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Rajasthan Education Dept Names List

Rajasthan Education Dept Names List

शिक्षा विभाग के सुझाए नाम में कई हास्यास्पद और अजीबोगरीब हैं। सवाल उठ रहा है कि क्या ऐसे नामों से बच्चों को हीन भावना से बचाया जाएगा। (AI इमेज)

राजस्थान के स्कूलों में पढ़ने वाले ‘घसीटाराम’, ‘नाहर’ और ‘शैतान’ जैसे अजीब नाम वाले बच्चों को हीन भावना से बचाने के लिए शिक्षा विभाग ने ‘सार्थक नाम अभियान’ शुरू किया है।

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बाकायदा 2950 नामों की सूची जारी की गई है। इनमें 409 नाम लड़कों और 1541 नाम लड़कियों के हैं। विभाग का दावा है कि नाम अद्वितीय, राजस्थानी संस्कृति एवं परम्परा के अनुरूप हैं।

इन नामों पर गौर किया गया तो शिक्षा विभाग की हास्यास्पद कारगुजारी सामने आई। सूची में गलतियों की भरमार है। सामान्य हिंदी शब्द भी गलत लिखे गए हैं।

सूची में शामिल तमाम नाम ‘अजीबोगरीब’ हैं। जैसे- बीकानेर, दहीभाई, अहंकार, अहित और बेचारादास। ये ऐसे नाम हैं, जिन्हें सुनकर बच्चा आत्मविश्वास से भरेगा नहीं, बल्कि सहम जाएगा।

लिस्ट को केवल लंबा करने के लिए एक ही नाम के पीछे सिंह, चंद, कुमार और दास जोड़कर संख्या बढ़ाई गई है। हद तो यह है कि लड़कों की लिस्ट में लड़कियों के और लड़कियों की लिस्ट में लड़कों के नाम जोड़ दिए गए हैं। सूची में लड़कों के लिए गंगोत्री, गोदावरी, रामप्यारी जैसे नाम सुझाए गए हैं।

‘अहंकार’ और ‘दहीभाई’ से बढ़ेगा आत्मविश्वास? विभाग का तर्क है कि नाम व्यक्ति की सामाजिक छवि का दर्पण होता है। लेकिन विभाग की सुझाई लिस्ट में ऐसे नाम भी शामिल हैं, जिन्हें सुनकर किसी को भी हैरानी हो सकती है।

अटपटे नाम : बीकानेर, दहीभाई, अहंकार, अहित, बेचारादास।

जेंडर का घालमेल : लड़कों के लिए सुझाए गए नामों में गंगोत्री, गोदावरी और रामप्यारी जैसे नाम शामिल हैं।

कॉपी-पेस्ट का कमाल: कई नाम तो हूबहू रिपीट किए गए हैं। जैसे दीनानाथ और दीनानाथ दो बार, जयपाल और जयपाल सिंह।

गिनती बढ़ाने के लिए ‘सरनेम’ का सहारा विभाग ने 1409 लड़कों और 1541 लड़कियों के नामों की लिस्ट जारी की है। इसमें रचनात्मकता की जगह ‘फॉर्मूले’ का इस्तेमाल ज्यादा दिखा है।

गोपाल सीरीज : गोपालदास, गोपालकिशोर, गोपाललाल, गोपालप्रसाद और गोपालसिंह।

हरि सीरीज: हरिगोपाल, हरिनारायण, हरिदत्त, हरिकांत, हरिकुमार, हरिमंगल, हरिनाथ, हरिपाल, हरिराज, हरिसिंह। इसी तरह कैलाश, मंगल, मथुरा और अयोध्या के साथ भी अलग-अलग उपनाम जोड़कर लिस्ट लंबी की गई है।

