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Health Tips: मटन-चिकन छोड़ गर्मियों में खाएं ये मछली, शरीर रहेगा ठंडा और फिट, जानिए डॉक्टर की राय

Last Updated:May 21, 2026, 12:10 IST Health Tips: मई-जून की तेज गर्मी में सही आहार चुनना बेहद जरूरी है. एक्सपर्ट्स का मानना है कि सही भोजन आपको लू और कमजोरी से बचा सकता है. रोहू और कतला जैसी ताजी मछलियां इस मौसम में खास फायदेमंद हैं. ये सिर्फ शरीर को ठंडक नहीं देतीं, बल्कि इनमें मौजूद ओमेगा-3 थकान को भी जल्दी दूर करता है. जानिए क्यों इस गर्मी में मटन या चिकन के बजाय ताजी मछली चुनना बेहतर है और कौन-सी डाइट टिप्स डॉक्टर सलाह देते हैं. (रिपोर्ट: शिवांक द्विवेदी/सतना) मई-जून की तपती गर्मी में जब पारा 45 डिग्री के पार जाने लगता है तब सबसे बड़ा सवाल हमारे खान-पान को लेकर होता है. क्या इस मौसम में नॉन-वेज खाना सही है? तो चलिए जानते है कौन सी मछली आपकी सेहत के लिए सुपर फूड साबित हो सकती है? ये मछलियां न केवल आपके स्वाद का ध्यान रखेंगी बल्कि इस भीषण गर्मी में आपके शरीर को ठंडक और ताकत भी देंगी. भीषण गर्मी के मौसम में हमारा शरीर जल्दी थक जाता है और डिहाइड्रेशन की समस्या बनी रहती है. जिला पशु चिकित्सालय प्रभारी डॉ. बृहस्पति भारती ने लोकल 18 से बातचीत में कहा कि इस मौसम में रोहू और कतला जैसी मछलियां सेहत के लिए वरदान हैं. रोहू को तो मछलियों का राजा माना जाता है. डॉक्टरों का मानना है कि रोहू और कतला में भरपूर मात्रा में ओमेगा-3 फैटी एसिड पाया जाता है. यह न केवल आपके दिल का ख्याल रखता है बल्कि गर्मी के कारण होने वाली थकान और कमजोरी को दूर कर शरीर को इंस्टेंट एनर्जी देता है. Add News18 as Preferred Source on Google सबसे बड़ी बात यह है कि ये मछलियां लीन प्रोटीन का स्रोत हैं जो पेट को भारी नहीं करतीं. क्योंकि मछलियों में प्रोटीन की मात्रा चिकन और मटन से कही अधिक होती है साथ ही यह पचने में भी उनसे कहीं ज्यादा हल्की होती है. मई और जून का महीना मत्स्य पालकों के लिए भी उत्सव जैसा होता है. इसी समय तालाबों में मछलियों के बीज डाले जाते हैं और टमस व सतना जैसी नदियों में ताजी मछलियां पकड़ी जाती हैं. डॉ. भारती बताते हैं कि ग्रामीण इलाकों में लोग आज भी नदी, नालों, तालाबों में मिलने वाली पारंपरिक मछलियों जैसे सिंघी, पॉम, पाहिन और कैटफिश को काफी पसंद करते हैं. पुराने बुजुर्गों का मानना है कि प्राकृतिक बहते पानी की मछलियां ज्यादा पौष्टिक होती हैं. हालांकि, खाने वालों की अपनी पसंद होती है जहां रोहू अपने लाजवाब स्वाद के लिए जानी जाती है वहीं इसमें कांटों की संख्या थोड़ी ज्यादा होती है. जो लोग कांटों से बचना चाहते हैं उनके लिए सिंगल बोन वाली पाहिन और पॉम मछलियां बेहतरीन विकल्प साबित होती हैं. गर्मी में मछली खाते समय कुछ बातों का ध्यान रखना बेहद जरूरी है. डॉक्टरों की सलाह है कि हमेशा ताजी मछली ही खरीदें. बासी या बर्फ में बहुत दिनों से रखी मछली पेट खराब कर सकती है. साथ ही गर्मी में मछली को बहुत ज्यादा तेल-मसाले में बनाने के बजाय हल्का ग्रिल करके या कम मसालों वाली करी बनाकर खाना ज्यादा फायदेमंद होता है. वहीं बघेलखंड के खानपान की बात करें तो यहां रोहू और कतला का क्रेज सबसे ज्यादा है. यह न केवल किफायती हैं बल्कि स्थानीय स्तर पर आसानी से उपलब्ध भी हैं. यह आपको गर्मी से लड़ने की शक्ति भी देगी और आपकी जीभ को वो खास जायका भी. न्यूज़18 को गूगल पर अपने पसंदीदा समाचार स्रोत के रूप में जोड़ने के लिए यहां क्लिक करें।

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क्या ज्यादा धूप में रहने से मोतियाबिंद का खतरा बढ़ जाता है? डॉक्टर से जानिए क्या है सच्चाई

