍लड प्रेशर के क्‍या लक्षण होते हैं, कैसे पहचानें और हार्ट अटैक के खतरे को कम करें ? High BP ke lakshan: हाई ब्लड प्रेशर अक्सर लोगों को होता है लेकिन उन्हें पता ही नहीं होता है, यही वजह है कि इस बीमारी को अक्सर साइलेंट किलर कहा जाता है. इसके लक्षण होते भी हैं लेकिन थकान और नींद कम आने से मिले जुले होने के कारण लोग इन्हें अक्सर इग्नोर कर देते हैं, लिहाजा ये पता करना मुश्किल होता है कि किसी को हाइपरटेंशन या हाई बीपी की समस्या हो चुकी है. हालांकि डॉक्टरों की मानें तो हाई बीपी के 6 लक्षण ऐसे हैं, जिन्हें अगर इग्नोर न किया जाए तो इस समस्या को तत्काल पहचाना जा सकता है और हार्ट अटैक या अन्य गंभीर बीमारियों से बचा जा सकता है. हाई ब्लड प्रेशर को लेकर उत्तर प्रदेश और उत्तराखंड में मेट्रोपोलिस हेल्थकेयर की कंसल्टेंट पैथोलॉजिस्ट और जोनल चीफ ऑफ लैब्स डॉ. पूजा त्रेहन कहती हैं कि हाई ब्लड प्रेशर यानी हाइपरटेंशन को अक्सर “साइलेंट किलर” कहा जाता है क्योंकि कई लोगों को लंबे समय तक इसका कोई साफ लक्षण महसूस ही नहीं होता.क्लिनिकल प्रैक्टिस में अक्सर मरीज कहते हैं, “हमें तो बिल्कुल ठीक लग रहा था,” लेकिन यही बात इसे और खतरनाक बनाती है. जब तक लक्षण दिखाई देते हैं, तब तक कई बार शरीर के अंदर नुकसान शुरू हो चुका होता है. पूजा आगे कहती हैं कि आज की भागदौड़ भरी लाइफस्टाइल, देर रात तक जागना, कम नींद, ज्यादा स्क्रीन टाइम, बाहर का खाना, स्मोकिंग, शराब, मोटापा, तनाव और एक्सरसाइज की कमी हाई BP के मामलों को तेजी से बढ़ा रहे हैं. पहले इसे उम्रदराज लोगों की बीमारी माना जाता था, लेकिन अब 30–40 साल के युवाओं में भी हाई ब्लड प्रेशर काफी देखा जा रहा है. इसकी वजह से हार्ट की बीमारियां लगातार बढ़ती जा रही हैं. हालांकि कई लोगों को बीपी की समस्या होती हैं लेकिन उनमें कोई लक्षण नहीं दिखाई देते. फिर भी कुछ संकेतों को नजरअंदाज नहीं करना चाहिए. जैसे बार-बार सिर दर्द होना, चक्कर आना, जल्दी थकान लगना, धुंधला दिखना, दिल की धड़कन तेज महसूस होना, सांस फूलना या सीने में भारीपन डॉ. पूजा कहती हैं कि लोग अक्सर इन्हें तनाव, थकावट या नींद की कमी समझकर टाल देते हैं. जबकि ये हाई बीपी के सबसे मजबूत संकेत हैं. जिन पर बारीकी से ध्यान देना जरूरी है. क्या किया जाना चाहिए? डॉ. पूजा बताती हैं कि इससे बचाव के लिए कुछ बातों का ध्यान रखना जरूरी है. नियमित BP चेक कराना बेहद जरूरी है. कम नमक वाला संतुलित खाना खाएं रोजाना थोड़ी फिजिकल एक्टिविटी, वजन कंट्रोल में रखना, अच्छी नींद लेना, स्मोकिंग और शराब से दूरी बनाना तनाव कम करना बहुत जरूरी है. डॉ. पूजा कहती हैं कि सही समय पर पहचान और लाइफस्टाइल में छोटे बदलाव भविष्य में हार्ट अटैक, स्ट्रोक और किडनी की बीमारियों के खतरे को काफी हद तक कम कर सकते हैं. इसलिए इन संकेतों को समय पर पहचानना जरूरी है. About the Author प्रिया गौतमSenior Correspondent Priya Gautam is an accomplished journalist currently working with Hindi.News18.com with over 14 years of extensive field reporting experience. Previously worked with Hindustan times group (Hindustan Hindi) and …और पढ़ें News18 न्यूजलेटर अब ईमेल पर इनसाइड स्‍टोर‍ीज खबरों के पीछे की खबर अब आपके इनबॉक्‍स में सबमिट करें Location : Delhi,Delhi,Delhi