ये कुछ उदाहरण हैं…

अयोध्या प्रसाद और अयोध्या सिंह। बुद्धिमाल, बुद्धिप्रकाश, बुद्धिराम और बुद्धिसिंह। दलपत और दलपतसिंह। दयाल, दयालदास और दयालसिंह। दीनानाथ और दीनानाथ। ध्रुवकुमार, ध्रुवलाल, ध्रुवराज और ध्रुवसिंह। द्वारकानाथ, द्वारकाधीश, द्वारकाप्रसाद और द्वारकासिंह। गंभीर और गंभीरसिंह।

गोपालदास, गोपालकिशोर, गोपाललाल, गोपालप्रसाद और गोपालसिंह। गोवर्धन और गोवर्धनसिंह। गोविंदचंद, गोविंदलाल, गोविंदप्रसाद और गोविंदसिंह। हरिगोपाल, हरिनारायण, हरिदत्त, हरिकांत, हरिकुमार, हरिमंगल, हरिनाथ, हरिपाल, हरिराज, हरिसिंह। जगतपाल, जगतराम और जगतसिह।

जयपाल और जयपाल सिंह। जयसिंह और जयसिंहराज। कैलाशचंदर कैलाश सिंह, कैलाश प्रसाद और कैलाशचंद। कालीदत्त, कालीप्रसाद, कालीराम और कालीसिंह। मंगलदास, मंगलदेव, मंगललाल, मंगलप्रसाद और मंगलसिह। मथुरा, मथुराप्रसाद, मथुरासिंह और मथुरादास। भोला, भोलानाथ।

चेतन और चेतन देव। हिम्मत और हिम्मतसिंह। जितेंदर और जितेंद्र, कुंवर और कुंवरसिंह। रतन और रतनलाल, संग्राम और संग्रामसिंह। सवाई और सवाईसिंह, श्याम, श्यामलाल और श्यामसिंह। ठाकुर और ठाकुर सिंह। उदय और उदयसिंह। उत्तम और उत्तमसिंह। विजय और विजयसिंह।

स्वरूप और स्वरूपसिंह। शार्दूल और शार्दूलसिंह। शेर और शेरसिंह। टीकम, टीकमचंद और टीकमसिंह। अजित,अजितदेव और अजित सिंह। अमोघ और अमोघलाल। अमृत, अमृतलाल और अमृतराज। आनंद कुमार और आनंदलाल।

अभियान का असल मकसद क्या? संयुक्त शासन सचिव की तरफ से शिक्षा विभाग के निदेशक को भेजे गए पत्र में लिखा है- व्यक्ति का नाम उसके व्यक्तित्व, संस्कार और सामाजिक छवि का दर्पण होता है। नाम सुनते ही हमारे मन में उस व्यक्ति की एक छवि बनने लगती है। नाम व्यक्ति की पहचान और विशिष्टता को दर्शाता है।

प्रत्येक नाम के साथ एक अर्थ, एक भावना एवं सांस्कृतिक संदर्भ जुड़ा होता है। नाम का व्यक्ति के आत्मविश्वास और व्यवहार पर भी प्रभाव पड़ता है। एक अच्छा, सरल और सकारात्मक अर्थ वाला नाम व्यक्ति में गर्व और आत्मबल बढ़ाता है, जबकि जटिल या नकारात्मक अर्थ वाले नाम कभी-कभी संकोच का कारण बन सकते हैं।

इस सम्बन्ध में निर्देशानुसार राजकीय विद्यालयों में पढ़ने वाले ऐसे विद्यार्थी जिनके नाम अर्थहीन अथवा नकारात्मक लगते हैं, जिससे उनके आत्मविश्वास पर प्रतिकूल प्रभाव पड़ता है, ऐसे विद्यार्थियों के नामों को अधिक सार्थक, सरल एवं शुद्ध बनाने के उद्देश्य से ‘सार्थक नाम अभियान’ शुरू किया जाना है। इस अभियान का मुख्य उद्देश्य ऐसे नामों का चयन कर संशोधन करना है, जो सकारात्मक अर्थ लिए हुए हों तथा विद्यार्थियों के आत्मसम्मान एवं व्यक्तित्व विकास में सहायक सिद्ध हों।