Last Updated:May 21, 2026, 12:09 IST Sunlight and Cataract Risk: लंबे समय तक तेज धूप में रहने से मोतियाबिंद का खतरा बढ़ सकता है. डॉक्टर तुषार ग्रोवर के अनुसार धूप में अल्ट्रावॉयलेट किरणें होती हैं, जो आंखों को नुकसान पहुंचा सकती हैं. इससे ड्राइनेस, एलर्जी, इंफेक्शन और कई तरह के आंखों के कैंसर का खतरा भी बढ़ सकता है. गर्मी में बाहर निकलते समय सनग्लासेस जरूर पहनने चाहिए. डॉक्टर की मानें तो मोतियाबिंद एक उम्र संबंधी समस्या है, लेकिन धूप से इसका खतरा थोड़ा-बहुत बढ़ जाता है. Cataract and Sun Exposure: गर्मियों में तेज धूप और अल्ट्रावॉयलेट किरणों का कहर बढ़ जाता है. अधिकतर लोग यह जानते हैं कि तेज धूप में बाहर जाने से स्किन को नुकसान होता है, लेकिन इससे आंखों को भी गंभीर नुकसान हो सकता है. गर्मी में आंखों से जुड़ी कई समस्याएं भी बढ़ जाती हैं. कई लोग मानते हैं कि ज्यादा धूप में रहने से मोतियाबिंद का खतरा बढ़ सकता है. मोतियाबिंद एक ऐसी बीमारी है, जो 50 से 60 साल की उम्र के बाद ज्यादातर लोगों को होती है. डॉक्टर से जानने की कोशिश करते हैं कि क्या वाकई तेज धूप से मोतियाबिंद का जोखिम बढ़ जाता है. दिल्ली के विजन आई सेंटर के मेडिकल डायरेक्टर डॉ. तुषार ग्रोवर ने News18 को बताया मोतियाबिंद आंखों की एक आम समस्या है, जिसमें आंख के लेंस में धुंधलापन आने लगता है. इसकी वजह से चीजें साफ दिखाई नहीं देतीं और धीरे-धीरे नजर कमजोर होने लगती है. मोतियाबिंद एक एज रिलेटेड समस्या है और अधिकतर बुजुर्गों को मोतियाबिंद का ऑपरेशन कराना पड़ता है. हालांकि आंख में चोट, ज्यादा धूप में रहना और डायबिटीज के कारण कम उम्र में भी इसका रिस्क बढ़ जाता है. लंबे समय तक आंखें अल्ट्रावॉयलेट किरणों के संपर्क में रहेंगी, तो मोतियाबिंद समेत कई खतरनाक आई डिजीज का रिस्क बढ़ जाएगा. इसलिए गर्मी के मौसम में धूप से आंखों का बचाव जरूरी है, ताकि आंखें हेल्दी रहें. आंखों के लिए खतरनाक हैं UV किरणें डॉक्टर ग्रोवर के मुताबिक ज्यादा धूप और अल्ट्रावॉयलेट किरणों से मोतियाबिंद की स्पीड थोड़ी बढ़ सकती है, लेकिन इसे सबसे बड़ी वजह मानना सही नहीं होगा. UV किरणों की वजह से गर्मी में आई ड्राइनेस, एलर्जी और कंजंक्टिवाइटिस का रिस्क बढ़ जाता है. यूवी किरणों से कई तरह के आंखों के कैंसर का खतरा भी बढ़ सकता है. इसलिए लोगों को अल्ट्रावॉयलेट किरणों को लेकर लापरवाही नहीं बरतनी चाहिए और इससे बचाव करने की पूरी कोशिश करनी चाहिए. यूवी किरणों से बचने के लिए क्या करें एक्सपर्ट ने बताया कि गर्मी में अपनी आंखों को हेल्दी रखने के लिए यूवी किरणों से प्रोटेक्ट करने वाले सनग्लासेस पहनें. अगर यूवी प्रोटेक्शन वाला चश्मा न हो, तो नॉर्मल सनग्लासेस भी पहन सकते हैं. इससे भी कुछ हद तक आंखों का बचाव होगा. गर्मी में बाहर धूप में निकलने से बचें और दोपहर के वक्त घर में अंदर रहने की कोशिश करें. आंखों में ड्राइनेस होने पर लुब्रिकेंट ड्रॉप्स का इस्तेमाल करें. पर्याप्त मात्रा में पानी पिएं, ताकि आंखों की नमी बरकरार रहे. अगर किसी तरह की परेशानी हो, तो डॉक्टर से संपर्क करें और सही इलाज कराएं. आंखों को लेकर लापरवाही बिल्कुल न बरतें. सेहत, रिलेशनशिप, लाइफ या धर्म-ज्योतिष से जुड़ी है कोई निजी उलझन तो हमें करें WhatsApp, आपका नाम गोपनीय रखकर देंगे जानकारी. About the Author अमित उपाध्याय अमित उपाध्याय News18 हिंदी की लाइफस्टाइल टीम के अनुभवी पत्रकार हैं, जिनके पास प्रिंट और डिजिटल मीडिया में 9 वर्षों से अधिक का अनुभव है। वे हेल्थ, वेलनेस और लाइफस्टाइल से जुड़ी रिसर्च-बेस्ड और डॉक्टर्स के इंटरव्…और पढ़ें News18 न्यूजलेटर अब ईमेल पर इनसाइड स्‍टोर‍ीज खबरों के पीछे की खबर अब आपके इनबॉक्‍स में सबमिट करें

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Summer Skin care: गर्मियों में ऐसे रखें अपनी त्वचा का ख्याल, दूर होगी सनबर्न और टैनिंग की समस्या, चेहरे पर आएगा नेचुरल ग्लो