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क्या गर्मियों में खाना चाहिए अंडा? हां या ना… जान लीजिए डॉक्टर की जुबानी

Last Updated:May 21, 2026, 15:20 IST Mirzapur News: कहा जाता है कि गर्मियों के दिनों में अंडा नहीं खाना चाहिए… पर क्या सच में ? यही जानने के लिए हमने डाइटीशियन से बात की. उन्होंने सारा भ्रम दूर किया और बताया कि अंडा खाना चाहिए या नहीं. मिर्जापुर: अक्सर आपके मन में सवाल रहता है कि गर्मियों में अंडे खाने चाहिए या नहीं. कई बार कुछ लोग गर्मियों के मौसम में अंडे को खाना ही छोड़ देते हैं. दरअसल, कहा जाता है कि गर्मियों के दिनों में अंडा नहीं खाना चाहिए. अब इस बात में कोई सच्चाई है भी या नहीं… ये आज हम आपको बताने वाले हैं. लोकल 18 की टीम ने मंडलीय अस्पताल की डाइटीशियन से इस बारे में बात की तो पता चला कि अंडा से गर्मी होने जैसी बात में कोई सच्चाई नहीं है. बिना किसी चिंता के अंडा खा सकते हैं. डाइटीशियन डॉ. ज्योति सिंह ने कहा कि अंडा किसी भी सीजन में खा सकते हैं. अंडे में सबसे ज्यादा प्रोटीन मिलता है. इसे प्रोटीन का बेहतर सोर्स माना जाता है, जो लोग भी अंडे खाते हैं वह खा सकते हैं. अक्सर मन में चलता रहता है कि गर्मियों में अंडे खाने से गर्मी होती है. यह नुकसान पहुंचाता है. हालांकि, ऐसा नहीं है. अंडे को खाने के बाद डाइजेस्ट होने में थोड़ा वक्त लगता है. यहीं वजह है कि लोग कहते हैं कि अंडा खाने से गर्मी होती है बाकी ऐसा कुछ नहीं है. यह आपके के लिए ज्यादा स्वास्थ्यवर्धक है. दो अंडे हैं पर्याप्तडॉ. ज्योति सिंह ने बताया कि किसी भी संतुलित आहार के साथ दो अंडे ले सकते हैं. जब भी हाई प्रोटीन रिच चीजों को लेते हैं तो ऐसे में हाइड्रेटेड रहना फायदेमंद रहता है. अंडे में क्युरीन नामक पदार्थ होता है. ऐसे में जब भी अंडे खाएं तो पानी ज्यादा से ज्यादा मात्रा में पिएं. अन्यथा यह गठिया जैसी बीमारी का कारक हो सकता है. अंडे खाने के बाद नींद अच्छी लें. नींद पूरी न होने पर वेस्ट बनकर बाहर निकल जाता है. कोई फायदा हमारे शरीर को नहीं मिलता है. अगर आप अंडे खाने को लेकर सोच रहे हैं तो ये बेस्ट जगह है. अंडे खाए पर ज्यादा मात्रा में न खाए. यह नुकसानदेह हो सकता है. About the Author काव्‍या मिश्रा Kavya Mishra is working with News18 Hindi as a Senior Sub Editor in the regional section (Uttar Pradesh, Uttarakhand, Haryana and Himachal Pradesh). Active in Journalism for more than 7 years. She started her j…और पढ़ें News18 न्यूजलेटर अब ईमेल पर इनसाइड स्‍टोर‍ीज खबरों के पीछे की खबर अब आपके इनबॉक्‍स में सबमिट करें Location : Mirzapur,Uttar Pradesh

