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पंजाब ‌BJP के प्रभारी रहे बलबीर पुंज का निधन:दिल्ली में ली आखिरी सांस; राज्यसभा के रह चुके सांसद; गुरदासपुर में हुआ था जन्म

पंजाब ‌BJP के प्रभारी रहे बलबीर पुंज का निधन:दिल्ली में ली आखिरी सांस; राज्यसभा के रह चुके सांसद; गुरदासपुर में हुआ था जन्म

सीनियर भाजपा नेता, पूर्व राज्यसभा सांसद और पत्रकार बलबीर पुंज का देहांत हो गया है। उन्होंने शनिवार को दिल्ली के अस्पताल में आखिरी सांस ली। उन्हें शुक्रवार को अस्पताल में भर्ती कराया गया था। वह 76 वर्ष के थे। बलबीर पुंज नोएडा के सेक्टर-17 में रहते थे। उनकी एक बेटी विदेश में रहती है, जबकि दूसरी दिल्ली में रहती है। हालांकि वह मूल रूप से पंजाब के रहने वाले थे। अक्सर पंजाब आते रहते थे। उनकी रचनाएं कई मैगजीन व न्यूज पेपर में प्रकाशित होती थीं। उनके निधन पर प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी, गृहमंत्री अमित शाह, केंद्रीय स्वास्थ्य मंत्री जेपी नड्‌डा, यूपी के सीएम योगी आदित्य नाथ और भाजपा अध्यक्ष नितिन नवीन ने शोक जताया है। पंजाब भाजपा प्रभारी भी रहे बलबीर पुंज का जन्म 2 अक्टूबर 1949 को पंजाब के गुरदासपुर जिले के लालोवाल में हुआ था। लेकिन उन्होंने कभी पंजाब से चुनाव नहीं लड़ा। पुंज ने अपने करियर की शुरुआत पत्रकारिता से की थी। वर्ष 1971 में उन्होंने द मदरलैंड अखबार से काम शुरू किया और 1974 में फाइनेंशियल एक्सप्रेस से जुड़ गए। वह कई पदों पर रहे। इसके बाद 1990 के दशक के अंत में वे सक्रिय राजनीति में आए और भारतीय जनता पार्टी से जुड़ गए। पार्टी में उन्होंने बौद्धिक प्रकोष्ठ के संयोजक के रूप में करीब 10 वर्षों तक काम किया। साथ ही वे भाजपा के राष्ट्रीय सचिव, कई राज्यों पंजाब, गुजरात, केरल और हिमाचल प्रदेशके प्रभारी तथा राष्ट्रीय कार्यकारिणी के सदस्य भी रहे। वर्ष 2013 में उन्हें भाजपा का राष्ट्रीय उपाध्यक्ष बनाया गया। हालांकि, उन्होंने पंजाब में कभी चुनाव नहीं लड़ा। अयोध्या से संवाद’ पुस्तक भी लिखी
‘अयोध्या से संवाद’ उनकी सबसे चर्चित किताबों में से एक है। इस पुस्तक में उन्होंने अयोध्या विवाद के इतिहास को सरल तरीके से समझाया है। साथ ही उन्होंने यह बताया है कि भारत को अपनी सोच और नजरिए को औपनिवेशिक प्रभाव (विदेशी शासन की मानसिकता) से बाहर निकालकर अपनी असली पहचान को समझने की जरूरत है।

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‘अयोध्या से संवाद’ उनकी सबसे चर्चित किताबों में से एक है। इस पुस्तक में उन्होंने अयोध्या विवाद के इतिहास को सरल तरीके से समझाया है। साथ ही उन्होंने यह बताया है कि भारत को अपनी सोच और नजरिए को औपनिवेशिक प्रभाव (विदेशी शासन की मानसिकता) से बाहर निकालकर अपनी असली पहचान को समझने की जरूरत है।

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