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Displaced Demand Justice | Officer Bribe Scam; Compensation Cheating

Displaced Demand Justice | Officer Bribe Scam; Compensation Cheating

45 हजार करोड़ रुपए के केन-बेतवा लिंक प्रोजेक्ट का सेंटर पॉइंट-डौढ़न (दौधन) बांध। सरकार इसे बुंदेलखंड के लिए ‘अमृत’ बता रही है। लेकिन इस बांध को बनाने के लिए जिन लोगों को उजाड़ा जा रहा है, वे 42 डिग्री की तपिश में अधनंगे हाल में 12 दिनों से पंच तत्व सत्य

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ये लोग नदी के बीच फांसी का फंदा लगाकर खड़े हो जाते हैं और चिताओं पर लेटकर विरोध जताते हैं। इनकी जुबान पर सरकारी धोखे की अलग-अलग कहानियां हैं।

किसी को मकान के बदले 25 हजार रुपए का मुआवजा मिला है, तो किसी को 14 हजार। राहत पैकेज के 12.5 लाख रुपए हासिल करने के लिए 2 लाख रुपए एडवांस देना पड़ा है।

अजोध्या प्रसाद कहते हैं-

हम जिंदा हैं, लेकिन सरकारी रिकॉर्ड में हमारी मौत हो चुकी है। रिश्वत नहीं दी, तो हमें कागजों पर मरा हुआ घोषित कर दिया गया।

QuoteImage

दैनिक भास्कर ने ग्राउंड पर पहुंचकर समझा कि ये लोग कौन हैं? क्या ये महज प्रतीकात्मक प्रदर्शन है या वाकई इनसे इनके हिस्से का हक छीना गया है?

केन और बेतवा नदी को 220 किमी लंबी नहर से जोड़ने का प्रोजेक्ट है।

केन और बेतवा नदी को 220 किमी लंबी नहर से जोड़ने का प्रोजेक्ट है।

छतरपुर से करीब 50 किलोमीटर दूर है दौधन। पन्ना टाइगर रिजर्व के कोर एरिया में केन नदी पर ये डैम बन रहा है। इसके लिए यहां आसपास के करीब 20 गांव को हटाया जाना है। जाहिर है गांव हैं तो यहां इंसान भी हैं और उनकी पीढ़ियों की निशानी भी। जमीन भी, जायदाद भी, जानवर भी और पुरखों की यादें भी। लेकिन सरकारी अफसरों के लिए ये सिर्फ चंद रुपयों के पैकेज हैं।

विस्थापितों के हिस्से में सरकारी मुलाजिमों का हिस्सा पहले से रिजर्व है। ज्यादातर विस्थापित आदिवासी हैं। कम पढ़े-लिखे हैं। इन्हें न समग्र आईडी का मतलब समझ आता है न मार्कशीट पर अंकित जन्मतिथि का। लेकिन मुआवजा हासिल करने के लिए ये सब जरुरी है। इन्हीं दस्तावेजों की दरकार सरकारी बाबुओं के लिए कमाई की पक्की गारंटी है।

प्रदर्शन में बड़ी तादाद में प्रभावित शामिल हो रहे हैं।

प्रदर्शन में बड़ी तादाद में प्रभावित शामिल हो रहे हैं।

आरोप-पहले भ्रष्टाचार किया अब अत्याचार कर रहे अफसर अनशन का सबसे प्रमुख चेहरा है-35 साल का नौजवान अमित भटनागर। पानी के बीच घंटों से फांसी का फंदा लटकाकर खड़े अमित कहते हैं- प्रशासन ने यहां खूब भ्रष्टाचार किया है। भ्रष्टाचार को छिपाने अब हम पर अत्याचार कर रहे हैं। यदि आपको समग्र आईडी चाहिए या वोटर लिस्ट में नाम जुड़वाना है तो पैसा लगता है। मुआवजे के लिए सूची में नाम जुड़वाने का भी पैसा लगता है। फिर पैसा आ जाए तो पैसा लेने के लिए फिर रिश्वत देनी पड़ती है।