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अंडे और पनीर की भुर्जी में क्या अंतर है, आपकी सेहत के लिये कौन है ज्यादा फायदेमंद? जानिये

अंडे और पनीर दोनों ही पोषण से भरपूर खाद्य पदार्थ हैं और भारतीय रसोई में इनकी भुर्जी बेहद लोकप्रिय है. लेकिन जब सवाल आता है कि दोनों में से कौन ज्यादा फायदेमंद है, तो इसका जवाब सीधा नहीं होता. यह आपके शरीर की जरूरत, जीवनशैली और खान-पान की आदतों पर निर्भर करता है. आइए विस्तार से समझते हैं. अंडे की भुर्जी के फायदेअंडे को “सुपरफूड” माना जाता है क्योंकि इसमें लगभग सभी जरूरी पोषक तत्व मौजूद होते हैं. हाई क्वालिटी प्रोटीन: अंडे में ऐसा प्रोटीन होता है जो शरीर द्वारा आसानी से अवशोषित हो जाता है. यह मसल्स बनाने और बॉडी रिपेयर में मदद करता है. कम कैलोरी: एक अंडे में लगभग 70–80 कैलोरी होती है, जिससे यह वजन कम करने वालों के लिए अच्छा विकल्प बनता है.विटामिन्स और मिनरल्स: इसमें विटामिन B12, D, आयरन और ओमेगा-3 फैटी एसिड होते हैं, जो दिमाग और हड्डियों के लिए फायदेमंद हैं. आसानी से पचता है: अंडे की भुर्जी हल्की होती है और जल्दी पच जाती है, इसलिए बीमार या रिकवरी कर रहे लोगों के लिए अच्छी मानी जाती है. जो लोग जिम करते हैं, फिटनेस पर ध्यान देते हैं या वजन कम करना चाहते हैं, उनके लिए अंडे की भुर्जी ज्यादा लाभकारी होती है. पनीर भुर्जी के फायदेपनीर खास तौर पर शाकाहारी लोगों के लिए एक बेहतरीन प्रोटीन स्रोत है. प्रोटीन और कैल्शियम का अच्छा स्रोत: पनीर हड्डियों और दांतों को मजबूत बनाता है.ऊर्जा और तृप्ति: यह धीरे-धीरे पचता है, जिससे लंबे समय तक पेट भरा हुआ महसूस होता है.वजन बढ़ाने में मददगार: इसमें फैट की मात्रा अंडे की तुलना में अधिक होती है, जो कमजोर या दुबले लोगों के लिए फायदेमंद हो सकती है.शाकाहारी विकल्प: जो लोग अंडा नहीं खाते, उनके लिए पनीर एक बेहतरीन विकल्प है. बच्चों, बुजुर्गों और उन लोगों के लिए जो ताकत बढ़ाना चाहते हैं, पनीर भुर्जी अच्छी रहती है. किसके लिए क्या बेहतर है?वजन कम करना चाहते हैं: अंडे की भुर्जी बेहतर है क्योंकि इसमें कम कैलोरी और ज्यादा प्रोटीन होता है.वजन या ताकत बढ़ाना चाहते हैं: पनीर भुर्जी फायदेमंद है.शाकाहारी हैं: पनीर सबसे अच्छा विकल्प है.जल्दी पचने वाला भोजन चाहिए: अंडा बेहतर है.हड्डियों की मजबूती: पनीर ज्यादा लाभकारी है क्योंकि इसमें कैल्शियम अधिक होता है. ध्यान रखने वाली बातेंअंडे ज्यादा मात्रा में खाने से कोलेस्ट्रॉल बढ़ सकता है, इसलिए संतुलित मात्रा में सेवन करें.पनीर ज्यादा खाने से वजन और फैट बढ़ सकता है, खासकर अगर आप पहले से ही कम एक्टिव हैं.दोनों को कम तेल और मसालों के साथ बनाना ज्यादा हेल्दी रहता है. तो इन सभी बातों का ध्यान में रखते हुये हम कह सकते हैं, अंडे और पनीर दोनों ही अपने-अपने तरीके से बेहद फायदेमंद हैं. अंडे की भुर्जी हल्की, जल्दी पचने वाली और फिटनेस के लिए बेहतर है, जबकि पनीर भुर्जी ज्यादा ऊर्जा और कैल्शियम देती है और शाकाहारियों के लिए बढ़िया विकल्प है.

