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Pleasure from the game; stress reduction from excitement on the field

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टाइम्स.लंदन17 मिनट पहले

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रिसर्च कहती है, खेल देखना मानसिक सेहत के लिए फायदेमंद है।- फाइल फोटो

बात पिछले फुटबॉल विश्व कप की है। स्टेडियम में भारी भीड़ थी। लोग अपनी पसंदीदा टीम के लिए चिल्ला रहे थे, रो रहे थे और जश्न मना रहे थे। इसी भीड़ के बीच मनोवैज्ञानिक हेलेन कीज पिता और भाई के साथ धक्का-मुक्की करते हुए आगे बढ़ रही थीं। उन्होंने कौतूहलवश भाई से पूछा, ‘आखिर इस खेल में ऐसा क्या है जो तुम्हें इतना दीवाना बना देता है? क्या यह खुद खेल का रोमांच है, या इतने सारे लोगों के बीच होने का अहसास?’

उनके पिता व भाई निरुत्तर थे; उन्होंने कभी इस तरह सोचा ही नहीं था। लेकिन हेलेन ने इस पर गहराई से सोचने का फैसला किया। हेलेन और दुनियाभर के कई मनोवैज्ञानिक दिलचस्प रिसर्च में जुटे हैं- जिसके नतीजे बताते हैं… खेल देखना मानसिक सेहत के लिए फायदेमंद है।

किसी टीम का दीवाना होना खुशी, जुड़ाव बढ़ाता है और तनाव घटाने में मदद करता है, जिससे खेल प्रेमियों को सकारात्मक ऊर्जा मिलती है। हेलेन और उनकी टीम ने ब्रिटेन के सात हजार से ज्यादा लोगों पर स्टडी की और पाया कि लाइव मैच देखने से मानसिक स्वास्थ्य पर गहरा असर पड़ता है। जो लोग साल में एक-दो बार भी स्टेडियम या ग्राउंड में मैच देखने गए, उनमें अकेलापन कम था और जीवन को सार्थक मानने की भावना ज्यादा थी। शोध में यह भी पता चला कि लाइव मैच देखने से मिलने वाली खुशी और संतुष्टि, नई नौकरी मिलने से होने वाली खुशी से भी ज्यादा होती है। खास बात यह है कि मैच महंगा या पेशेवर होना जरूरी नहीं, स्थानीय स्तर पर खेले जाने वाले शौकिया मैच भी इंसान को उतना ही सुकून व जुड़ाव का अहसास कराते हैं।

रिसर्च के अनुसार घर बैठकर मैच देखना भी मानसिक सेहत और संतुष्टि बढ़ाता है। लेकिन टीवी पर आप मैच तो देख सकते हैं, पर वह अकेलापन दूर नहीं कर सकता जो स्टेडियम की भीड़ में अनजाने लोगों के साथ गले मिलकर दूर होता है। इसीलिए मनोवैज्ञानिक अब सरकारों को सलाह दे रहे हैं कि सार्वजनिक स्वास्थ्य और मानसिक कल्याण की बेहतरी के लिए लोगों को खेल आयोजनों में जाने के लिए प्रेरित किया जाना चाहिए।

आत्मसम्मान में बढ़ोतरी करता है खेल से जुड़ाव: एक्सपर्ट

अब सवाल उठता है कि पसंदीदा टीम हार जाती है, तब तो हम चिड़चिड़े हो जाते हैं, फिर यह फायदे का सौदा कैसे हुआ? दशकों से स्पोर्ट्स फैन्स पर स्टडी कर रहे केंटकी की मरे स्टेट यूनिवर्सिटी के मनोवैज्ञानिक डैनियल वैन कहते हैं,‘मैच शुरू होने से पहले ही फैंस जानते हैं कि 50% आशंका उनके चिड़चिड़े होने की है, फिर भी वे जाते हैं। खेल प्रशंसकों से ज्यादा लचीला कोई नहीं होता। जब टीम हारती है, तो फैंस ‘कॉर्फिंग’ यानी खुद को हार से दूर करने का बहाना ढूंढ़ लेते हैं, और जीतती है, तो ‘बिर्जिंग’ यानी जीत के गौरव में डूब जाते हैं। कुल मिलाकर, खेल से जुड़ाव इंसान के आत्मसम्मान को बढ़ाता है और उसे समाज से जोड़ता है।’