होमफोटोलाइफ़फैशन गर्मियों में ऐसे रखें अपनी त्वचा का ख्याल, दूर होगी सनबर्न और टैनिंग की समस्या Last Updated:May 21, 2026, 11:31 IST How To Care Skin In Summer: गर्मी का मौसम अपने साथ त्वचा संबंधी कई समस्याएं लेकर आता है. इस मौसम में लगभग हर किसी को त्वचा से जुड़ी कई समस्याएं होने लगती हैं. इस मौसम में लापरवाही आपकी स्किन को डैमेज कर सकती है, जिससे टैनिंग, सनबर्न और मुहांसों जैसी समस्याएं तेजी से बढ़ने लगती हैं. गर्मियों में भी अपनी त्वचा को मुलायम और चमकदार बनाए रखने के लिए इन टिप्स को अपनाएं. (रिपोर्ट: शिवांक द्विवेदी/सतना) गर्मियों की तेज धूप, बढ़ता तापमान और उमस भरा मौसम त्वचा के लिए बड़ी चुनौती बन जाता है. इस मौसम में लापरवाही आपकी स्किन को डैमेज कर सकती है, जिससे टैनिंग, सनबर्न और मुहांसों जैसी समस्याएं तेजी से बढ़ने लगती हैं लेकिन अगर सही समय पर सही देखभाल की जाए, तो यही मौसम आपकी त्वचा को नैचुरल ग्लो भी दे सकता है. लोकल 18 से बातचीत में सतना के विशेषज्ञों ने बताया कि तेज धूप में ज्यादा देर तक रहने से त्वचा झुलस जाती है और काली पड़ने लगती है, जिसे सनबर्न और टैनिंग कहा जाता है. कुछ आसान आदतें अपनाकर आप अपनी त्वचा को हेल्दी, फ्रेश और चमकदार बनाए रख सकते हैं. कामदगिरि आयुर्वेद क्लिनिक के डॉ. सूरज कुशवाहा ने बताया कि गर्मियों में सबसे जरूरी है त्वचा को सूरज की हानिकारक किरणों से बचाना. भीषण गर्मी पड़ रही है और गर्मी के दिनों में छोटे बच्चों की त्वचा पर स्किन रैशेज और घमौरियां होना आम बात है. वहीं शरीर को हाइड्रेट रखना भी बेहद अहम है, इसलिए भरपूर पानी पीना और रसदार फलों का सेवन करना चाहिए.धूप में निकलते समय चेहरे को कपड़े या स्कार्फ से ढकना स्किन प्रोटेक्शन के लिए बेहद कारगर उपाय है. Add News18 as Preferred Source on Google आयुर्वेद में गर्मियों के मौसम में पित्त दोष बढ़ जाता है, जो त्वचा संबंधी समस्याओं की मुख्य वजह बनता है. ज्यादा धूप में रहना, मसालेदार भोजन और कम पानी पीना इस समस्या को और बढ़ा सकता है. इससे बचने के लिए लोगों को छांव में रहना, हल्के और सूती कपड़े पहनना और ठंडी तासीर वाले खाद्य पदार्थों का सेवन करना चाहिए. गर्मियों में पसीने की ग्रंथियां बंद होने से घमौरियां हो जाती हैं, जिसमें लाल दाने, खुजली और जलन की समस्या होती है. इससे राहत पाने के लिए मुल्तानी मिट्टी और गुलाब जल का लेप बेहद फायदेमंद है. इसके अलावा बर्फ को कपड़े में लपेटकर प्रभावित जगह पर लगाने से ठंडक मिलती है. वहीं नीम की पत्तियों को उबालकर उस पानी से नहाना या पेस्ट बनाकर लगाना भी एंटीबैक्टीरियल असर देता है. तेज धूप में ज्यादा देर रहने से त्वचा झुलस जाती है और काली पड़ने लगती है, जिसे सनबर्न और टैनिंग कहा जाता है. इससे बचने के लिए ताजा एलोवेरा जेल त्वचा पर लगाने से जलन और लालिमा कम होती है. इसके अलावा दही और बेसन का पेस्ट टैनिंग हटाने में असरदार माना जाता है. वहीं खीरे का रस त्वचा को ठंडक और हाइड्रेशन देता है, जिससे स्किन फ्रेश बनी रहती है. गर्मी में पसीने और नमी के कारण फंगल इंफेक्शन जैसे दाद और खुजली की समस्या बढ़ जाती है. इसके लिए नारियल तेल, नीम, दही और नींबू का इस्तेमाल फायदेमंद हो सकता है. वहीं चेहरे पर जमा तेल और गंदगी रोमछिद्रों को बंद कर देती है, जिससे बैक्टीरिया पनपते हैं और मुहांसे बढ़ जाते हैं. दिनभर की धूल और पसीने के बाद रात में त्वचा को आराम देना भी उतना ही जरूरी है, इसलिए सोने से पहले नारियल तेल से हल्की मालिश करना चाहिए क्योंकि इससे त्वचा को पोषण मिलता है और खुजली और रैशेज में राहत मिलती है. न्यूज़18 को गूगल पर अपने पसंदीदा समाचार स्रोत के रूप में जोड़ने के लिए यहां क्लिक करें।

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सिर्फ जून-जुलाई में मिलता है ये रसीला फल, नहीं खाया तो पछताएंगे, जानें नाम

