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Wife Holi Celebration Vs Husband; Suppress Desires – Silent Stress

Wife Holi Celebration Vs Husband; Suppress Desires - Silent Stress
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12 घंटे पहलेलेखक: गौरव तिवारी

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सवाल- होली मेरा सबसे फेवरेट त्योहार है। बचपन में हम सबसे ज्यादा खुशी और उत्साह से होली का इंतजार करते थे। पूरा परिवार और मोहल्ला इकट्ठा होकर होली खेलता था। मेरे दिल में होली की बहुत सुंदर यादें हैं। लेकिन जब से मेरी शादी हुई है, होली खेलना बिल्कुल बंद हो गया है। मेरे पति बहुत कंजरवेटिव इंसान हैं। उन्हें मेरा होली खेलना बिल्कुल पसंद नहीं है।

मेरे ससुराल में कोई भी होली को लेकर एक्साइटेड नहीं रहता। होली खेलने का बहुत मन करता है, लेकिन हसबैंड के कारण मन मारकर रह जाती हूं। क्या करूं? पति से झगड़ा करूं या मन मारकर बैठी रहूं?

एक्सपर्ट: डॉ. जया सुकुल, क्लिनिकल साइकोलॉजिस्ट, नोएडा

जवाब- सबसे पहले तो आपका शुक्रिया, क्योंकि आपका सवाल पढ़कर मेरी अपने बचपन की होली की सुंदर यादें ताजा हो गईं। अब आपकी बात। आपकी परेशानी सिर्फ एक त्योहार तक सीमित नहीं है, यह आपकी ‘खुशी के अधिकार’ का भी मामला है।

होली कई लोगों के लिए यादों, रिश्तों और खुलकर जीने का एहसास है। आपके सवाल में जो सबसे खूबसूरत बात है, वह है आपका उस खुशी से जुड़ाव, बचपन की वो हंसी, रंगों में भीगा अपनापन और बिना किसी झिझक के जीने का मौका। यही वजह है कि आज जब वो सब नहीं मिल पा रहा, तो भीतर एक खालीपन महसूस हो रहा है।

सबसे पहले मैं आपको यह बताना चाहूंगी कि आपकी भावना पूरी तरह जायज है। आप सिर्फ होली खेलना मिस नहीं कर रही हैं, बल्कि उस माहौल को मिस कर रही हैं जिसमें आप खुलकर जी पाती थीं। चलिए समझते हैं कि इस स्थिति को बिना झगड़े के कैसे संभाला जाए।

इच्छाओं को दबाने से बनता है ‘साइलेंट स्ट्रेस’

शादी के बाद अक्सर महिलाएं अपने मन की इच्छाओं को ‘एडजस्टमेंट’ के नाम पर दबा देती हैं। शुरू में यह छोटा सा समझौता लगता है, लेकिन लंबे समय में यही दबाव अंदर-ही-अंदर फ्रस्ट्रेशन, उदासी और कभी-कभी गुस्से का रूप ले लेता है।

जब आप बार-बार अपने मन को दबाती, रोकती हैं कि “चलो, इस बार नहीं खेलते, पति को पसंद नहीं है,” तो धीरे-धीरे आप खुद से दूर होने लगती हैं। साइकोलॉजी की भाषा में इसे ‘सेल्फ-सप्रेशन’ कहते हैं, जो मेंटल स्ट्रेस की मुख्य वजह बन सकता है। इसके क्या असर होते हैं, ग्राफिक में देखिए-

आप मिस कर रही हैं ‘खुलकर जीने का एहसास’

आपको लग रहा होगा कि ये फ्रस्ट्रेशन होली में ‘रंग’ न खेल पाने की वजह से है, लेकिन असल में आप रंग नहीं, वो ‘आजादी का एहसास’ मिस कर रही हैं। जब आप अपनों के साथ मिलकर होली खेलती थीं, तो वो एक ऐसा माहौल होता था, जिसमें कोई जजमेंट नहीं था। सब हंसते थे, गले मिलते थे और बेफिक्र रहते थे।

इस असली बात को समझना बहुत जरूरी है, क्योंकि समाधान भी यहीं से निकलेगा। जब आप जान जाएंगी कि आपकी असली जरूरत क्या है, तो उसे पूरा करने के रास्ते भी साफ दिखने लगेंगे।