शिक्षा विभाग के सुझाए नामों पर उठ रहे सवाल…

  • वरिष्ठ समाजशास्त्री और राजस्थान विश्वविद्यालय के पूर्व प्रोफेसर, राजीव गुप्ता ने सूची के नामों का विश्लेषण करके बताया- इनमें से कई नाम सामान्य नहीं हैं और आम बोलचाल में इस्तेमाल नहीं होते। जब माता-पिता ने बच्चों के नाम रखे, तब उनकी चेतना में कोई ना कोई कारण रहा होगा।
  • राजस्थान संस्कृत विश्वविद्यालय में दर्शनशास्त्र विभाग के डीन शास्त्री कौसलेंद्रदास कहते हैं- भारतीय शास्त्र परपंरा में नामकरण जीवन का प्रमुख संस्कार है। भारतीय संस्कृति में नाम को व्यक्ति से अधिक महत्व दिया गया है। शिक्षा विभाग की सूची में दिए गए नामों में सुधार की आवश्यकता है।
  • ग्रामीण अंचल में बुरे नाम रखने के पीछे कारणों की चर्चा करते हुए सामाजिक कार्यकर्ता यशवर्धन सिंह कहते हैं- पहले शादी के कई वर्षों के बाद जन्म लेने वालों और अपने से बड़े भाई-बहनों की मृत्यु के बाद पैदा होने वाले बच्चों को बुरी नजर से बचाने के लिए उनके नकारात्मक भाव वाले नाम रखने का चलन था। इस सूची में शिक्षा विभाग ने जो नाम दिए हैं, वे हास्यास्पद हैं।

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यह खबर भी पढ़िए…

स्कूलों में घसीटाराम, नाहर जैसे अटपटे नाम बदल सकेंगे बच्चे, सरकार देगी नए नामों का ऑप्शन

घसीटाराम, नाहर, नन्नूमल, शैतान, खोजाराम…ये कुछ ऐसे नाम हैं, जो स्कूलों के रजिस्टर में दर्ज रहते हैं। कई बार सरकारी और प्राइवेट स्कूलों में पढ़ने वाले बच्चों को ‘अटपटे’ और ‘अर्थहीन-अजीब’ नामों के कारण शर्मिंदगी झेलनी पड़ती है। ऐसे नामों को लेकर शिक्षा विभाग ने नई पहल की है। पढ़ें पूरी खबर…

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राजस्थान के स्कूलों में पढ़ने वाले ‘घसीटाराम’, ‘नाहर’ और ‘शैतान’ जैसे अजीब नाम वाले बच्चों को हीन भावना से बचाने के लिए शिक्षा विभाग ने ‘सार्थक नाम अभियान’ शुरू किया है।

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बाकायदा 2950 नामों की सूची जारी की गई है। इनमें 409 नाम लड़कों और 1541 नाम लड़कियों के हैं। विभाग का दावा है कि नाम अद्वितीय, राजस्थानी संस्कृति एवं परम्परा के अनुरूप हैं।

इन नामों पर गौर किया गया तो शिक्षा विभाग की हास्यास्पद कारगुजारी सामने आई। सूची में गलतियों की भरमार है। सामान्य हिंदी शब्द भी गलत लिखे गए हैं।

सूची में शामिल तमाम नाम ‘अजीबोगरीब’ हैं। जैसे- बीकानेर, दहीभाई, अहंकार, अहित और बेचारादास। ये ऐसे नाम हैं, जिन्हें सुनकर बच्चा आत्मविश्वास से भरेगा नहीं, बल्कि सहम जाएगा।