Last Updated:May 21, 2026, 11:00 IST Lychee Health Benefits: गर्मियों में जिस तरह लोगों को आम का इंतजार रहता है, उसी तरह कुछ लोगों को लीची का इंतजार रहता है. काफी लोग लीची खाना पसंद करते हैं. रसीली, मीठे स्वाद वाली पानी से भरपूर लीची बेहद ही पौष्टिक फल है. यह मुख्य रूप से गर्मियों का ही फल है, जो मई से जुलाई के महीने में मिलता है. बिहार, उत्तर प्रदेश, वेस्ट बंगाल, उत्तराखंड में इसकी अधिक खेती होती है. बिहार में मुजफ्फरपुर में मिलने वाली लीची देशभर में बहुत मशहूर है. जानिए लीची में कौन से पोषक तत्व होते हैं और इसके सेवन से क्या-क्या फायदे हो सकते हैं. लीची में पाए जाने वाले पोषक तत्व- रसीली लीची में कई तरह के पोषक तत्व होते हैं. गर्मियों में आने वाला ये फल सिर्फ तीन महीने ही मिलता है, वह भी बहुत कम मात्रा में. ऐसे में इसका स्वाद एक बार तो जरूर चख लेना चाहिए. लीची में विटामिन सी ,पोटैशियम, कॉपर, फाइबर, एंटीऑक्सीडेंट्स, कार्बोहाइड्रेट्स, नेचुरल शर्करा, आयरन, मैग्नीशियम, फॉस्फोरस आदि मौजूद होते हैं. लीची में पानी की मात्रा लगभग 82 प्रतिशत होती है. लिची के सेवन से हार्ट की सेहत भी अच्छी होती है. चूंकि, इसमें पोटैशियम काफी होता है, जो ब्लड प्रेशर को रेगुलेट करता है. साथ ही ये हेल्दी ब्लड सर्कुलेशन को भी सपोर्ट करता है. ऐसे में आप इन तीन महीने तो लीची खाने का लुत्फ उठा ही सकते हैं. लिची में विटामिन सी भरपूर होता है. यह इम्यूनिटी को मजबूत बनाने के लिए जरूरी है. विटामिन सी शरीर की कोशिकाओं को ऑक्सीडेटिव स्ट्रेस से बचाने का काम करता है, जिससे इम्यून सिस्टम कॉमन इंफेक्शन, रोगों से लड़ने काम करती है. Add News18 as Preferred Source on Google फाइबर से भरपूर लीची पाचन तंत्र को हेल्दी रखती है. डायटरी फाइबर और पानी से फाइबर होने के कारण ये पेट की सेहत के लिए बेहद ही ज्यादा हेल्दी फल है. कब्ज होने पर लीची खाने से फायदा होता है. सुबह पेट अच्छी तरह से साफ होता है. यदि आपके बाल और त्वचा बहुत डल, बेजान, ड्राई, अनहेल्दी नजर आते हैं तो आप लीची खाएं. इसमें मौजूद विटामिन C कोलेजन बनने में मदद करता है. इससे स्किन हेल्दी और जवां दिखती है. कॉपर जैसे मिनरल्स बालों की वृद्धि को बढ़ावा देते हैं. बालों में चमक आ सकती है. स्कैल्प हेल्दी रहते हैं. गर्मी में अक्सर शरीर की एनर्जी कम हो जाती है. हमेशा थकान महसूस होता है. आप लीची के सेवन से शरीर को भरपूर ऊर्जा प्रदान कर सकते हैं. लीची में मौजूद बी-कॉम्प्लेक्स विटामिन, कॉपर और नेचुरल ग्लूकोज होने के कारण लीची मेटाबॉलिज़्म को संतुलित रखती है. थकान कम करने में मदद करती है. एक दिन में कितनी लीची खानी चाहिए- लीची बेहद फायदेमंद होती है, लेकिन इसका सेवन सीमित मात्रा में ही करना चाहिए. किसी भी चीज को अधिक खाने से फायदे की बजाय नुकसान हो होता है. आप प्रतिदिन लगभग 4 से 8 लीची खाएं. इससे अधिक लीची खाना ठीक नहीं, क्योंकि इसमें नेचुरल ग्लूकोज होता है. साथ ही इनका ग्लाइसेमिक इंडेक्स भी मीडियम होता है. अधिक सेवन से ब्लड शुगर लेवल अचानक से बढ़ सकता है. मामूली एलर्जी, पेट खराब भी हो सकता है. न्यूज़18 को गूगल पर अपने पसंदीदा समाचार स्रोत के रूप में जोड़ने के लिए यहां क्लिक करें।

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नौतपा में 50 डिग्री तक पहुंच सकता है पारा, इस बार कब पड़ेंगे साल के 9 सबसे गर्म दिन, अभी से हो जाएं अलर्ट

Extreme Heat Warning in India: देश के कई राज्यों में गर्मी ने अभी से लोगों की परेशानी बढ़ानी शुरू कर दी है. मौसम विभाग के अनुसार आने वाले दिनों में तापमान और तेजी से बढ़ सकता है. इसी बीच लोग नौतपा को लेकर भी चर्चा कर रहे हैं, जिसे साल के सबसे गर्म दिनों में गिना जाता है. मान्यता है कि नौतपा के दौरान सूर्य की किरणें सीधे धरती पर ज्यादा प्रभाव डालती हैं, जिसकी वजह से भीषण गर्मी पड़ती है. नौतपा में कई इलाकों में तापमान 45 से 50 डिग्री सेल्सियस तक पहुंच सकता है. ऐसे में लोगों को सावधानी बरतनी होगी, ताकि सेहत को नुकसान न हो. नौतपा को लेकर कई धार्मिक मान्यताएं भी हैं. क्या होता है नौतपा? हिंदू पंचांग और ज्योतिष के अनुसार जब सूर्य रोहिणी नक्षत्र में प्रवेश करता है, तब नौतपा की शुरुआत मानी जाती है. यह अवधि लगातार 9 दिनों तक चलती है और इसे साल के सबसे गर्म दिनों का समय माना जाता है. इस दौरान सूर्य की तपिश सबसे ज्यादा महसूस होती है और उत्तर भारत समेत कई हिस्सों में लू का असर काफी बढ़ जाता है. इस साल कब शुरू होगा नौतपा? इस बार नौतपा 25 मई से शुरू होकर 2 जून तक रहने की संभावना है. इन 9 दिनों के दौरान दिन का तापमान सामान्य से काफी ज्यादा रह सकता है. मौसम विभाग के मुताबिक राजस्थान, दिल्ली, हरियाणा, उत्तर प्रदेश और मध्य भारत के कई हिस्सों में तेज गर्मी और हीटवेव की स्थिति बन सकती है. कितना बढ़ सकता है तापमान? नौतपा के दौरान आमतौर पर तापमान 47 से 48 डिग्री सेल्सियस के आसपास रहता है. कई इलाकों में तो तापमान 45 से 52 डिग्री सेल्सियस तक पहुंच सकता है. तेज धूप और गर्म हवाओं के कारण हीटवेव की स्थिति बन सकती है नौतपा क्यों पड़ता है? वैज्ञानिकों के अनुसार इस समय सूर्य कर्क रेखा के करीब पहुंचता है. इससे सूर्य की किरणें ज्यादा सीधी और तीखी हो जाती हैं, जिसके कारण धरती का तापमान तेजी से बढ़ता है. इसका सेहत पर क्या असर पड़ता है? नौतपा में अत्यधिक गर्मी के कारण हीट स्ट्रोक का खतरा बढ़ जाता है. लोगों को डिहाइड्रेशन और कमजोरी महसूस हो सकती है. कई बार चक्कर आने और थकान की शिकायत बढ़ जाती है. नौतपा में बुजुर्गों और बच्चों को ज्यादा सावधानी की जरूरत होती है, क्योंकि उनका शरीर ज्यादा सेंसिटिव होता है. नौतपा में सभी लोगों को अत्यधिक सावधानी बरतनी चाहिए. नौतपा में कैसे करें बचाव? दोपहर 12 बजे से 4 बजे तक धूप में निकलने से बचेंज्यादा से ज्यादा पानी और समय-समय पर ORS पिएंहल्की और लिक्विड डाइट लें, सूती और ढीले कपड़े पहनेंबाहर निकलते समय सिर और चेहरे को ढककर रखें नौतपा को लेकर धार्मिक मान्यताएं धार्मिक मान्यताओं के अनुसार नौतपा में सूर्य देव की तपिश सबसे अधिक होती है. इस दौरान सूर्य देव की पूजा, जल अर्पित करना और मंत्र जाप करना शुभ माना जाता है. मान्यता है कि इससे स्वास्थ्य, ऊर्जा और सकारात्मकता मिलती है. कहा जाता है कि नौतपा जितना तेज पड़ता है, मानसून उतना ही अच्छा होता है. पुराने समय में किसान इसे अच्छी बारिश और बेहतर फसल का संकेत मानते थे. नौतपा को तप का समय भी माना जाता है. धार्मिक रूप से यह आत्मसंयम, साधना और धैर्य का प्रतीक माना जाता है. कई लोग इस दौरान व्रत, दान-पुण्य और पूजा-पाठ करते हैं. भीषण गर्मी के कारण इस समय प्यासे लोगों और जानवरों को पानी पिलाना पुण्य का काम माना जाता है. कई जगहों पर प्याऊ लगाई जाती हैं और जल सेवा की जाती है.