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लू लगने पर पैरासिटामोल क्यों हो जाती है बेअसर, हीट स्ट्रोक का शिकार होने पर क्या करें, यहां जानें सबकुछ

Last Updated:May 21, 2026, 14:36 IST Heat Stroke Prevention Tips: हीट स्ट्रोक एक इमरजेंसी कंडीशन है, जिसमें शरीर का टेंपरेचर 40 डिग्री या इससे ज्यादा हो जाता है. डॉक्टर्स के अनुसार हीट स्ट्रोक होने पर शरीर को तुरंत ठंडा करना और मेडिकल मदद लेना जरूरी है, वरना व्यक्ति की जान जा सकती है. हीट स्ट्रोक में पैरासिटामोल दवा भी काम नहीं करती है, क्योंकि कोर टेंपरेचर बाहरी कारणों से बढ़ता है. गर्मी हीट स्ट्रोक से बचने के लिए धूप में बाहर न निकलें. Can Paracetamol Help in Heat Stroke: देश के कई हिस्सों में इस वक्त गर्मी से बुरा हाल है. आसमान से आग बरस रही है और गर्म हवाएं लोगों का जीना मुश्किल कर रही हैं. कई जगहों पर भीषण हीटवेव यानी लू चल रही है. तेज धूप और अत्यधिक तापमान शरीर पर गंभीर असर डाल सकते हैं. कई लोग लू लगने पर बुखार समझकर पैरासिटामोल खा लेते हैं, लेकिन एक्सपर्ट्स के मुताबिक हीट स्ट्रोक में यह दवा अक्सर असरदार नहीं होती. ऐसे में यह समझना बेहद जरूरी है कि लू लगने और सामान्य बुखार में क्या फर्क होता है और हीट स्ट्रोक की स्थिति में तुरंत क्या करना चाहिए. लखनऊ के मेदांता हॉस्पिटल के इमरजेंसी डिपार्टमेंट के हेड डॉ. लोकेंद्र गुप्ता ने News18 को बताया जब गर्म हवाएं और धूप के कारण हमारे शरीर का कूलिंग सिस्टम फेल हो जाता है, तब इस कंडीशन को हीट स्ट्रोक कहा जाता है. हीट स्ट्रोक के कारण शरीर का कोर टेंपरेचर तेजी से बढ़कर 40°C या उससे ज्यादा हो जाता है और शरीर खुद को ठंडा रखने में असफल हो जाता है. समय पर इलाज न मिलने पर यह हीट स्ट्रोक जानलेवा साबित हो सकता है. हीट स्ट्रोक के दौरान शरीर में कई गंभीर लक्षण दिखाई दे सकते हैं. इनमें तेज बुखार, चक्कर आना, अत्यधिक कमजोरी, सिरदर्द, उल्टी, भ्रम की स्थिति, तेज धड़कन, ड्राई स्किन और बेहोशी शामिल हो सकते हैं. कई बार मरीज को पसीना आना भी बंद हो जाता है, जो गंभीर संकेत माना जाता है. लू लगने पर पैरासिटामोल क्यों नहीं करती असर? डॉक्टर के अनुसार पैरासिटामोल सामान्य बुखार में इसलिए काम करती है, क्योंकि वह शरीर के तापमान को कंट्रोल करने वाले ब्रेन के हिस्से पर असर डालती है. हीट स्ट्रोक में शरीर का तापमान संक्रमण की वजह से नहीं, बल्कि बाहरी गर्मी और शरीर की कूलिंग सिस्टम फेल होने की वजह से बढ़ता है. इसलिए पैरासिटामोल इस स्थिति में ज्यादा फायदा नहीं पहुंचाती है. हीट स्ट्रोक में पैरासिटामोल