दलालों का गिरोह काम कर रहा, लोग कर्जदार हो गए अमित ने बताया कि यहां लोग कर्जदार हो गए हैं। उनका घर भी गया और कर्ज भी चढ़ गया। सत्ता दल के नेताओं और दलालों का यहां एक गिरोह है। लोकायुक्त ने हाल ही में एक पटवारी को यहां एक आदिवासी महिला से रिश्वत लेते हुए रंगे हाथों पकड़ा था।

मुआवजे में चार तरह की गड़बड़ी

1. राहत पैकेज के लिए 2.50 लाख एडवांस रिश्वत विस्थापितों को राहत पैकेज के तहत 12.50 लाख रुपए देने का प्रावधान है। लेकिन पटवारी और ग्राम सचिव इसके लिए लोगों से 2 से 4 लाख रुपए तक एडवांस रिश्वत मांग रहे हैं। जिन्होंने रिश्वत नहीं दी, उनके नाम मुआवजा सूची में शामिल ही नहीं किए गए।

2. गांव वालों को प्रति एकड़ 3 लाख, बाहरियों को 80 लाख दूसरी बड़ी गड़बड़ी यह है कि जिस गांव में स्थानीय लोगों को 3 लाख रुपए प्रति एकड़ मुआवजा दिया गया, वहीं बाहरी लोगों ने किसानों से जमीन खरीदकर उसे डायवर्टेड करा लिया। इसके बाद उसी जमीन को आवासीय प्लॉट मानकर 80 लाख रुपए के हिसाब से मुआवजा दिया गया। सब प्रशासन की मिलीभगत से हुआ।

विरोध के बीच प्रोजेक्ट का काम जारी है।

विरोध के बीच प्रोजेक्ट का काम जारी है।

3. आदमी जिंदा है, लेकिन सरकार की सूची में मृत कुछ ऐसे मामले भी सामने आए हैं, जिनमें जिंदा व्यक्ति खुद को जिंदा साबित करने के लिए दफ्तरों के चक्कर काट रहा है। उसे बताया गया कि उसका नाम सूची में नहीं है, बल्कि उसे मृत घोषित कर दिया गया है।

4. चार बच्चों के पिता कहां से लाएं बालिग होने का प्रमाण पत्र ये आदिवासी गांव हैं। यहां जन्म प्रमाण पत्र के लिए आधार कार्ड मान्य नहीं है। जो लोग कभी स्कूल ही नहीं गए, वे स्कूल का रिकॉर्ड कहां से लाएं? चार बच्चों के पिता से भी बालिग होने का प्रमाण पत्र मांगा जा रहा है। ऐसे लोग सवाल उठा रहे हैं कि इतने साल बाद अब ऐसा प्रमाण पत्र कहां से लाएं?

पलकुंआ गांव के अनिल कहते हैं कि 4 एकड़ के लिए 20 लाख मिले। हम यही जमीन यदि बमीठा में या छतरपुर में लें तो हम इतने में एक एकड़ जमीन भी नहीं मिल पाएगी। सरकार कह रही थी कि 4 गुना देंगे।

महिलाएं भी प्रदर्शन के दौरान पानी में खड़ी नजर आईं।

महिलाएं भी प्रदर्शन के दौरान पानी में खड़ी नजर आईं।

अब समझिए लोगों का दर्द-

रिश्वत देने के पैसे नहीं, इसलिए मुआवजा नहीं मिला

आंदोलन में शामिल होने आईं पन्ना जिले के खमरी गांव की कमला आदिवासी कहती हैं कि हमारे पास 5 एकड़ जमीन थी। उसका 14 लाख रुपए मुआवजा मिला है। जहां भी जाते हैं, वहां 8 से 10 लाख रुपए प्रति एकड़ से कम में जमीन नहीं मिलती। हमारे पति चार भाई हैं। हम कैसे जीवन चला पाएंगे? घर-मकान का कोई मुआवजा नहीं मिला। हमने बाल-बच्चों को छोड़कर धूप-पानी में मेहनत कर मकान बनाया था, सब बेकार हो गया।