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दिल्ली में हीट स्ट्रोक का पहला मामला, 24 साल का छात्र RML अस्पताल में भर्ती, हालत गंभीर

होमताजा खबरDelhi दिल्ली में हीट स्ट्रोक का पहला मामला, 24 साल का छात्र RML अस्पताल में भर्ती Last Updated:May 21, 2026, 10:09 IST दिल्ली में इस सीजन का पहला हीट स्ट्रोक केस सामने आया है. 24 वर्षीय छात्र को ट्रेन में हालत बिगड़ने के बाद आरएमएल में भर्ती किया गया है. उसका इमर्सन कूलिंग से इलाज क‍िया जा रहा है. फ‍िलहाल छात्र की हालत गंभीर है. द‍िल्‍ली के आरएमएल अस्‍पताल में हीट स्‍ट्रोक का पहला केस आया है. दिल्ली में हीट स्ट्रोक का पहला मामला सामने आया है. राजधानी के डॉक्टर राम मनोहर लोहिया अस्पताल में 24 साल के छात्र को हीट स्ट्रोक की वजह से भर्ती कराया गया है. फिलहाल छात्र की हालत गंभीर है. आरएमएल में छात्र को इमर्सन कूलिंग तकनीक से इलाज दिया जा रहा है. About the Author प्रिया गौतमSenior Correspondent Priya Gautam is an accomplished journalist currently working with Hindi.News18.com with over 14 years of extensive field reporting experience. Previously worked with Hindustan times group (Hindustan Hindi) and …और पढ़ें News18 न्यूजलेटर अब ईमेल पर इनसाइड स्‍टोर‍ीज खबरों के पीछे की खबर अब आपके इनबॉक्‍स में सबमिट करें Location : Delhi,Delhi,Delhi

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क्या पीतल के बर्तन में चाय बनाने से बढ़ जाता है स्वाद? हकीकत जानकर चौंक जाएंगे

Last Updated:May 21, 2026, 10:03 IST Benefits of Making Tea in Brass Pots: कई लोग मानते हैं कि पीतल के बर्तन में बनी चाय का स्वाद बेहतर होता है, लेकिन एक्सपर्ट्स के अनुसार यह हमेशा सुरक्षित नहीं माना जाता. चाय में मौजूद तत्व पीतल के साथ रिएक्शन कर सकते हैं. चाय बनाने के लिए स्टेनलेस स्टील या अन्य फूड-ग्रेड बर्तनों का इस्तेमाल करना ज्यादा बेहतर माना जाता है. पीतल के बर्तनों को चाय बनाने के लिए अच्छा नहीं माना जाता है. Brass Utensils Enhance Tea Flavor: हर साल 21 मई को इंटरनेशनल टी डे मनाया जाता है. यह खास दिन चाय के हेल्थ बेनिफिट्स और महत्व के बारे में जागरूक करने के उद्देश्य से सेलिब्रेट किया जाता है. करोड़ों लोगों के लिए चाय सिर्फ एक ड्रिंक नहीं, बल्कि इमोशन है. हर मौसम में लोग चाय पीना पसंद करते हैं. चाय का स्वाद बेहतर बनाने के लिए लोग अलग-अलग तरीके अपनाते हैं. कोई मिट्टी के कुल्हड़ में चाय पीना पसंद करता है तो कोई तांबे या पीतल के बर्तनों में बनी चाय को ज्यादा स्वादिष्ट मानता है. अब सवाल है कि क्या सच में पीतल के बर्तन में चाय बनाने से उसका स्वाद बढ़ जाता है? यूपी के गाजियाबाद स्थित रंजना न्यूट्रीग्लो क्लीनिक की फाउंडर और डाइटिशियन रंजना सिंह ने News18 को बताया कि पीतल तांबा और जिंक से बना मिश्रधातु होता है. पुराने समय में पीतल के बर्तनों का इस्तेमाल खाना बनाने और पानी रखने के लिए काफी किया जाता था. आयुर्वेद में भी पीतल के बर्तनों को कुछ मामलों में उपयोगी माना गया है. यह धातु गर्मी को तेजी से फैलाती है, इसलिए इसमें खाना जल्दी गर्म हो जाता है. इसी वजह से कुछ लोग मानते हैं कि पीतल के बर्तन में बनी चाय का स्वाद अलग और ज्यादा अच्छा होता है. पीतल के बर्तन में चाय बनाने से स्वाद में हल्का बदलाव महसूस हो सकता है, लेकिन यह हमेशा अच्छा ही हो ऐसा जरूरी नहीं है. चाय में मौजूद टैनिन और दूध जैसी चीजें पीतल की धातु के साथ रिएक्ट कर सकती हैं. इससे चाय का स्वाद थोड़ा मेटैलिक या अलग लगता है. कुछ लोगों को यह स्वाद पसंद आता है, जबकि कई लोगों को यह सामान्य नहीं लगता है. एक्सपर्ट का कहना है कि पीतल के बर्तन में ज्यादा एसिडिक चीजें बनाना सही नहीं माना जाता. चाय में मौजूद तत्व धातु के साथ रिएक्शन कर सकते हैं, खासकर अगर बर्तन अंदर से टिन चढ़ा हुआ न हो. बिना कलई वाले पीतल के बर्तन में चाय बनाने से धातु के कण पेय में मिल सकते हैं, जो लंबे समय में स्वास्थ्य के लिए नुकसानदायक हो सकते हैं. इसी वजह से कई विशेषज्ञ स्टेनलेस स्टील या फूड-ग्रेड बर्तनों को ज्यादा सुरक्षित मानते हैं. डाइटिशियन के अनुसार अगर आप चाय का स्वाद बेहतर बनाना चाहते हैं, तो उसके लिए बर्तनों से ज्यादा जरूरी है सही सामग्री और बनाने का तरीका. ताजी चायपत्ती, सही मात्रा में दूध, अदरक, इलायची और सही उबाल चाय का स्वाद कई गुना बढ़ा सकते हैं. मिट्टी के कुल्हड़ में चाय पीने से भी प्राकृतिक खुशबू और अलग स्वाद महसूस होता है, जिसे कई लोग पसंद करते हैं. पीतल के बर्तन में चाय बनाने से स्वाद में थोड़ा बदलाव जरूर आ सकता है, लेकिन इसे हमेशा बेहतर कहना सही नहीं होगा. सेहत, रिलेशनशिप, लाइफ या धर्म-ज्योतिष से जुड़ी है कोई निजी उलझन तो हमें करें WhatsApp, आपका नाम गोपनीय रखकर देंगे जानकारी. About the Author अमित उपाध्याय अमित उपाध्याय News18 हिंदी की लाइफस्टाइल टीम के अनुभवी पत्रकार हैं, जिनके पास प्रिंट और डिजिटल मीडिया में 9 वर्षों से अधिक का अनुभव है। वे हेल्थ, वेलनेस और लाइफस्टाइल से जुड़ी रिसर्च-बेस्ड और डॉक्टर्स के इंटरव्…और पढ़ें News18 न्यूजलेटर अब ईमेल पर इनसाइड स्‍टोर‍ीज खबरों के पीछे की खबर अब आपके इनबॉक्‍स में सबमिट करें