लेने से बचना चाहिए. अगर किसी व्यक्ति में हीट स्ट्रोक के लक्षण दिखाई दें, तो उसे तुरंत ठंडी और छायादार जगह पर ले जाएं. शरीर का तापमान कम करने के लिए गीले कपड़े या ठंडे पानी की पट्टियां इस्तेमाल करें. पंखा या कूलर चलाएं और अगर व्यक्ति होश में है, तो उसे पानी या ORS पिलाने की कोशिश करें. किन लोगों को ज्यादा खतरा और कैसे करें बचाव? एक्सपर्ट की मानें तो छोटे बच्चे, बुजुर्ग, गर्भवती महिलाएं और पहले से बीमार लोग हीट स्ट्रोक के ज्यादा शिकार हो सकते हैं. जो लोग लंबे समय तक धूप में काम करते हैं, जैसे मजदूर, डिलीवरी वर्कर्स या ट्रैफिक पुलिस, उनमें भी इसका खतरा अधिक रहता है. हीट स्ट्रोक से बचने के लिए दोपहर 12 बजे से 4 बजे के बीच तेज धूप में निकलने से बचना चाहिए. शरीर को हाइड्रेट रखने के लिए पर्याप्त पानी, नारियल पानी, छाछ और ORS का सेवन करें. हल्के रंग के ढीले कपड़े पहनें और बाहर निकलते समय सिर को ढककर रखें. ज्यादा कैफीन और शराब से बचना भी जरूरी माना जाता है, क्योंकि इससे डिहाइड्रेशन बढ़ सकता है. कब डॉक्टर से संपर्क करना चाहिए? अगर किसी व्यक्ति का शरीर बहुत ज्यादा गर्म हो, वह बार-बार उल्टी कर रहा हो, बेहोश हो जाए या भ्रम की स्थिति में हो, तो तुरंत डॉक्टर या इमरजेंसी सेवा से संपर्क करना चाहिए. हीट स्ट्रोक को नजरअंदाज करना खतरनाक साबित हो सकता है. सही समय पर इलाज मिलने से गंभीर जटिलताओं से बचा जा सकता है. गंभीर स्थिति में तुरंत मेडिकल सहायता लेना जरूरी होता है, क्योंकि हीट स्ट्रोक इमरजेंसी स्थिति मानी जाती है. सेहत, रिलेशनशिप, लाइफ या धर्म-ज्योतिष से जुड़ी है कोई निजी उलझन तो हमें करें WhatsApp, आपका नाम गोपनीय रखकर देंगे जानकारी. About the Author अमित उपाध्याय अमित उपाध्याय News18 हिंदी की लाइफस्टाइल टीम के अनुभवी पत्रकार हैं, जिनके पास प्रिंट और डिजिटल मीडिया में 9 वर्षों से अधिक का अनुभव है। वे हेल्थ, वेलनेस और लाइफस्टाइल से जुड़ी रिसर्च-बेस्ड और डॉक्टर्स के इंटरव्…और पढ़ें News18 न्यूजलेटर अब ईमेल पर इनसाइड स्‍टोर‍ीज खबरों के पीछे की खबर अब आपके इनबॉक्‍स में सबमिट करें

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पार्क-मैदानों में दिखने वाली इस मामूली हरी घास में छिपा है सेहत का बड़ा राज, इसके फायदे जान चौंक जाएंगे