लिस्ट को केवल लंबा करने के लिए एक ही नाम के पीछे सिंह, चंद, कुमार और दास जोड़कर संख्या बढ़ाई गई है। हद तो यह है कि लड़कों की लिस्ट में लड़कियों के और लड़कियों की लिस्ट में लड़कों के नाम जोड़ दिए गए हैं। सूची में लड़कों के लिए गंगोत्री, गोदावरी, रामप्यारी जैसे नाम सुझाए गए हैं।

‘अहंकार’ और ‘दहीभाई’ से बढ़ेगा आत्मविश्वास? विभाग का तर्क है कि नाम व्यक्ति की सामाजिक छवि का दर्पण होता है। लेकिन विभाग की सुझाई लिस्ट में ऐसे नाम भी शामिल हैं, जिन्हें सुनकर किसी को भी हैरानी हो सकती है।

अटपटे नाम : बीकानेर, दहीभाई, अहंकार, अहित, बेचारादास।

जेंडर का घालमेल : लड़कों के लिए सुझाए गए नामों में गंगोत्री, गोदावरी और रामप्यारी जैसे नाम शामिल हैं।

कॉपी-पेस्ट का कमाल: कई नाम तो हूबहू रिपीट किए गए हैं। जैसे दीनानाथ और दीनानाथ दो बार, जयपाल और जयपाल सिंह।

गिनती बढ़ाने के लिए ‘सरनेम’ का सहारा विभाग ने 1409 लड़कों और 1541 लड़कियों के नामों की लिस्ट जारी की है। इसमें रचनात्मकता की जगह ‘फॉर्मूले’ का इस्तेमाल ज्यादा दिखा है।

गोपाल सीरीज : गोपालदास, गोपालकिशोर, गोपाललाल, गोपालप्रसाद और गोपालसिंह।

हरि सीरीज: हरिगोपाल, हरिनारायण, हरिदत्त, हरिकांत, हरिकुमार, हरिमंगल, हरिनाथ, हरिपाल, हरिराज, हरिसिंह। इसी तरह कैलाश, मंगल, मथुरा और अयोध्या के साथ भी अलग-अलग उपनाम जोड़कर लिस्ट लंबी की गई है।

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गोपालदास, गोपालकिशोर, गोपाललाल, गोपालप्रसाद और गोपालसिंह। गोवर्धन और गोवर्धनसिंह। गोविंदचंद, गोविंदलाल, गोविंदप्रसाद और गोविंदसिंह। हरिगोपाल, हरिनारायण, हरिदत्त, हरिकांत, हरिकुमार, हरिमंगल, हरिनाथ, हरिपाल, हरिराज, हरिसिंह। जगतपाल, जगतराम और जगतसिह।

जयपाल और जयपाल सिंह। जयसिंह और जयसिंहराज। कैलाशचंदर कैलाश सिंह, कैलाश प्रसाद और कैलाशचंद। कालीदत्त, कालीप्रसाद, कालीराम और कालीसिंह। मंगलदास, मंगलदेव, मंगललाल, मंगलप्रसाद और मंगलसिह। मथुरा, मथुराप्रसाद, मथुरासिंह और मथुरादास। भोला, भोलानाथ।

चेतन और चेतन देव। हिम्मत और हिम्मतसिंह। जितेंदर और जितेंद्र, कुंवर और कुंवरसिंह। रतन और रतनलाल, संग्राम और संग्रामसिंह। सवाई और सवाईसिंह, श्याम, श्यामलाल और श्यामसिंह। ठाकुर और ठाकुर सिंह। उदय और उदयसिंह। उत्तम और उत्तमसिंह। विजय और विजयसिंह।

स्वरूप और स्वरूपसिंह। शार्दूल और शार्दूलसिंह। शेर और शेरसिंह। टीकम, टीकमचंद और टीकमसिंह। अजित,अजितदेव और अजित सिंह। अमोघ और अमोघलाल। अमृत, अमृतलाल और अमृतराज। आनंद कुमार और आनंदलाल।