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सिस्टोलिक और डायस्टोलिक बीपी क्या होता है? इसकी नार्मल रेंज क्या है, एक्सपर्ट से समझिए

Last Updated:May 21, 2026, 08:52 IST Systolic and Diastolic BP: जब भी आप ब्लड प्रेशर चेक करते हैं, तो उसमें 2 नंबर दिखाई देते हैं. ब्लड प्रेशर रीडिंग में ऊपर वाला नंबर सिस्टोलिक और नीचे वाला नंबर डायस्टोलिक बीपी कहलाता है. सामान्य बीपी 120/80 mmHg माना जाता है. अगर इससे ज्यादा रीडिंग आती है, तो यह हाई ब्लड प्रेशर माना जाता है. बीपी रीडिंग में ऊपर वाला नंबर सिस्टोलिक बीपी कहलाता है और नीचे वाला डायस्टोलिक बीपी. Systolic vs Diastolic BP: आजकल हाई ब्लड प्रेशर की समस्या तेजी से बढ़ रही है. बड़ी संख्या में लोग इसका शिकार हो रहे हैं. जब भी आप डिजिटल मशीन से ब्लड प्रेशर चेक करते हैं, तब रीडिंग में दो नंबर जैसे 120 80 दिखाई देते हैं. बहुत से लोग यह तो जानते हैं कि यह बीपी की रीडिंग है, लेकिन सिस्टोलिक और डायस्टोलिक बीपी का असली मतलब नहीं जानते हैं. कुछ लोग सिर्फ ऊपर की रीडिंग को महत्वपूर्ण समझते हैं, तो कई लोग नीचे की रीडिंग को ज्यादा गंभीरता से लेते हैं. हेल्थ एक्सपर्ट्स के अनुसार ब्लड प्रेशर की सही जानकारी होना जरूरी है, ताकि हार्ट को ठीक रखा जा सके. क्या होता है सिस्टोलिक बीपी? नई दिल्ली के सर गंगाराम हॉस्पिटल के प्रिवेंटिव हेल्थ एंड वेलनेस डिपार्टमेंट की डायरेक्टर डॉ. सोनिया रावत ने News18 को बताया ब्लड प्रेशर रीडिंग में ऊपर वाला नंबर सिस्टोलिक बीपी कहलाता है. यह उस प्रेशर को दर्शाता है, जब दिल शरीर में खून पंप करता है. जब हार्ट धड़कता है और ब्लड धमनियों में भेजता है, तब उस समय धमनियों पर पड़ने वाले दबाव को सिस्टोलिक प्रेशर कहा जाता है. उदाहरण के लिए 120/80 में 120 सिस्टोलिक बीपी होता है. अगर सिस्टोलिक प्रेशर लगातार ज्यादा रहता है, तो इससे दिल और ब्लड वेसल्स पर अतिरिक्त दबाव पड़ सकता है. डायस्टोलिक बीपी क्या होता है? डॉक्टर के मुताबिक ब्लड प्रेशर रीडिंग में नीचे वाला नंबर डायस्टोलिक बीपी कहलाता है. यह उस समय का दबाव बताता है, जब दिल धड़कनों के बीच आराम की स्थिति में होता है. जब हार्ट अगली धड़कन से पहले रिलैक्स करता है, तब धमनियों में जो दबाव रहता है, उसे डायस्टोलिक प्रेशर कहा जाता है. 120/80 की रीडिंग में 80 डायस्टोलिक बीपी होता है. अगर यह लगातार ज्यादा रहे, तो यह भी गंभीर बीमारियां पैदा कर सकता है. इसे कंट्रोल रखना भी बेहद जरूरी है. बीपी की नॉर्मल रेंज क्या होती है? एक्सपर्ट की मानें तो सामान्य ब्लड प्रेशर 120/80 mmHg माना जाता है. अगर सिस्टोलिक बीपी 120 से कम और डायस्टोलिक 80 से कम हो, तो इसे सामान्य माना जाता है. वहीं 130/80 या उससे अधिक की रीडिंग हाई ब्लड प्रेशर की तरफ इशारा कर सकती है. लंबे समय तक हाई बीपी रहने पर दिल की बीमारी, स्ट्रोक, किडनी की समस्या और आंखों से जुड़ी परेशानियों का खतरा बढ़ सकता है. कई बार हाई बीपी के शुरुआती लक्षण नजर नहीं आते, इसलिए इसे साइलेंट किलर भी कहा जाता है. कब डॉक्टर से सलाह लेनी चाहिए? अगर आपको बार-बार सिरदर्द, चक्कर, सांस फूलना या सीने में दर्द जैसी समस्याएं महसूस हों, तो तुरंत डॉक्टर से जांच करवानी चाहिए. अगर आपकी बीपी रीडिंग लगातार सामान्य सीमा से ऊपर या नीचे आ रही हो, तो इसे नजरअंदाज नहीं करना चाहिए. समय रहते सही इलाज और लाइफस्टाइल बदलाव से ब्लड प्रेशर को नियंत्रित रखा जा सकता है. बीपी को सामान्य रखने के लिए संतुलित आहार, कम नमक, नियमित व्यायाम और तनाव कम करना बेहद जरूरी है. बीपी कंट्रोल रखने के लिए स्मोकिंग और शराब से बचना भी जरूरी है. सेहत, रिलेशनशिप, लाइफ या धर्म-ज्योतिष से जुड़ी है कोई निजी उलझन तो हमें करें WhatsApp, आपका नाम गोपनीय रखकर देंगे जानकारी. About the Author अमित उपाध्याय अमित उपाध्याय News18 हिंदी की लाइफस्टाइल टीम के अनुभवी पत्रकार हैं, जिनके पास प्रिंट और डिजिटल मीडिया में 9 वर्षों से अधिक का अनुभव है। वे हेल्थ, वेलनेस और लाइफस्टाइल से जुड़ी रिसर्च-बेस्ड और डॉक्टर्स के इंटरव्…और पढ़ें News18 न्यूजलेटर अब ईमेल पर इनसाइड स्‍टोर‍ीज खबरों के पीछे की खबर अब आपके इनबॉक्‍स में सबमिट करें

