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इंग्लिश प्रीमियर लीग में सट्टेबाजी के विज्ञापनों पर रोक:रिसर्च – जीतने के बाद भी फैंस खुश होने की बजाय निराश कि पूरी रकम क्यों नहीं लगाई

इंग्लिश प्रीमियर लीग में सट्टेबाजी के विज्ञापनों पर रोक:रिसर्च - जीतने के बाद भी फैंस खुश होने की बजाय निराश कि पूरी रकम क्यों नहीं लगाई

खेलों में सट्टेबाजी (स्पोर्ट्स बेटिंग) के बढ़ते चलन और इसके लुभावने विज्ञापनों के बीच, एक ताजा रिपोर्ट ने इसके मनोवैज्ञानिक और आर्थिक खतरों को उजागर किया है। इंग्लिश प्रीमियर लीग के क्लबों द्वारा सट्टेबाजी स्पॉन्सरशिप पर रोक के बाद हो रहे वित्तीय नुकसान की शिकायतों के बीच, ब्रिटेन के एक वरिष्ठ खेल पत्रकार ने बेटिंग की वास्तविकता परखने के लिए एक प्रयोग किया, जिसके नतीजे चौंकाने वाले रहे हैं। प्रीमियर लीग में अगले सीजन से खिलाड़ियों की जर्सी के फ्रंट पर सट्टेबाजी कंपनियों के विज्ञापन देने पर स्वैच्छिक रोक लगाई जा रही है। इस फैसले के बाद नौ से ज्यादा क्लबों ने शिकायत दर्ज कराई है कि उन्हें सट्टेबाजी कंपनियों के बराबर पैसे देने वाले अन्य स्पॉन्सर नहीं मिल रहे हैं, जिससे उन्हें करोड़ों का नुकसान हो रहा है। हालांकि, विशेषज्ञों का तर्क है कि सट्टेबाजी उद्योग का यह भारी-भरकम मुनाफा सीधे तौर पर आम फैंस की जेब से आता है, जो दांव लगाने की लत का शिकार हो रहे हैं। क्या खेलों की अच्छी समझ होने पर सट्टेबाजी से सुरक्षित तरीके से पैसा कमाया जा सकता है? यह जांचने के लिए ब्रिटिश खेल पत्रकार ने एक सोशल एक्सपेरिमेंट किया। उनका लक्ष्य 10 पाउंड (करीब 1000 रुपए) को सुरक्षित दांव लगाकर 1000 पाउंड (करीब 1 लाख रुपए) में बदलना था। शुरुआती दांव जीतने के बाद, उनकी 10 पाउंड की रकम 120 पाउंड तक पहुंच गई, जिससे यह भ्रम पैदा हुआ कि सिस्टम काम कर रहा है। रिपोर्ट के अनुसार, दांव जीतने के बावजूद पत्रकार को खुशी के बजाय निराशा हुई कि उन्होंने पूरी रकम दांव पर क्यों नहीं लगाई। विशेषज्ञों के अनुसार, यही सट्टेबाजी का सबसे बड़ा मनोवैज्ञानिक जाल है। प्रयोग ने साबित किया कि खेलों की अनिश्चितता के कारण सट्टेबाजी में कोई ‘पक्का फॉर्मूला’ काम नहीं आता। ब्रिटेन के आंकड़ों के मुताबिक, देश में करीब 14 लाख वयस्क सट्टेबाजी की लत के शिकार हैं। स्मार्टफोन और विज्ञापनों में मशहूर हस्तियों (जैसे पूर्व फुटबॉलर पीटर क्राउच) की मौजूदगी ने इसे एक ग्लैमरस लाइफस्टाइल के रूप में पेश किया है। रिपोर्ट का निष्कर्ष है कि बेटिंग ऐप्स को इस तरह डिजाइन किया जाता है कि वे इंसान के दिमाग को लगातार दांव लगाने के लिए प्रेरित करें। विशेषज्ञों का मानना है कि अगर किसी व्यक्ति को मैच का रोमांच महसूस करने के लिए उस पर दांव लगाने की जरूरत पड़ती है, तो वास्तव में वह उस खेल का सच्चा प्रशंसक नहीं है। 20 में से 11 क्लबों की जर्सी पर सट्टेबाजी का विज्ञापन सीजन 2025-26 में इंग्लिश प्रीमियर लीग में उतरीं 20 टीमों में से 11 की जर्सी के सामने सट्टेबाजी का विज्ञापन था। यानी आधे से भी ज्यादा। इनमें से अधिकतर क्लब वे थे जो लीग की टॉप-6 टीमों में शामिल नहीं हैं, जैसे एस्टन विला, एवर्टन, वेस्ट हैम, क्रिस्टल पैलेस आदि। अब से सभी टीमें सिर्फ बाजू पर सट्टेबाजी का विज्ञापन लगा सकेंगी, जर्सी के फ्रंट पर नहीं।