अभियान का असल मकसद क्या? संयुक्त शासन सचिव की तरफ से शिक्षा विभाग के निदेशक को भेजे गए पत्र में लिखा है- व्यक्ति का नाम उसके व्यक्तित्व, संस्कार और सामाजिक छवि का दर्पण होता है। नाम सुनते ही हमारे मन में उस व्यक्ति की एक छवि बनने लगती है। नाम व्यक्ति की पहचान और विशिष्टता को दर्शाता है।

प्रत्येक नाम के साथ एक अर्थ, एक भावना एवं सांस्कृतिक संदर्भ जुड़ा होता है। नाम का व्यक्ति के आत्मविश्वास और व्यवहार पर भी प्रभाव पड़ता है। एक अच्छा, सरल और सकारात्मक अर्थ वाला नाम व्यक्ति में गर्व और आत्मबल बढ़ाता है, जबकि जटिल या नकारात्मक अर्थ वाले नाम कभी-कभी संकोच का कारण बन सकते हैं।

इस सम्बन्ध में निर्देशानुसार राजकीय विद्यालयों में पढ़ने वाले ऐसे विद्यार्थी जिनके नाम अर्थहीन अथवा नकारात्मक लगते हैं, जिससे उनके आत्मविश्वास पर प्रतिकूल प्रभाव पड़ता है, ऐसे विद्यार्थियों के नामों को अधिक सार्थक, सरल एवं शुद्ध बनाने के उद्देश्य से ‘सार्थक नाम अभियान’ शुरू किया जाना है। इस अभियान का मुख्य उद्देश्य ऐसे नामों का चयन कर संशोधन करना है, जो सकारात्मक अर्थ लिए हुए हों तथा विद्यार्थियों के आत्मसम्मान एवं व्यक्तित्व विकास में सहायक सिद्ध हों।

शिक्षा विभाग के सुझाए नामों पर उठ रहे सवाल…

  • वरिष्ठ समाजशास्त्री और राजस्थान विश्वविद्यालय के पूर्व प्रोफेसर, राजीव गुप्ता ने सूची के नामों का विश्लेषण करके बताया- इनमें से कई नाम सामान्य नहीं हैं और आम बोलचाल में इस्तेमाल नहीं होते। जब माता-पिता ने बच्चों के नाम रखे, तब उनकी चेतना में कोई ना कोई कारण रहा होगा।
  • राजस्थान संस्कृत विश्वविद्यालय में दर्शनशास्त्र विभाग के डीन शास्त्री कौसलेंद्रदास कहते हैं- भारतीय शास्त्र परपंरा में नामकरण जीवन का प्रमुख संस्कार है। भारतीय संस्कृति में नाम को व्यक्ति से अधिक महत्व दिया गया है। शिक्षा विभाग की सूची में दिए गए नामों में सुधार की आवश्यकता है।
  • ग्रामीण अंचल में बुरे नाम रखने के पीछे कारणों की चर्चा करते हुए सामाजिक कार्यकर्ता यशवर्धन सिंह कहते हैं- पहले शादी के कई वर्षों के बाद जन्म लेने वालों और अपने से बड़े भाई-बहनों की मृत्यु के बाद पैदा होने वाले बच्चों को बुरी नजर से बचाने के लिए उनके नकारात्मक भाव वाले नाम रखने का चलन था। इस सूची में शिक्षा विभाग ने जो नाम दिए हैं, वे हास्यास्पद हैं।

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घसीटाराम, नाहर, नन्नूमल, शैतान, खोजाराम…ये कुछ ऐसे नाम हैं, जो स्कूलों के रजिस्टर में दर्ज रहते हैं। कई बार सरकारी और प्राइवेट स्कूलों में पढ़ने वाले बच्चों को ‘अटपटे’ और ‘अर्थहीन-अजीब’ नामों के कारण शर्मिंदगी झेलनी पड़ती है। ऐसे नामों को लेकर शिक्षा विभाग ने नई पहल की है। पढ़ें पूरी खबर…

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