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बाजार की मिठाई छोड़िए, गर्मियों में घर पर बनाइए हेल्दी सत्तू के लड्डू, सेहत के लिए टॉनिक से कम नहीं – News18 हिंदी

X गर्मियों में घर पर बनाइए हेल्दी सत्तू के लड्डू, सेहत के लिए टॉनिक से कम नहीं   Sattu Laddu Recipe: गर्मी के मौसम में बघेलखंड का देसी सुपरफूड सत्तू एक बार फिर लोगों की पहली पसंद बनता जा रहा है. खास बात यह है कि अब सत्तू का इस्तेमाल सिर्फ शरबत या परंपरागत व्यंजनों तक सीमित नहीं रहा, बल्कि इससे हेल्दी और टेस्टी मीठे लड्डू भी तैयार किए जा रहे हैं. फिटनेस पसंद लोग और हेल्दी डाइट फॉलो करने वाले लोग इन लड्डुओं को खूब पसंद कर रहे हैं, क्योंकि इनमें रिफाइंड शुगर या चाशनी का इस्तेमाल नहीं होता. सीधी निवासी प्रियंका सिंह ने लोकल 18 से बातचीत में बताया कि सत्तू के लड्डू बनाना बेहद आसान है और इसके लिए ज्यादा सामग्री की जरूरत भी नहीं पड़ती. सबसे पहले सत्तू को हल्के देसी घी में भूनकर उसकी खुशबू और स्वाद बढ़ाया जाता है. फिर इसमें गुड़ या खजूर का पेस्ट मिलाकर प्राकृतिक मिठास दी जाती है, जिससे ये लड्डू स्वादिष्ट होने के साथ बेहद पौष्टिक भी बन जाते हैं. सत्तू में भरपूर मात्रा में प्रोटीन, फाइबर और आयरन पाया जाता है, जो शरीर को ताकत देने के साथ लंबे समय तक पेट भरा रखने में मदद करता है. न्यूज़18 को गूगल पर अपने पसंदीदा समाचार स्रोत के रूप में जोड़ने के लिए यहां क्लिक करें।

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सनस्क्रीन में SPF का क्या मतलब होता है? आपके लिए क्या बेहतर, किससे मिलेगा ज्यादा प्रोटेक्शन