छतरपुर के मैनारी गांव की कल्लू बाई कहती हैं कि हमारे ससुर जी तीन भाई हैं। 18 एकड़ जमीन जा रही है। अभी तक कोई पैसा नहीं मिला है। हमारे पास रिश्वत देने के लिए पैसा ही नहीं है। कहा गया है कि काम बन जाएगा तो पैसा देना पड़ेगा।

कहा गया दिल्ली जाओगे तो जेल भेज देंगे हिसाबी राजपूत कहती हैं कि हम दिल्ली जा रहे थे, लेकिन हमें वहां भी नहीं जाने दिया गया। कहा गया कि अगर दिल्ली जाओगे तो जेल भेज दिया जाएगा। वहां से लौटे तो फिर यहीं बांध पर अनशन पर बैठ गए। धीरज बाई कहती हैं कि 11 दिन से यहीं हैं। नमक-रोटी खाकर दिन गुजार रहे हैं। कभी मिल जाती है, कभी नहीं मिलती। कोई अफसर बातचीत करने तक यहां नहीं आ रहा है।

हमें आतंकवादी बनने के लिए मजबूर कर रहे हैं पानी में खड़े रहकर फांसी की रस्सी लटकाए विरोध दर्ज करा रहे सिलावट के कंबोज पटेल कहते हैं कि टीकमगढ़, गुना, सतना, कटनी और भोपाल के लोगों ने यहां जमीन खरीदकर डायवर्टेड करा लिया। उन्हें प्लॉट के हिसाब से मुआवजा मिला। मेरे परिवार में 11 लोग हैं। हमारे खेत में मकान है। डेढ़ एकड़ जमीन थी, जिसके लिए हमें सिर्फ 5 लाख रुपए मुआवजा मिला है। 3 बोर थे, एक कुआं था। 10 हजार रुपए रिश्वत मांगी जा रही है। सरकार हमें आतंकवादी बनने के लिए मजबूर कर रही है। हमें व्यवस्थित गांव बनाकर विस्थापित किया जाए।

प्रभावितों ने सांकेतिक फांसी लगाकर प्रदर्शन किया।

प्रभावितों ने सांकेतिक फांसी लगाकर प्रदर्शन किया।

उदाहरण से समझिए मुआवजे का पूरा खेल

पलकुआं गांव के अनिल बताते हैं कि 4 एकड़ जमीन के बदले उन्हें 20 लाख रुपए मिले, जबकि बमीठा या छतरपुर में इतनी रकम में एक एकड़ जमीन भी नहीं मिलती। सरकार ने चार गुना मुआवजे का वादा किया था। अनिल ने बमीठा में 10 लाख में प्लॉट खरीदा और 15 लाख मकान बनाने में खर्च किए। उन्होंने भरोसे में रजिस्ट्री कराई, सोचकर कि पैकेज का पैसा आ जाएगा, लेकिन 6 महीने तक भुगतान नहीं हुआ।

अफसरों से पूछने पर कहा गया कि जल्दी चाहिए तो 12.50 लाख के पैकेज के लिए 2.50 लाख रिश्वत देनी होगी। बाद में 1.50 लाख में सौदा तय हुआ। आधा पैसा एडवांस और बाकी काम के बाद लिया गया। वहीं बल्ला यादव का आरोप है कि दो मकानों में से एक का 9 लाख मुआवजा मिला, जबकि दूसरे के लिए 4 लाख रिश्वत मांगी गई। रिश्वत न देने पर उनका नाम सूची से हटा दिया गया।

इन आरोपों पर प्रशासन की सफाई…

एडीएम नम: शिवाय अरजरिया ने कहा कि विस्थापितों से प्रशासन की वार्ता हुई है। रिश्वत लेने वालों के प्रमाण देने को कहा है, कठोर एक्शन लेंगे। शिकायतें हैं कुछ संपतियों का मूल्यांकन नहीं हुआ है। जांच के लिए 4 एसडीएम और 10 तहसीलदारों की एक सर्वे टीम बनाई है।