Last Updated:May 21, 2026, 14:04 IST Summer Health Tips: गर्मियों के मौसम में शरीर को ठंडा और हाइड्रेट रखने के लिए लोग न जाने कितने तरह के महंगे प्रोडक्ट्स और ड्रिंक्स का इस्तेमाल करते हैं. लेकिन क्या आप जानते हैं कि आपके घर के आस-पास उगने वाली एक मामूली सी हरी घास औषधीय गुणों का खजाना है. आयुर्वेद में इसे एक बेहतरीन हेल्थ टॉनिक माना गया है, जो बिना किसी खर्च के शरीर को अंदर से एकदम कूल रखता है. आखिर क्या है यह चीज और इसके इस्तेमाल का सही तरीका क्या है, आइए जानते हैं. Summer Health Tips: चिलचिलाती गर्मी और लू के थपेड़ों से बचने के लिए लोग अक्सर महंगे ठंडे पेय पदार्थों और पैकेज्ड जूस का सहारा लेते हैं. लेकिन हमारे आस-पास ही प्रकृति ने कई ऐसी अनमोल चीजें दी हैं, जो बेहद कम खर्च में शरीर को न सिर्फ ठंडा रखती हैं बल्कि बीमारियों से भी बचाती हैं. ऐसी ही एक प्राकृतिक और गुणकारी चीज है दूब घास (दूर्वा). आम तौर पर लोग इसे सिर्फ पूजा-पाठ या बगीचे की हरियाली तक ही सीमित समझते हैं, लेकिन आयुर्वेद में इसे सेहत के लिए वरदान माना गया है. ऋषिकेश के डॉ राजकुमार (आयुष) ने इस साधारण सी दिखने वाली घास के कुछ ऐसे अचूक फायदे बताए हैं, जो गर्मियों में आपके बड़े काम आ सकते हैं. शरीर को अंदर से ठंडा रखता है दूब का रस डॉ राजकुमार के अनुसार, दूब घास में प्राकृतिक रूप से ठंडक देने वाले गुण मौजूद होते हैं. तेज गर्मी और लू के मौसम में इसका रस पीना बेहद फायदेमंद माना जाता है. यह शरीर के तापमान को संतुलित रखता है और अंदरूनी गर्मी को शांत करता है. गांव और पहाड़ी इलाकों में आज भी बुजुर्ग सुबह खाली पेट दूब घास का रस पानी में मिलाकर पीते हैं. यह एक ऐसा देसी और आसान उपाय है, जो शरीर को लू के हानिकारक असर से सुरक्षित रखता है. यह भी पढ़ें : वजन कंट्रोल से लेकर मजबूत हड्डियों तक, गर्मी में मिलेट्स खाने के कई फायदे, सेवन का तरीका जान लें हर्बल ड्रिंक की तरह करें इस्तेमाल, शरीर रहेगा हाइड्रेटदूब घास का उपयोग सिर्फ रस निकालने तक ही सीमित नहीं है. इसे पानी में अच्छी तरह उबालकर और फिर ठंडा करके एक बेहतरीन हर्बल ड्रिंक की तरह भी पिया जा सकता है. यह ड्रिंक चिलचिलाती गर्मी में शरीर को लंबे समय तक हाइड्रेट रखने में मदद करती है. बाजार में मिलने वाले केमिकल वाले कोल्ड ड्रिंक्स के मुकाबले यह प्राकृतिक ड्रिंक शरीर को बिना किसी नुकसान के ताजगी और हल्कापन महसूस कराती है. यही वजह है कि पहाड़ी क्षेत्रों में लोग आज भी पैकेज्ड चीजों के बजाय इस पारंपरिक नुस्खे पर भरोसा करते हैं. ओस से भीगी घास पर नंगे पैर चलने के फायदेदूब घास का एक और बेहतरीन उपयोग है सुबह के समय इस पर नंगे पैर टहलना. सुबह की ताजी ओस से भीगी हुई दूब घास पर चलने से पैरों को गजब की ठंडक मिलती है. आयुर्वेद और घरेलू मान्यताओं के अनुसार, ऐसा करने से मानसिक तनाव बहुत कम होता है और मन को गहरी शांति मिलती है. दिन की एक