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इंग्लिश प्रीमियर लीग में सट्टेबाजी के विज्ञापनों पर रोक:रिसर्च – जीतने के बाद भी फैंस खुश होने की बजाय निराश कि पूरी रकम क्यों नहीं लगाई

इंग्लिश प्रीमियर लीग में सट्टेबाजी के विज्ञापनों पर रोक:रिसर्च - जीतने के बाद भी फैंस खुश होने की बजाय निराश कि पूरी रकम क्यों नहीं लगाई

खेलों में सट्टेबाजी (स्पोर्ट्स बेटिंग) के बढ़ते चलन और इसके लुभावने विज्ञापनों के बीच, एक ताजा रिपोर्ट ने इसके मनोवैज्ञानिक और आर्थिक खतरों को उजागर किया है। इंग्लिश प्रीमियर लीग के क्लबों द्वारा सट्टेबाजी स्पॉन्सरशिप पर रोक के बाद हो रहे वित्तीय नुकसान की शिकायतों के बीच, ब्रिटेन के एक वरिष्ठ खेल पत्रकार ने बेटिंग की वास्तविकता परखने के लिए एक प्रयोग किया, जिसके नतीजे चौंकाने वाले रहे हैं। प्रीमियर लीग में अगले सीजन से खिलाड़ियों की जर्सी के फ्रंट पर सट्टेबाजी कंपनियों के विज्ञापन देने पर स्वैच्छिक रोक लगाई जा रही है। इस फैसले के बाद नौ से ज्यादा क्लबों ने शिकायत दर्ज कराई है कि उन्हें सट्टेबाजी कंपनियों के बराबर पैसे देने वाले अन्य स्पॉन्सर नहीं मिल रहे हैं, जिससे उन्हें करोड़ों का नुकसान हो रहा है। हालांकि, विशेषज्ञों का तर्क है कि सट्टेबाजी उद्योग का यह भारी-भरकम मुनाफा सीधे तौर पर आम फैंस की जेब से आता है, जो दांव लगाने की लत का शिकार हो रहे हैं। क्या खेलों की अच्छी समझ होने पर सट्टेबाजी से सुरक्षित तरीके से पैसा कमाया जा सकता है? यह जांचने के लिए ब्रिटिश खेल पत्रकार ने एक सोशल एक्सपेरिमेंट किया। उनका लक्ष्य 10 पाउंड (करीब 1000 रुपए) को सुरक्षित दांव लगाकर 1000 पाउंड (करीब 1 लाख रुपए) में बदलना था। शुरुआती दांव जीतने के बाद, उनकी 10 पाउंड की रकम 120 पाउंड तक पहुंच गई, जिससे यह भ्रम पैदा हुआ कि सिस्टम काम कर रहा है। रिपोर्ट के अनुसार, दांव जीतने के बावजूद पत्रकार को खुशी के बजाय निराशा हुई कि उन्होंने पूरी रकम दांव पर क्यों नहीं लगाई। विशेषज्ञों के अनुसार, यही सट्टेबाजी का सबसे बड़ा मनोवैज्ञानिक जाल है। प्रयोग ने साबित किया कि खेलों की अनिश्चितता के कारण सट्टेबाजी में कोई ‘पक्का फॉर्मूला’ काम नहीं आता। ब्रिटेन के आंकड़ों के मुताबिक, देश में करीब 14 लाख वयस्क सट्टेबाजी की लत के शिकार हैं। स्मार्टफोन और विज्ञापनों में मशहूर हस्तियों (जैसे पूर्व फुटबॉलर पीटर क्राउच) की मौजूदगी ने इसे एक ग्लैमरस लाइफस्टाइल के रूप में पेश किया है। रिपोर्ट का निष्कर्ष है कि बेटिंग ऐप्स को इस तरह डिजाइन किया जाता है कि वे इंसान के दिमाग को लगातार दांव लगाने के लिए प्रेरित करें। विशेषज्ञों का मानना है कि अगर किसी व्यक्ति को मैच का रोमांच महसूस करने के लिए उस पर दांव लगाने की जरूरत पड़ती है, तो वास्तव में वह उस खेल का सच्चा प्रशंसक नहीं है। 20 में से 11 क्लबों की जर्सी पर सट्टेबाजी का विज्ञापन सीजन 2025-26 में इंग्लिश प्रीमियर लीग में उतरीं 20 टीमों में से 11 की जर्सी के सामने सट्टेबाजी का विज्ञापन था। यानी आधे से भी ज्यादा। इनमें से अधिकतर क्लब वे थे जो लीग की टॉप-6 टीमों में शामिल नहीं हैं, जैसे एस्टन विला, एवर्टन, वेस्ट हैम, क्रिस्टल पैलेस आदि। अब से सभी टीमें सिर्फ बाजू पर सट्टेबाजी का विज्ञापन लगा सकेंगी, जर्सी के फ्रंट पर नहीं।

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