मामले से जुड़ी ये खबर भी पढ़ें…

केन-बेतवा परियोजना पर 12 दिन बाद चिता आंदोलन स्थगित

छतरपुर में केन-बेतवा लिंक परियोजना के तहत ढोडन बांध पर चल रहा 12 दिवसीय चिता आंदोलन गुरुवार को समाप्त हो गया। आदिवासी महिलाओं और किसानों ने अधिकारियों से हुई बैठक के बाद सशर्त आंदोलन वापस लेने का निर्णय लिया। यह आंदोलन डूब क्षेत्र में उचित मुआवजा और पुनर्वास की मांग को लेकर किया जा रहा था। पढ़ें पूरी खबर…

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45 हजार करोड़ रुपए के केन-बेतवा लिंक प्रोजेक्ट का सेंटर पॉइंट-डौढ़न (दौधन) बांध। सरकार इसे बुंदेलखंड के लिए ‘अमृत’ बता रही है। लेकिन इस बांध को बनाने के लिए जिन लोगों को उजाड़ा जा रहा है, वे 42 डिग्री की तपिश में अधनंगे हाल में 12 दिनों से पंच तत्व सत्य

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ये लोग नदी के बीच फांसी का फंदा लगाकर खड़े हो जाते हैं और चिताओं पर लेटकर विरोध जताते हैं। इनकी जुबान पर सरकारी धोखे की अलग-अलग कहानियां हैं।

किसी को मकान के बदले 25 हजार रुपए का मुआवजा मिला है, तो किसी को 14 हजार। राहत पैकेज के 12.5 लाख रुपए हासिल करने के लिए 2 लाख रुपए एडवांस देना पड़ा है।

अजोध्या प्रसाद कहते हैं-

हम जिंदा हैं, लेकिन सरकारी रिकॉर्ड में हमारी मौत हो चुकी है। रिश्वत नहीं दी, तो हमें कागजों पर मरा हुआ घोषित कर दिया गया।

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दैनिक भास्कर ने ग्राउंड पर पहुंचकर समझा कि ये लोग कौन हैं? क्या ये महज प्रतीकात्मक प्रदर्शन है या वाकई इनसे इनके हिस्से का हक छीना गया है?

केन और बेतवा नदी को 220 किमी लंबी नहर से जोड़ने का प्रोजेक्ट है।

केन और बेतवा नदी को 220 किमी लंबी नहर से जोड़ने का प्रोजेक्ट है।

छतरपुर से करीब 50 किलोमीटर दूर है दौधन। पन्ना टाइगर रिजर्व के कोर एरिया में केन नदी पर ये डैम बन रहा है। इसके लिए यहां आसपास के करीब 20 गांव को हटाया जाना है। जाहिर है गांव हैं तो यहां इंसान भी हैं और उनकी पीढ़ियों की निशानी भी। जमीन भी, जायदाद भी, जानवर भी और पुरखों की यादें भी। लेकिन सरकारी अफसरों के लिए ये सिर्फ चंद रुपयों के पैकेज हैं।

विस्थापितों के हिस्से में सरकारी मुलाजिमों का हिस्सा पहले से रिजर्व है। ज्यादातर विस्थापित आदिवासी हैं। कम पढ़े-लिखे हैं। इन्हें न समग्र आईडी का मतलब समझ आता है न मार्कशीट पर अंकित जन्मतिथि का। लेकिन मुआवजा हासिल करने के लिए ये सब जरुरी है। इन्हीं दस्तावेजों की दरकार सरकारी बाबुओं के लिए कमाई की पक्की गारंटी है।

प्रदर्शन में बड़ी तादाद में प्रभावित शामिल हो रहे हैं।

प्रदर्शन में बड़ी तादाद में प्रभावित शामिल हो रहे हैं।

आरोप-पहले भ्रष्टाचार किया अब अत्याचार कर रहे अफसर अनशन का सबसे प्रमुख चेहरा है-35 साल का नौजवान अमित भटनागर। पानी के बीच घंटों से फांसी का फंदा लटकाकर खड़े अमित कहते हैं- प्रशासन ने यहां खूब भ्रष्टाचार किया है। भ्रष्टाचार को छिपाने अब हम पर अत्याचार कर रहे हैं। यदि आपको समग्र आईडी चाहिए या वोटर लिस्ट में नाम जुड़वाना है तो पैसा लगता है। मुआवजे के लिए सूची में नाम जुड़वाने का भी पैसा लगता है। फिर पैसा आ जाए तो पैसा लेने के लिए फिर रिश्वत देनी पड़ती है।