सकारात्मक शुरुआत करने के लिए पहाड़ों और गांवों में आज भी लोग सुबह-सुबह पार्कों या खेतों के किनारे दूब घास पर टहलना पसंद करते हैं. इसके अलावा यह त्वचा की छोटी-मोटी समस्याओं को दूर करने में भी मददगार मानी जाती है. हालांकि, हर किसी का शरीर अलग होता है, इसलिए किसी भी नुस्खे को अपनाने से पहले डॉक्टर की सलाह जरूर ले लें. About the Author Seema Nath सीमा नाथ 6 साल से मीडिया के क्षेत्र में काम कर रही हैं. उन्होंने अपने करियर की शुरुआत शाह टाइम्स में रिपोर्टिंग के साथ की जिसके बाद कुछ समय उत्तरांचल दीप, न्यूज अपडेट भारत के साथ ही लोकल 18 (नेटवर्क18) में काम …और पढ़ें News18 न्यूजलेटर अब ईमेल पर इनसाइड स्‍टोर‍ीज खबरों के पीछे की खबर अब आपके इनबॉक्‍स में सबमिट करें Location : Rishikesh,Dehradun,Uttarakhand

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यो लो, पीरियड्स में दिक्कत होने पर शराब पीने लगती हैं महिलाएं! खूब जोर की लगती है तलब, चॉकलेट दूसरे नंबर पर

महिलाओं में मासिक धर्म यानी पीरियड्स की शुरुआत होने से कुछ दिनों पहले से ही कुछ लक्षण नजर आने लगते हैं. किसी को पेट में दर्द होता है, तो किसी को बहुत ज्यादा मूड स्विंग, चिड़चिड़ापन, सिर दर्द होना शुरू हो जाता है. कुछ महिलाओं को तो पीरियड्स शुरू होने से पहले किसी चीज की क्रेविंग्स बहुत तेज होती है. आमतौर पर ये देखा गया है कि महिलाओं में प्रीमेंस्ट्रुअल सिंड्रोम (PMS) में नमकीन, चॉकलेट, आइसक्रीम या फिर कोई भी मीठी चीजें खाने की जबरदस्त क्रेविंग होती है. अब कुछ शोधकर्ताओं के अनुसार, प्रीमेंस्ट्रुअल सिंड्रोम में कुछ महिलाओं के अंदर शराब के सेवन की भी इच्छा उत्पन्न होती है. शोध के अनुसार, प्रीमेंस्ट्रुअल सिंड्रोम में एल्कोहल लेने की क्रेविंग जटिल हार्मोनल बदलावों से जुड़ी हो सकती है. एस्ट्रोजन और प्रोजेस्टेरोन के स्तर में उतार-चढ़ाव मस्तिष्क की रसायन प्रक्रिया, खासकर डोपामिन रिवार्ड सिस्टम, को प्रभावित करते हैं, जिससे साइकिल के कुछ चरणों में शराब अधिक आकर्षक लग सकती है. पीरियड्स के दौरान शराब की क्रेविंग क्यों बढ़ती है? कई महिलाओं को पीरियड्स आने से पहले मूड स्विंग्स, थकान, चिड़चिड़ापन और अलग-अलग तरह की क्रेविंग्स महसूस होती हैं. हाल में हुए शोध के अनुसार, कुछ महिलाओं में शराब पीने की इच्छा भी बढ़ सकती है. विशेषज्ञों का मानना है कि इसके पीछे शरीर में होने वाले हार्मोनल बदलाव अहम भूमिका निभाते हैं. पीरियड्स साइकिल और हार्मोन का असरआमतौर पर पीरियड्स साइकिल सामान्यतः 28 दिनों का होता है, जिसमें मुख्य रूप से दो चरण शामिल होते हैं: फॉलिक्युलर फेज- यह ओव्यूलेशन से पहले का समय होता है.