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MP Vulture Death | 1096Km Flight; GPS Signal Reveals Cause

MP Vulture Death | 1096Km Flight; GPS Signal Reveals Cause

23 फरवरी को मुख्यमंत्री डॉ. मोहन यादव ने गिद्धों को प्राकृतिक आवास में छोड़ा था।

मध्य प्रदेश के हलाली डैम से 1 महीने पहले उड़ा लंबी चोंच वाला एक गिद्ध राजस्थान में मृत मिला है। कुल 1096 किलोमीटर की दूरी तय करने के बाद गिद्ध का शव राजस्थान के बारां जिले में मिला। जीपीएस सिग्नल की वजह से मौत का पता चला। सिग्नल एक ही जगह पर स्थिर था।

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बता दें कि मध्यप्रदेश वन विभाग के गिद्ध संरक्षण कार्यक्रम के अंतर्गत बॉम्बे नेचुरल हिस्ट्री सोसायटी और वन विहार के वल्चर कंजर्वेशन ब्रीडिंग सेंटर भोपाल के सहयोग से 23 फरवरी-26 को हलाली डैम से लंबी चोंच वाले 5 गिद्ध प्राकृतिक आवास में छोड़े गए थे। मुख्यमंत्री डॉ. मोहन यादव ने इन गिद्धों को प्राकृतिक आवास में छोड़ा था। इनमें से एक गिद्ध के पोस्ट रिलीज मूवमेंट के विश्लेषण के दौरान उसकी मृत्यु की जानकारी मिली है।

जीपीएस से रख रहे थे नजर रिलीज के बाद पक्षी की गतिविधियों एवं स्थानिक गतिशीलता का अध्ययन करने के लिए उसे GPS-GSM ट्रैकिंग उपकरण से सतत निगरानी में रखा गया था।

प्राप्त ट्रैकिंग आंकड़ों के विश्लेषण से पता चला कि गिद्ध ने विभिन्न स्थलों के मध्य विचरण करते हुए लगभग 1 हजार 96 किलोमीटर की कुल दूरी तय की। इसका मूवमेंट पैटर्न इस प्रजाति के ज्ञात व्यवहार के अनुरूप पाया गया। जिसमें भोजन एवं विश्राम स्थलों के बीच व्यापक आवागमन शामिल होता है।

रविवार को मिला आखिरी सिग्नल रविवार को राजस्थान के बारां जिले से गिद्ध का अंतिम GPS सिग्नल प्राप्त हुआ। जहां उसकी स्थिति कुछ समय के लिए सीमित क्षेत्र में स्थिर रही। इसके बाद बारां वन मंडल को सूचित कर स्थल पर खोजबीन कराई गई। वन विभाग की टीम ने केलवाड़ा क्षेत्र के समीप एक कृषि क्षेत्र में गिद्ध का शव और उसका GPS टैग बरामद किया।

शव का पोस्टमार्टम कराया वन विहार के अनुसार, गिद्ध के शव को पोस्टमार्टम के लिए सुरक्षित रूप से बरामद किया गया है। मृत्यु के कारणों का निर्धारण करने के लिए विस्तृत जांच प्रारंभ की गई है। जांच प्रतिवेदन एवं पोस्टमार्टम रिपोर्ट प्राप्त होने के उपरांत विस्तृत जानकारी पता चलेगी। बता दें कि इसी कार्यक्रम के अंतर्गत मुक्त किए गए अन्य 4 गिद्ध वर्तमान में हलाली बांध क्षेत्र में सुरक्षित हैं और उनकी गतिविधियां सामान्य रूप से जारी हैं।

ये भी जानिए… प्रदेश में ऐसे बढ़ी गिद्धों की संख्या जानकारी के अनुसार, प्रदेश में गिद्धों की गणना की शुरुआत वर्ष 2016 से की गई थी। प्रदेश में गिद्धों की कुल 7 प्रजातियां पाई जाती हैं। इसमें से 4 प्रजातियां स्थानीय एवं 3 प्रजाति प्रवासी हैं। गिद्धों की गणना करने के लिए शीत ऋतु का अंतिम समय सही रहता है। इस दौरान स्थानीय एवं प्रवासी गिद्धों की गणना आसानी से हो जाती है। वर्ष 2019 की गणना में गिद्धों की संख्या 8 हजार 397, वर्ष 2021 में 9 हजार 446, वर्ष 2024 में 10 हजार 845 और 2025 में 12 हजार 981 हो गई थी। इस बार हुई गणना में यह संख्या 14 हजार से ज्यादा पहुंच सकती है।

