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86 की उम्र में 3 अस्पतालों में त्वचा, आंखें और देह की दान,अब इतने पीड़ितों को मिलेगी नई जिंदगी

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द‍िल्‍ली के रहने वाले सीताराम गोयल ने 86 की उम्र में निधन के बाद आंखें, त्वचा और देहदान किया. उनकी त्वचा आर्मी अस्पताल, आंखें गुरु नानक आई अस्पताल और देह AIIMS को दान की गई. इस पहल से कई लोगों को नई जिंदगी मिलेगी.

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86 साल के सीताराम गोयल ने देह, त्‍वचा और आंखें दान की हैं.

Skin Donation: 86 साल की उम्र में निधन होने पर जब परिजन शांति से अंतिम संस्कार करने का फैसला करते हैं, वहीं इस उम्र में रोहिणी के रहने वाले सीताराम गोयल ने मानवता और सामाजिक जिम्मेदारी का एक भावुक उदाहरण पेश किया है. गोयल के परिजनों ने उनके निधन के बाद उनकी आंखें, त्वचा और यहां तक कि देहदान करने का फैसला किया. इससे बहुत सारे लोगों को नई जिंदगी मि ल सकेगी.

दधीचि देहदान समिति के सहयोग से गोयल की त्वचा आर्मी अस्पताल (Research and Referral), दिल्ली कैंट में दान की गई. जबकि उनकी दोनों आंखें गुरु नानक आई अस्पताल को दी गईं, जिनसे कई लोगों की आंखों की रोशनी बचाई जा सकेगी. क्योंकि एक जोड़ी आंखों से करीब 6 लोगों को रोशनी दी जा सकती है.

जबकि इनकी देह को ऑल इंडिया इंस्टीट्यूट ऑफ मेडिकल साइंसेज नई दिल्ली में दान किया गया, ताकि मेडिकल के छात्र इनके शरीर का इस्तेमाल शोध और रिसर्च के लिए इस्तेमाल कर सकें.

दान का यह कार्य देहदान समिति के उपाध्यक्ष सुधीर गुप्ता के नेतृत्व में किया गया. दिल्ली में उनके लगातार प्रयासों से कई परिवार अंगदान और देहदान को मानवता की सेवा का एक महत्वपूर्ण तरीका मानने लगे हैं.इस प्रक्रिया के दौरान मौजूद डॉक्टरों और सामाजिक कार्यकर्ताओं ने इस पहल की सराहना की और कहा कि इससे भारत में अंग और ऊतक दान की संस्कृति को बढ़ावा मिलेगा.

इस दौरान विशेषज्ञों ने बताया कि दान की गई त्वचा गंभीर रूप से झुलसे (बर्न) मरीजों और दुर्घटनाओं में घायल लोगों के इलाज में बहुत महत्वपूर्ण होती है. इससे कई लोगों का इलाज हो सकेगा. इस बारे में अस्पताल के ओंकार सिंह ने बताया कि सेना के अस्पतालों में अक्सर सैनिकों और आम नागरिकों के गंभीर जलने के मामले आते हैं. ऐसे में स्किन डोनेशन मरीजों के इलाज और जल्दी ठीक होने में बहुत मदद करता है.

वहीं सीताराम गोयल जैन के परिजनों ने कहा कि उनके निधन के बाद परिवार ने उनकी त्वचा दान करने का निर्णय लिया, ताकि गंभीर रूप से झुलसे मरीजों की मदद हो सके. फिर उनकी आंखें और देहदान भी किया गया.एक ही फैसले से इस परिवार ने तीन महत्वपूर्ण प्रकार के दान करके मरीजों और मेडिकल विज्ञान दोनों की मदद की.

इस अवसर पर सुधीर गुप्ता ने कहा कि अंगदान और देहदान मानवता की सबसे बड़ी सेवाओं में से एक है. मृत्यु के बाद भी इंसान अपने शरीर के माध्यम से दूसरों को जीवन, आशा और उपचार दे सकता है.