दलालों का गिरोह काम कर रहा, लोग कर्जदार हो गए अमित ने बताया कि यहां लोग कर्जदार हो गए हैं। उनका घर भी गया और कर्ज भी चढ़ गया। सत्ता दल के नेताओं और दलालों का यहां एक गिरोह है। लोकायुक्त ने हाल ही में एक पटवारी को यहां एक आदिवासी महिला से रिश्वत लेते हुए रंगे हाथों पकड़ा था।

मुआवजे में चार तरह की गड़बड़ी

1. राहत पैकेज के लिए 2.50 लाख एडवांस रिश्वत विस्थापितों को राहत पैकेज के तहत 12.50 लाख रुपए देने का प्रावधान है। लेकिन पटवारी और ग्राम सचिव इसके लिए लोगों से 2 से 4 लाख रुपए तक एडवांस रिश्वत मांग रहे हैं। जिन्होंने रिश्वत नहीं दी, उनके नाम मुआवजा सूची में शामिल ही नहीं किए गए।

2. गांव वालों को प्रति एकड़ 3 लाख, बाहरियों को 80 लाख दूसरी बड़ी गड़बड़ी यह है कि जिस गांव में स्थानीय लोगों को 3 लाख रुपए प्रति एकड़ मुआवजा दिया गया, वहीं बाहरी लोगों ने किसानों से जमीन खरीदकर उसे डायवर्टेड करा लिया। इसके बाद उसी जमीन को आवासीय प्लॉट मानकर 80 लाख रुपए के हिसाब से मुआवजा दिया गया। सब प्रशासन की मिलीभगत से हुआ।

विरोध के बीच प्रोजेक्ट का काम जारी है।

विरोध के बीच प्रोजेक्ट का काम जारी है।

3. आदमी जिंदा है, लेकिन सरकार की सूची में मृत कुछ ऐसे मामले भी सामने आए हैं, जिनमें जिंदा व्यक्ति खुद को जिंदा साबित करने के लिए दफ्तरों के चक्कर काट रहा है। उसे बताया गया कि उसका नाम सूची में नहीं है, बल्कि उसे मृत घोषित कर दिया गया है।

4. चार बच्चों के पिता कहां से लाएं बालिग होने का प्रमाण पत्र ये आदिवासी गांव हैं। यहां जन्म प्रमाण पत्र के लिए आधार कार्ड मान्य नहीं है। जो लोग कभी स्कूल ही नहीं गए, वे स्कूल का रिकॉर्ड कहां से लाएं? चार बच्चों के पिता से भी बालिग होने का प्रमाण पत्र मांगा जा रहा है। ऐसे लोग सवाल उठा रहे हैं कि इतने साल बाद अब ऐसा प्रमाण पत्र कहां से लाएं?

पलकुंआ गांव के अनिल कहते हैं कि 4 एकड़ के लिए 20 लाख मिले। हम यही जमीन यदि बमीठा में या छतरपुर में लें तो हम इतने में एक एकड़ जमीन भी नहीं मिल पाएगी। सरकार कह रही थी कि 4 गुना देंगे।

महिलाएं भी प्रदर्शन के दौरान पानी में खड़ी नजर आईं।

महिलाएं भी प्रदर्शन के दौरान पानी में खड़ी नजर आईं।

अब समझिए लोगों का दर्द-

रिश्वत देने के पैसे नहीं, इसलिए मुआवजा नहीं मिला

आंदोलन में शामिल होने आईं पन्ना जिले के खमरी गांव की कमला आदिवासी कहती हैं कि हमारे पास 5 एकड़ जमीन थी। उसका 14 लाख रुपए मुआवजा मिला है। जहां भी जाते हैं, वहां 8 से 10 लाख रुपए प्रति एकड़ से कम में जमीन नहीं मिलती। हमारे पति चार भाई हैं। हम कैसे जीवन चला पाएंगे? घर-मकान का कोई मुआवजा नहीं मिला। हमने बाल-बच्चों को छोड़कर धूप-पानी में मेहनत कर मकान बनाया था, सब बेकार हो गया।