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रिसर्च कहती है, खेल देखना मानसिक सेहत के लिए फायदेमंद है।- फाइल फोटो

बात पिछले फुटबॉल विश्व कप की है। स्टेडियम में भारी भीड़ थी। लोग अपनी पसंदीदा टीम के लिए चिल्ला रहे थे, रो रहे थे और जश्न मना रहे थे। इसी भीड़ के बीच मनोवैज्ञानिक हेलेन कीज पिता और भाई के साथ धक्का-मुक्की करते हुए आगे बढ़ रही थीं। उन्होंने कौतूहलवश भाई से पूछा, ‘आखिर इस खेल में ऐसा क्या है जो तुम्हें इतना दीवाना बना देता है? क्या यह खुद खेल का रोमांच है, या इतने सारे लोगों के बीच होने का अहसास?’

उनके पिता व भाई निरुत्तर थे; उन्होंने कभी इस तरह सोचा ही नहीं था। लेकिन हेलेन ने इस पर गहराई से सोचने का फैसला किया। हेलेन और दुनियाभर के कई मनोवैज्ञानिक दिलचस्प रिसर्च में जुटे हैं- जिसके नतीजे बताते हैं… खेल देखना मानसिक सेहत के लिए फायदेमंद है।

किसी टीम का दीवाना होना खुशी, जुड़ाव बढ़ाता है और तनाव घटाने में मदद करता है, जिससे खेल प्रेमियों को सकारात्मक ऊर्जा मिलती है। हेलेन और उनकी टीम ने ब्रिटेन के सात हजार से ज्यादा लोगों पर स्टडी की और पाया कि लाइव मैच देखने से मानसिक स्वास्थ्य पर गहरा असर पड़ता है। जो लोग साल में एक-दो बार भी स्टेडियम या ग्राउंड में मैच देखने गए, उनमें अकेलापन कम था और जीवन को सार्थक मानने की भावना ज्यादा थी। शोध में यह भी पता चला कि लाइव मैच देखने से मिलने वाली खुशी और संतुष्टि, नई नौकरी मिलने से होने वाली खुशी से भी ज्यादा होती है। खास बात यह है कि मैच महंगा या पेशेवर होना जरूरी नहीं, स्थानीय स्तर पर खेले जाने वाले शौकिया मैच भी इंसान को उतना ही सुकून व जुड़ाव का अहसास कराते हैं।

रिसर्च के अनुसार घर बैठकर मैच देखना भी मानसिक सेहत और संतुष्टि बढ़ाता है। लेकिन टीवी पर आप मैच तो देख सकते हैं, पर वह अकेलापन दूर नहीं कर सकता जो स्टेडियम की भीड़ में अनजाने लोगों के साथ गले मिलकर दूर होता है। इसीलिए मनोवैज्ञानिक अब सरकारों को सलाह दे रहे हैं कि सार्वजनिक स्वास्थ्य और मानसिक कल्याण की बेहतरी के लिए लोगों को खेल आयोजनों में जाने के लिए प्रेरित किया जाना चाहिए।

आत्मसम्मान में बढ़ोतरी करता है खेल से जुड़ाव: एक्सपर्ट

अब सवाल उठता है कि पसंदीदा टीम हार जाती है, तब तो हम चिड़चिड़े हो जाते हैं, फिर यह फायदे का सौदा कैसे हुआ? दशकों से स्पोर्ट्स फैन्स पर स्टडी कर रहे केंटकी की मरे स्टेट यूनिवर्सिटी के मनोवैज्ञानिक डैनियल वैन कहते हैं,‘मैच शुरू होने से पहले ही फैंस जानते हैं कि 50% आशंका उनके चिड़चिड़े होने की है, फिर भी वे जाते हैं। खेल प्रशंसकों से ज्यादा लचीला कोई नहीं होता। जब टीम हारती है, तो फैंस ‘कॉर्फिंग’ यानी खुद को हार से दूर करने का बहाना ढूंढ़ लेते हैं, और जीतती है, तो ‘बिर्जिंग’ यानी जीत के गौरव में डूब जाते हैं। कुल मिलाकर, खेल से जुड़ाव इंसान के आत्मसम्मान को बढ़ाता है और उसे समाज से जोड़ता है।’

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