डॉक्टरों का कहना है कि भारत में अभी भी दान किए गए अंगों और ऊतकों की कमी है, खासकर बर्न मरीजों के लिए त्वचा की. ऐसी पहलें लोगों को प्रेरित करती हैं और समाज में जागरूकता बढ़ाती हैं.

About the Author

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प्रिया गौतमSenior Correspondent

प्रिया गौतम Hindi.News18.com में बतौर सीन‍ियर हेल्‍थ र‍िपोर्टर काम कर रही हैं. इन्‍हें प‍िछले 14 साल से फील्‍ड में र‍िर्पोर्टिंग का अनुभव प्राप्‍त है. इससे पहले ये ह‍िंदुस्‍तान द‍िल्‍ली, अमर उजाला की कई लोकेशन…और पढ़ें

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86 साल के सीताराम गोयल ने देह, त्‍वचा और आंखें दान की हैं.

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दधीचि देहदान समिति के सहयोग से गोयल की त्वचा आर्मी अस्पताल (Research and Referral), दिल्ली कैंट में दान की गई. जबकि उनकी दोनों आंखें गुरु नानक आई अस्पताल को दी गईं, जिनसे कई लोगों की आंखों की रोशनी बचाई जा सकेगी. क्योंकि एक जोड़ी आंखों से करीब 6 लोगों को रोशनी दी जा सकती है.

जबकि इनकी देह को ऑल इंडिया इंस्टीट्यूट ऑफ मेडिकल साइंसेज नई दिल्ली में दान किया गया, ताकि मेडिकल के छात्र इनके शरीर का इस्तेमाल शोध और रिसर्च के लिए इस्तेमाल कर सकें.

दान का यह कार्य देहदान समिति के उपाध्यक्ष सुधीर गुप्ता के नेतृत्व में किया गया. दिल्ली में उनके लगातार प्रयासों से कई परिवार अंगदान और देहदान को मानवता की सेवा का एक महत्वपूर्ण तरीका मानने लगे हैं.इस प्रक्रिया के दौरान मौजूद डॉक्टरों और सामाजिक कार्यकर्ताओं ने इस पहल की सराहना की और कहा कि इससे भारत में अंग और ऊतक दान की संस्कृति को बढ़ावा मिलेगा.

इस दौरान विशेषज्ञों ने बताया कि दान की गई त्वचा गंभीर रूप से झुलसे (बर्न) मरीजों और दुर्घटनाओं में घायल लोगों के इलाज में बहुत महत्वपूर्ण होती है. इससे कई लोगों का इलाज हो सकेगा. इस बारे में अस्पताल के ओंकार सिंह ने बताया कि सेना के अस्पतालों में अक्सर सैनिकों और आम नागरिकों के गंभीर जलने के मामले आते हैं. ऐसे में स्किन डोनेशन मरीजों के इलाज और जल्दी ठीक होने में बहुत मदद करता है.

वहीं सीताराम गोयल जैन के परिजनों ने कहा कि उनके निधन के बाद परिवार ने उनकी त्वचा दान करने का निर्णय लिया, ताकि गंभीर रूप से झुलसे मरीजों की मदद हो सके. फिर उनकी आंखें और देहदान भी किया गया.एक ही फैसले से इस परिवार ने तीन महत्वपूर्ण प्रकार के दान करके मरीजों और मेडिकल विज्ञान दोनों की मदद की.

इस अवसर पर सुधीर गुप्ता ने कहा कि अंगदान और देहदान मानवता की सबसे बड़ी सेवाओं में से एक है. मृत्यु के बाद भी इंसान अपने शरीर के माध्यम से दूसरों को जीवन, आशा और उपचार दे सकता है.

डॉक्टरों का कहना है कि भारत में अभी भी दान किए गए अंगों और ऊतकों की कमी है, खासकर बर्न मरीजों के लिए त्वचा की. ऐसी पहलें लोगों को प्रेरित करती हैं और समाज में जागरूकता बढ़ाती हैं.

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