कभी विलुप्त होने की कगार पर थे गिद्ध एक्सपर्ट के मुताबिक, गिद्ध जल्दी अपना साथी या मैटिंग पेयर नहीं बनाते हैं। यह पक्षी असल में नर्वस किस्म का जीव है। इस मामले में शर्मिला कहा जा सकता है। गिद्ध कभी विलुप्त होने की कगार पर थे। मप्र सहित देशभर में ‘धरती के सफाई दूत’ की संख्या बुरी तरह घटती जा रही थी, लेकिन अब प्रदेश में इनकी संख्या लगातार बढ़ रही है।

वन विहार में 3 साल पहले हरियाणा से लाए गए थे गिद्ध भोपाल के वन विहार नेशनल पार्क में करीब तीन साल पहले हरियाणा से सफेद पीठ वाले 20 गिद्ध लाए गए थे। 1100 किलोमीटर की यात्रा करके यह भोपाल पहुंचे थे। वर्तमान में यह गिद्ध संरक्षण एवं संवर्धन केंद्र की एवरी में है। 20 व्हाइट रम वल्चर (सफेद पीठ वाले गिद्ध) में 5 नर और 5 मादा, 10 सब एडल्ट गिद्ध थे।

अंडे से जीवित निकलने का सक्सेस रेट 50% गिद्ध साल में एक ही बार अंडे देते हैं। साइज में यह मुर्गी के अंडे से तीन गुना बड़े होते हैं। मई-जून से अक्टूबर के दौरान मैटिंग सीजन और अंडे देने का समय होता है। अंडे से बच्चे जीवित निकलने का सक्सेस रेट 50% माना जाता है। यही वजह है कि आधे अंडे विकसित नहीं होते हैं। अंडे से 55 दिन में बच्चा निकलता है। चार महीने बच्चा घोंसले में रहता है। फिर वह उड़ने के लिए तैयार हो जाता है।

इसलिए कम हो गई थी गिद्धों की संख्या एक आंकड़े के अनुसार, वर्ष 1990 से 92 में भारत में 4 करोड़ गिद्ध थे। साल दर साल ये संख्या कम होती गई। पशुओं को दर्द, सूजन आदि के दौरान डायक्लोफेनाक दवा दी जाती है। इनके खाने के बाद मरने वाले पशु या जानवर का मांस गिद्ध खाते हैं। दवा के प्रभाव से गिद्धों की ज्यादा मौत हो जाती है। यह दवा प्रतिबंधित की गई है।

गिद्धों से जुड़ी जानकारी…

2014 में शुरू हुए थे संरक्षण के प्रयास भोपाल के केरवा डैम में गिद्ध प्रजनन केंद्र की स्थापना के साथ वर्ष 2014 में गिद्धों के संरक्षण के प्रयास शुरू हुए थे। मार्च 2017 में यहां पहले सफल प्रजनन के रूप में सफेद पीठ वाले गिद्ध का चूजा पैदा हुआ था। यहां सफेद पीठ वाले (Oriental White-backed) और लंबी चोंच वाले (Long-billed) गिद्धों का प्रजनन किया जा रहा है। इसके अतिरिक्त, गिद्धों के संरक्षण और उनके प्राकृतिक आवास के लिए पन्ना (पवई), रायसेन (हलाली डैम), शिवपुरी और गांधीसागर अभयारण्य (मंदसौर) में भी विशेष प्रयास किए जा रहे हैं।

2016 में पहली बार हुई थी गणना मध्य प्रदेश में 2016 में पहली बार गिद्धों की गणना हुई थी। तब 7028 गिद्ध गिने गए थे। इसके बाद से लगातार गिनती की जा रही है। गिद्धों को उनके प्राकृतिक आवास में छोड़े जाने से पहले GPS ट्रैकर लगाए जाते हैं ताकि उनकी गतिविधियों पर नज़र रखी जा सके।