ससुराल का माहौल अलग होना गलत नहीं

आपके ससुराल में अगर कोई होली नहीं खेलता है, तो हो सकता है कि उनके घर में कभी ऐसा माहौल ही नहीं रहा हो। हर परिवार का ‘सेलिब्रेशन’ का तरीका अलग होता है। कुछ परिवारों के लिए त्योहार का मतलब सिर्फ अच्छा खाना और आराम करना होता है।

हमें यह समझना होगा कि आपके पति या ससुराल वाले ‘बुरे’ नहीं हैं। बस उनका नजरिया अलग है। हो सकता है कि उनके पीछे कुछ वाजिब कारण हों।

मायके जाने से हल हो सकती है समस्या

आपने अपने सवाल में ही समाधान का संकेत दिया है कि आपके मायके में होली आज भी वैसी ही धूमधाम से खेली जाती है। यही सबसे सरल संतुलित रास्ता है।

  • प्लानिंग करें: आप हर साल या हर दूसरे साल होली पर अपने मायके जाने का प्लान बना सकती हैं।
  • वही पुराना माहौल: वहां आपको वही यादें और वही बेफिक्री दोबारा मिलेगी।
  • बिना डर के खुशी: वहां आपको पति की नाराजगी या ससुराल के नियमों का डर नहीं रहेगा।
  • रिश्ते में बैलेंस: इससे न तो आपको अपनी इच्छा दबानी पड़ेगी और न ही पति से सीधा टकराव होगा।

पति से बात कैसे करें?

झगड़ा करना या मन मारकर बैठना, दोनों ही एक्सट्रीम फैसले हैं। आपको बीच का रास्ता निकालना होगा। पति को यह न कहें कि “आप गलत हैं”, बल्कि यह कहें कि “होली मेरे लिए कितनी जरूरी है।”

ऐसे बोलें, “मुझे पता है, आपको रंगों से परेशानी है और मैं उसका सम्मान करती हूं। लेकिन होली मेरे बचपन का सबसे प्यारा हिस्सा है। जब मैं नहीं खेलती, तो मुझे बहुत उदासी महसूस होती है। क्या इस बार मैं दो दिन के लिए मम्मी के घर जाकर होली खेल आऊं? इससे आपकी शांति भी बनी रहेगी और मेरी खुशी भी।”

खुद को खोने मत दीजिए

शादी के बाद अक्सर महिलाएं अपनी पहचान धीरे-धीरे खोने लगती हैं। वे भूल जाती हैं कि उनकी भी कुछ पसंद थी। याद रखिए, एक खुशहाल रिश्ता वही होता है, जहां दोनों पार्टनर अपनी व्यक्तिगत खुशियों को भी जगह दें।

आपकी खुशियां, आपकी पसंद, आपकी छोटी-छोटी इच्छाएं उतनी ही महत्वपूर्ण हैं, जितना आपका रिश्ता। अगर आप अंदर से खुश नहीं रहेंगी, तो आप एक अच्छी पत्नी या बहू की भूमिका भी लंबे समय तक नहीं निभा पाएंगी।

झगड़ा नहीं, समझदारी से मिलता है समाधान

आपकी समस्या का समाधान झगड़े में नहीं, बल्कि समझदारी में है। अपनी इच्छाओं को दबाइए मत, बल्कि उन्हें जीने का नया तरीका ढूंढिए। होली रंगों का त्योहार है, लेकिन उससे भी ज्यादा यह ‘दिल के रंगों’ का त्योहार है। इन रंगों को अपने जीवन से गायब मत होने दीजिए।

इस बार होली पर अपने मायके जाने का प्लान बनाइए या पति को प्यार से अपनी भावनाओं का हिस्सा बनाइए। यकीन मानिए, जब आप अपनी खुशी की जिम्मेदारी खुद लेंगी, तो आपके चेहरे की मुस्कान ही आपके हर सवाल का सबसे सुंदर जवाब होगी।

हेल्दी रिश्ते की 3 सीख

  • एक-दूसरे की आदतों को स्वीकार करें।
  • पार्टनर को अपनी पसंद की चीजें करने की आजादी दें।
  • अपनी खुशी के लिए पार्टनर पर 100% निर्भर न रहें।