ल्यूटियल फेज- यह ओव्यूलेशन के बाद और पीरियड्स शुरू होने से पहले का समय होता है. शोधों के अनुसार, शराब की क्रेविंग अक्सर उस समय बढ़ती है, जब शरीर में एस्ट्रोजन लेवल ऊपर जा रहा होता है. खासकर मिड-फॉलिक्युलर फेज और ल्यूटियल फेज के दौरान यह इच्छा अधिक महसूस हो सकती है. प्रोजेस्टेरोन में गिरावट और पीएमएसजब गर्भधारण नहीं होता, तो पीरियड्स से पहले एस्ट्रोजन और प्रोजेस्टेरोन दोनों हार्मोन तेजी से गिरते हैं. इस दौरान कई महिलाओं को PMS के लक्षण महसूस हो सकते हैं. ये लक्षण निम्न हो सकते हैं. मूड स्विंग्सचिंता, स्ट्रेसचिड़चिड़ापनउदासीथकान जब आप शराब का सेवन करते हैं तो अस्थायी रूप से ये नर्वस सिस्टम को शांत करती है.डोपामिन बढ़ाती है, इसलिए कुछ महिलाओं में ये इमोशनल स्ट्रेस से राहत पाने का आसान तरीका लग सकती है. सेहत, रिलेशनशिप, लाइफ या धर्म-ज्योतिष से जुड़ी है कोई निजी उलझन तो हमें करें WhatsApp, आपका नाम गोपनीय रखकर देंगे जानकारी. क्या कहती है रिसर्च?2025 में हुई एक स्टडी में शोधकर्ताओं ने 21 से 35 वर्ष की महिलाओं को लगातार कई दिनों तक ट्रैक किया. उन्होंने पाया कि पीरियड्स साइकिल के दौरान शराब की क्रेविंग में स्पष्ट बदलाव दिखाई देते हैं. अध्ययन में कहा गया कि ओव्यूलेशन से पहले शराब की इच्छा अधिक हो सकती है. जब एस्ट्रोजन अधिक और प्रोजेस्टेरोन कम होता है, तब क्रेविंग बढ़ सकती है. ये हॉर्मोनल बदलाव बिंज ड्रिंकिंग से भी जुड़े हो सकते हैं. शराब क्यों नुकसानदायक हो सकती है?शराब थोड़ी देर के लिए राहत दे सकती है, लेकिन लंबे समय में यह पीएमएस के लक्षणों को और खराब कर सकती है. इससे आपकी नींद खराब हो सकती है. चिंता बढ़ सकती है, शरीर में सूजन और ब्लोटिंग हो सकती है. मूड अधिक अस्थिर हो सकता है. खासकर ल्यूटियल फेज में इसका असर ज्यादा महसूस हो सकता है. शराब की क्रेविंग को कैसे करें कंट्रोल?-अपने पीरियड्स साइकिल को ट्रैक करें.-ऐप्स या कैलेंडर की मदद से उन दिनों को पहचानें, जब cravings ज्यादा होती हैं. इससे आप पहले से खुद को तैयार कर सकती हैं.-शराब की जगह हेल्दी विकल्प चुनें, जैसे हर्बल टी, मॉकटेल, नारियल पानी पिएं.-अपनी लाइफस्टाइल को सुधारें. पर्याप्त नींद लें. संतुलित भोजन करें. मैग्नीशियम और बी-विटामिन युक्त डाइट लें.-योग, मेडिटेशन और हल्की एक्सरसाइज करें.-आप शराब पीना चाहती हैं तो मात्रा सीमित रखें. पर्याप्त पानी पिएं.– बहुत अधिक क्रेविंग हो तो एक बार विशेषज्ञ से सलाह जरूर लें.

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