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23 फरवरी को मुख्यमंत्री डॉ. मोहन यादव ने गिद्धों को प्राकृतिक आवास में छोड़ा था।

मध्य प्रदेश के हलाली डैम से 1 महीने पहले उड़ा लंबी चोंच वाला एक गिद्ध राजस्थान में मृत मिला है। कुल 1096 किलोमीटर की दूरी तय करने के बाद गिद्ध का शव राजस्थान के बारां जिले में मिला। जीपीएस सिग्नल की वजह से मौत का पता चला। सिग्नल एक ही जगह पर स्थिर था।

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बता दें कि मध्यप्रदेश वन विभाग के गिद्ध संरक्षण कार्यक्रम के अंतर्गत बॉम्बे नेचुरल हिस्ट्री सोसायटी और वन विहार के वल्चर कंजर्वेशन ब्रीडिंग सेंटर भोपाल के सहयोग से 23 फरवरी-26 को हलाली डैम से लंबी चोंच वाले 5 गिद्ध प्राकृतिक आवास में छोड़े गए थे। मुख्यमंत्री डॉ. मोहन यादव ने इन गिद्धों को प्राकृतिक आवास में छोड़ा था। इनमें से एक गिद्ध के पोस्ट रिलीज मूवमेंट के विश्लेषण के दौरान उसकी मृत्यु की जानकारी मिली है।

जीपीएस से रख रहे थे नजर रिलीज के बाद पक्षी की गतिविधियों एवं स्थानिक गतिशीलता का अध्ययन करने के लिए उसे GPS-GSM ट्रैकिंग उपकरण से सतत निगरानी में रखा गया था।

प्राप्त ट्रैकिंग आंकड़ों के विश्लेषण से पता चला कि गिद्ध ने विभिन्न स्थलों के मध्य विचरण करते हुए लगभग 1 हजार 96 किलोमीटर की कुल दूरी तय की। इसका मूवमेंट पैटर्न इस प्रजाति के ज्ञात व्यवहार के अनुरूप पाया गया। जिसमें भोजन एवं विश्राम स्थलों के बीच व्यापक आवागमन शामिल होता है।

रविवार को मिला आखिरी सिग्नल रविवार को राजस्थान के बारां जिले से गिद्ध का अंतिम GPS सिग्नल प्राप्त हुआ। जहां उसकी स्थिति कुछ समय के लिए सीमित क्षेत्र में स्थिर रही। इसके बाद बारां वन मंडल को सूचित कर स्थल पर खोजबीन कराई गई। वन विभाग की टीम ने केलवाड़ा क्षेत्र के समीप एक कृषि क्षेत्र में गिद्ध का शव और उसका GPS टैग बरामद किया।

शव का पोस्टमार्टम कराया वन विहार के अनुसार, गिद्ध के शव को पोस्टमार्टम के लिए सुरक्षित रूप से बरामद किया गया है। मृत्यु के कारणों का निर्धारण करने के लिए विस्तृत जांच प्रारंभ की गई है। जांच प्रतिवेदन एवं पोस्टमार्टम रिपोर्ट प्राप्त होने के उपरांत विस्तृत जानकारी पता चलेगी। बता दें कि इसी कार्यक्रम के अंतर्गत मुक्त किए गए अन्य 4 गिद्ध वर्तमान में हलाली बांध क्षेत्र में सुरक्षित हैं और उनकी गतिविधियां सामान्य रूप से जारी हैं।

ये भी जानिए… प्रदेश में ऐसे बढ़ी गिद्धों की संख्या जानकारी के अनुसार, प्रदेश में गिद्धों की गणना की शुरुआत वर्ष 2016 से की गई थी। प्रदेश में गिद्धों की कुल 7 प्रजातियां पाई जाती हैं। इसमें से 4 प्रजातियां स्थानीय एवं 3 प्रजाति प्रवासी हैं। गिद्धों की गणना करने के लिए शीत ऋतु का अंतिम समय सही रहता है। इस दौरान स्थानीय एवं प्रवासी गिद्धों की गणना आसानी से हो जाती है। वर्ष 2019 की गणना में गिद्धों की संख्या 8 हजार 397, वर्ष 2021 में 9 हजार 446, वर्ष 2024 में 10 हजार 845 और 2025 में 12 हजार 981 हो गई थी। इस बार हुई गणना में यह संख्या 14 हजार से ज्यादा पहुंच सकती है।