छतरपुर के मैनारी गांव की कल्लू बाई कहती हैं कि हमारे ससुर जी तीन भाई हैं। 18 एकड़ जमीन जा रही है। अभी तक कोई पैसा नहीं मिला है। हमारे पास रिश्वत देने के लिए पैसा ही नहीं है। कहा गया है कि काम बन जाएगा तो पैसा देना पड़ेगा।

कहा गया दिल्ली जाओगे तो जेल भेज देंगे हिसाबी राजपूत कहती हैं कि हम दिल्ली जा रहे थे, लेकिन हमें वहां भी नहीं जाने दिया गया। कहा गया कि अगर दिल्ली जाओगे तो जेल भेज दिया जाएगा। वहां से लौटे तो फिर यहीं बांध पर अनशन पर बैठ गए। धीरज बाई कहती हैं कि 11 दिन से यहीं हैं। नमक-रोटी खाकर दिन गुजार रहे हैं। कभी मिल जाती है, कभी नहीं मिलती। कोई अफसर बातचीत करने तक यहां नहीं आ रहा है।

हमें आतंकवादी बनने के लिए मजबूर कर रहे हैं पानी में खड़े रहकर फांसी की रस्सी लटकाए विरोध दर्ज करा रहे सिलावट के कंबोज पटेल कहते हैं कि टीकमगढ़, गुना, सतना, कटनी और भोपाल के लोगों ने यहां जमीन खरीदकर डायवर्टेड करा लिया। उन्हें प्लॉट के हिसाब से मुआवजा मिला। मेरे परिवार में 11 लोग हैं। हमारे खेत में मकान है। डेढ़ एकड़ जमीन थी, जिसके लिए हमें सिर्फ 5 लाख रुपए मुआवजा मिला है। 3 बोर थे, एक कुआं था। 10 हजार रुपए रिश्वत मांगी जा रही है। सरकार हमें आतंकवादी बनने के लिए मजबूर कर रही है। हमें व्यवस्थित गांव बनाकर विस्थापित किया जाए।

प्रभावितों ने सांकेतिक फांसी लगाकर प्रदर्शन किया।

प्रभावितों ने सांकेतिक फांसी लगाकर प्रदर्शन किया।

उदाहरण से समझिए मुआवजे का पूरा खेल

पलकुआं गांव के अनिल बताते हैं कि 4 एकड़ जमीन के बदले उन्हें 20 लाख रुपए मिले, जबकि बमीठा या छतरपुर में इतनी रकम में एक एकड़ जमीन भी नहीं मिलती। सरकार ने चार गुना मुआवजे का वादा किया था। अनिल ने बमीठा में 10 लाख में प्लॉट खरीदा और 15 लाख मकान बनाने में खर्च किए। उन्होंने भरोसे में रजिस्ट्री कराई, सोचकर कि पैकेज का पैसा आ जाएगा, लेकिन 6 महीने तक भुगतान नहीं हुआ।

अफसरों से पूछने पर कहा गया कि जल्दी चाहिए तो 12.50 लाख के पैकेज के लिए 2.50 लाख रिश्वत देनी होगी। बाद में 1.50 लाख में सौदा तय हुआ। आधा पैसा एडवांस और बाकी काम के बाद लिया गया। वहीं बल्ला यादव का आरोप है कि दो मकानों में से एक का 9 लाख मुआवजा मिला, जबकि दूसरे के लिए 4 लाख रिश्वत मांगी गई। रिश्वत न देने पर उनका नाम सूची से हटा दिया गया।

इन आरोपों पर प्रशासन की सफाई…

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