यह होली आपकी जिंदगी में फिर से वही बचपन वाली चमक लेकर आएगी।

………………………

रिलेशनशिप एडवाइज से जुड़ी ये खबर भी पढ़िए

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आपके सवाल पूछने के तरीके से लगता है कि आप एक समझदार इंसान हैं, जो रिश्ता बचाने की कोशिश कर रही हैं, लेकिन खुद को भी दर्द नहीं देना चाहतीं। ये अच्छी बात है। चलिए, धीरे-धीरे समझते हैं कि आपके रिश्ते में क्या हो रहा है और ऐसी स्थिति में आपको क्या करना चाहिए। आगे पढ़िए…

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राजनीति

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12 घंटे पहलेलेखक: गौरव तिवारी

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जवाब- सबसे पहले तो आपका शुक्रिया, क्योंकि आपका सवाल पढ़कर मेरी अपने बचपन की होली की सुंदर यादें ताजा हो गईं। अब आपकी बात। आपकी परेशानी सिर्फ एक त्योहार तक सीमित नहीं है, यह आपकी ‘खुशी के अधिकार’ का भी मामला है।

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सबसे पहले मैं आपको यह बताना चाहूंगी कि आपकी भावना पूरी तरह जायज है। आप सिर्फ होली खेलना मिस नहीं कर रही हैं, बल्कि उस माहौल को मिस कर रही हैं जिसमें आप खुलकर जी पाती थीं। चलिए समझते हैं कि इस स्थिति को बिना झगड़े के कैसे संभाला जाए।

इच्छाओं को दबाने से बनता है ‘साइलेंट स्ट्रेस’

शादी के बाद अक्सर महिलाएं अपने मन की इच्छाओं को ‘एडजस्टमेंट’ के नाम पर दबा देती हैं। शुरू में यह छोटा सा समझौता लगता है, लेकिन लंबे समय में यही दबाव अंदर-ही-अंदर फ्रस्ट्रेशन, उदासी और कभी-कभी गुस्से का रूप ले लेता है।

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आपको लग रहा होगा कि ये फ्रस्ट्रेशन होली में ‘रंग’ न खेल पाने की वजह से है, लेकिन असल में आप रंग नहीं, वो ‘आजादी का एहसास’ मिस कर रही हैं। जब आप अपनों के साथ मिलकर होली खेलती थीं, तो वो एक ऐसा माहौल होता था, जिसमें कोई जजमेंट नहीं था। सब हंसते थे, गले मिलते थे और बेफिक्र रहते थे।

इस असली बात को समझना बहुत जरूरी है, क्योंकि समाधान भी यहीं से निकलेगा। जब आप जान जाएंगी कि आपकी असली जरूरत क्या है, तो उसे पूरा करने के रास्ते भी साफ दिखने लगेंगे।

ससुराल का माहौल अलग होना गलत नहीं

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हमें यह समझना होगा कि आपके पति या ससुराल वाले ‘बुरे’ नहीं हैं। बस उनका नजरिया अलग है। हो सकता है कि उनके पीछे कुछ वाजिब कारण हों।

मायके जाने से हल हो सकती है समस्या

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  • प्लानिंग करें: आप हर साल या हर दूसरे साल होली पर अपने मायके जाने का प्लान बना सकती हैं।
  • वही पुराना माहौल: वहां आपको वही यादें और वही बेफिक्री दोबारा मिलेगी।
  • बिना डर के खुशी: वहां आपको पति की नाराजगी या ससुराल के नियमों का डर नहीं रहेगा।
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ऐसे बोलें, “मुझे पता है, आपको रंगों से परेशानी है और मैं उसका सम्मान करती हूं। लेकिन होली मेरे बचपन का सबसे प्यारा हिस्सा है। जब मैं नहीं खेलती, तो मुझे बहुत उदासी महसूस होती है। क्या इस बार मैं दो दिन के लिए मम्मी के घर जाकर होली खेल आऊं? इससे आपकी शांति भी बनी रहेगी और मेरी खुशी भी।”

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इस बार होली पर अपने मायके जाने का प्लान बनाइए या पति को प्यार से अपनी भावनाओं का हिस्सा बनाइए। यकीन मानिए, जब आप अपनी खुशी की जिम्मेदारी खुद लेंगी, तो आपके चेहरे की मुस्कान ही आपके हर सवाल का सबसे सुंदर जवाब होगी।

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  • एक-दूसरे की आदतों को स्वीकार करें।
  • पार्टनर को अपनी पसंद की चीजें करने की आजादी दें।
  • अपनी खुशी के लिए पार्टनर पर 100% निर्भर न रहें।

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