कभी विलुप्त होने की कगार पर थे गिद्ध एक्सपर्ट के मुताबिक, गिद्ध जल्दी अपना साथी या मैटिंग पेयर नहीं बनाते हैं। यह पक्षी असल में नर्वस किस्म का जीव है। इस मामले में शर्मिला कहा जा सकता है। गिद्ध कभी विलुप्त होने की कगार पर थे। मप्र सहित देशभर में ‘धरती के सफाई दूत’ की संख्या बुरी तरह घटती जा रही थी, लेकिन अब प्रदेश में इनकी संख्या लगातार बढ़ रही है।

वन विहार में 3 साल पहले हरियाणा से लाए गए थे गिद्ध भोपाल के वन विहार नेशनल पार्क में करीब तीन साल पहले हरियाणा से सफेद पीठ वाले 20 गिद्ध लाए गए थे। 1100 किलोमीटर की यात्रा करके यह भोपाल पहुंचे थे। वर्तमान में यह गिद्ध संरक्षण एवं संवर्धन केंद्र की एवरी में है। 20 व्हाइट रम वल्चर (सफेद पीठ वाले गिद्ध) में 5 नर और 5 मादा, 10 सब एडल्ट गिद्ध थे।

अंडे से जीवित निकलने का सक्सेस रेट 50% गिद्ध साल में एक ही बार अंडे देते हैं। साइज में यह मुर्गी के अंडे से तीन गुना बड़े होते हैं। मई-जून से अक्टूबर के दौरान मैटिंग सीजन और अंडे देने का समय होता है। अंडे से बच्चे जीवित निकलने का सक्सेस रेट 50% माना जाता है। यही वजह है कि आधे अंडे विकसित नहीं होते हैं। अंडे से 55 दिन में बच्चा निकलता है। चार महीने बच्चा घोंसले में रहता है। फिर वह उड़ने के लिए तैयार हो जाता है।

इसलिए कम हो गई थी गिद्धों की संख्या एक आंकड़े के अनुसार, वर्ष 1990 से 92 में भारत में 4 करोड़ गिद्ध थे। साल दर साल ये संख्या कम होती गई। पशुओं को दर्द, सूजन आदि के दौरान डायक्लोफेनाक दवा दी जाती है। इनके खाने के बाद मरने वाले पशु या जानवर का मांस गिद्ध खाते हैं। दवा के प्रभाव से गिद्धों की ज्यादा मौत हो जाती है। यह दवा प्रतिबंधित की गई है।

गिद्धों से जुड़ी जानकारी…

2014 में शुरू हुए थे संरक्षण के प्रयास भोपाल के केरवा डैम में गिद्ध प्रजनन केंद्र की स्थापना के साथ वर्ष 2014 में गिद्धों के संरक्षण के प्रयास शुरू हुए थे। मार्च 2017 में यहां पहले सफल प्रजनन के रूप में सफेद पीठ वाले गिद्ध का चूजा पैदा हुआ था। यहां सफेद पीठ वाले (Oriental White-backed) और लंबी चोंच वाले (Long-billed) गिद्धों का प्रजनन किया जा रहा है। इसके अतिरिक्त, गिद्धों के संरक्षण और उनके प्राकृतिक आवास के लिए पन्ना (पवई), रायसेन (हलाली डैम), शिवपुरी और गांधीसागर अभयारण्य (मंदसौर) में भी विशेष प्रयास किए जा रहे हैं।

2016 में पहली बार हुई थी गणना मध्य प्रदेश में 2016 में पहली बार गिद्धों की गणना हुई थी। तब 7028 गिद्ध गिने गए थे। इसके बाद से लगातार गिनती की जा रही है। गिद्धों को उनके प्राकृतिक आवास में छोड़े जाने से पहले GPS ट्रैकर लगाए जाते हैं ताकि उनकी गतिविधियों पर नज़र रखी जा सके।

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