Last Updated:May 21, 2026, 08:05 IST Sunscreen SPF Importance: गर्मियों में अधिकतर लोग सनस्क्रीन का इस्तेमाल करते हैं. सनस्क्रीन के ऊपर अक्सर SPF 30 या SPF 50 लिखा होता है. ज्यादातर लोग सनस्क्रीन पर लिखे SPF का मतलब नहीं जानते हैं. डॉक्टर के अनुसार सन प्रोटेक्शन फैक्टर को SPF कहा जाता है. यह स्किन को अल्ट्रावॉयलेट किरणों से बचाने की क्षमता को दर्शाता है. सनस्क्रीन में सन प्रोटेक्शन फैक्टर को SPF कहा जाता है. How Much SPF Do You Need: गर्मियों के मौसम में स्किन को तेज धूप से बचाने के लिए सनस्क्रीन लगाने की सलाह दी जाती है. सनस्क्रीन हमारी स्किन को प्रोटेक्ट करने का काम करती है. अधिकतर जब लोग सनस्क्रीन खरीदने जाते हैं, तो सबसे ज्यादा कंफ्यूजन SPF को लेकर होता है. कोई SPF 15 इस्तेमाल करता है, तो कोई SPF 50 को बेहतर मानता है. हेल्थ एक्सपर्ट्स भी लोगों को स्किन के हिसाब से सही सनस्क्रीन यूज करने की सलाह देते हैं. ऐसे में सवाल उठता है कि आखिर SPF का मतलब क्या होता है और आपकी स्किन के लिए कौन सा SPF सही रहता है? यूपी के कानपुर में जीएसवीएम मेडिकल कॉलेज के डर्मेटोलॉजिस्ट डॉ. युगल राजपूत ने News18 को बताया सन प्रोटेक्शन फैक्टर को शॉर्ट में SPF कहा जाता है. यह बताता है कि सनस्क्रीन आपकी स्किन को सूरज की अल्ट्रावॉयलेट किरणों से कितनी सुरक्षा दे सकती है. UV किरणें सनबर्न, टैनिंग और स्किन को नुकसान पहुंचाने के लिए जिम्मेदार मानी जाती हैं. गर्मी में धूप तेज होती है और अल्ट्रावॉयलेट किरणों का कहर भी बढ़ जाता है. ऐसे में स्किन को हेल्दी रखने के लिए दिन के वक्त सनस्क्रीन लगाने की सलाह दी जाती है. लोगों की स्किन टाइप और धूप में बिताए जाने वाले समय के आधार पर SPF तय होता है. SPF 30 और SPF 50 का क्या मतलब है? डॉक्टर के मुताबिक अगर बिना सनस्क्रीन लगाए आपकी स्किन 10 मिनट में जलने लगती है, तो SPF 30 वाली सनस्क्रीन आपको लगभग 30 गुना ज्यादा सुरक्षा दे सकती है. SPF नंबर बढ़ने के साथ सुरक्षा थोड़ी बढ़ती जरूर है, लेकिन बहुत बड़ा अंतर नहीं होता हे. SPF 15 लगभग 93% UVB किरणों को ब्लॉक कर सकता है, जबकि SPF 30 करीब 97% और SPF 50 लगभग 98% तक सुरक्षा देने में मदद करता है. इसलिए केवल ज्यादा SPF वाला प्रोडक्ट खरीदना ही काफी नहीं है, बल्कि उसे सही तरीका और सही मात्रा में लगाना भी बेहद जरूरी होता है. आपके लिए कौन सा SPF बेहतर है? एक्सपर्ट की मानें तो अगर आप रोज घर से बाहर निकलते हैं या धूप में ज्यादा समय बिताते हैं, तो कम से कम SPF 30 वाली ब्रॉड-स्पेक्ट्रम सनस्क्रीन इस्तेमाल करनी चाहिए. वहीं बहुत तेज धूप, बीच ट्रिप या आउटडोर एक्टिविटीज के दौरान SPF 50 बेहतर विकल्प माना जाता है. जिन लोगों की स्किन बहुत सेंसिटिव होती है या जिन्हें जल्दी सनबर्न हो जाता है, उन्हें भी हाई SPF सनस्क्रीन लगाने की सलाह दी जाती है, ताकि स्किन को बेहतर प्रोटेक्शन मिल सके. सनस्क्रीन खरीदते वक्त यह भी देखें डॉक्टर का साफ कहना है कि सनस्क्रीन खरीदते समय सिर्फ SPF नंबर पर ध्यान देना पर्याप्त नहीं है. यह भी जरूरी है कि सनस्क्रीन ब्रॉड स्पेक्ट्रम हो यानी वह UVA और UVB दोनों तरह की किरणों से सुरक्षा दे. UVA किरणें त्वचा की समय से पहले उम्र बढ़ने, झुर्रियों और पिगमेंटेशन से जुड़ी मानी जाती हैं. इसके अलावा वाटर-रेसिस्टेंट सनस्क्रीन पसीने और पानी के दौरान ज्यादा उपयोगी हो सकती है. ऐसे में सोच समझकर और एक्सपर्ट की सलाह लेकर ही सनस्क्रीन खरीदनी चाहिए. सनस्क्रीन लगाने का सही तरीका डॉक्टर का कहना है कि सनस्क्रीन घर से बाहर निकलने से लगभग 15-20 मिनट पहले लगानी चाहिए, ताकि वह त्वचा में अच्छी तरह सेट हो सके. चेहरे, गर्दन, हाथ और शरीर के खुले हिस्सों पर पर्याप्त मात्रा में सनस्क्रीन लगाना जरूरी होता है. अगर आप लंबे समय तक धूप में हैं या ज्यादा पसीना आ रहा है, तो हर 2 से 3 घंटे में सनस्क्रीन दोबारा लगानी चाहिए. सनस्क्रीन सिर्फ ब्यूटी प्रोडक्ट नहीं, बल्कि त्वचा की सुरक्षा का जरूरी हिस्सा है. SPF यह बताता है कि आपकी सनस्क्रीन धूप से कितनी सुरक्षा दे सकती है, लेकिन सही रिजल्ट के लिए सही SPF चुनना और उसे सही तरीके से इस्तेमाल करना बेहद जरूरी है. सेहत, रिलेशनशिप, लाइफ या धर्म-ज्योतिष से जुड़ी है कोई निजी उलझन तो हमें करें WhatsApp, आपका नाम गोपनीय रखकर देंगे जानकारी. About the Author अमित उपाध्याय अमित उपाध्याय News18 हिंदी की लाइफस्टाइल टीम के अनुभवी पत्रकार हैं, जिनके पास प्रिंट और डिजिटल मीडिया में 9 वर्षों से अधिक का अनुभव है। वे हेल्थ, वेलनेस और लाइफस्टाइल से जुड़ी रिसर्च-बेस्ड और डॉक्टर्स के इंटरव्…और पढ़ें News18 न्यूजलेटर अब ईमेल पर इनसाइड स्‍टोर‍ीज खबरों के पीछे की खबर अब आपके इनबॉक्‍स में सबमिट करें

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