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NSE IPO Rules Impact Investors, Unlisted Shares Drop; IPO Expected June 2026

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31 मिनट पहले

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NSE के आईपीओ की खबरों के बीच इसके अनलिस्टेड शेयर ₹2,075 के हाई से गिरकर ₹1,885 पर आ गए हैं। इसकी वजह SEBI का वह नियम है जिसके तहत केवल वही निवेशक IPO में शेयर बेच सकते हैं जिन्होंने कम से कम एक साल पहले से शेयर होल्ड किए हों।

₹20,000 करोड़ से ज्यादा का IPO, पूरा OFS होगा

NSE अपने IPO के जरिए ₹20,000 करोड़ से ज्यादा जुटाना चाहती है। यह पूरी तरह ऑफर फॉर सेल (OFS) होगा यानी NSE खुद कोई नया पैसा नहीं जुटाएगी। सारी रकम मौजूदा शेयरधारकों को मिलेगी जो अपनी हिस्सेदारी बेचना चाहते हैं। NSE करीब 4 से 4.5% इक्विटी इस रास्ते से बेचेगी। ड्राफ्ट रेड हेरिंग प्रॉस्पेक्टस जून तक दाखिल होने की उम्मीद है।

NSE ने पहली बार 2016 में IPO के लिए DRHP फाइल किया था, लेकिन रेगुलेटरी और लीगल मुद्दों की वजह से वापस लेना पड़ा था। उसके बाद से को-लोकेशन और डार्क फाइबर जैसे मामलों में जांच चल रही थी, जिसने IPO को रोक रखा था।

NSE ने पहली बार 2016 में IPO के लिए DRHP फाइल किया था, लेकिन रेगुलेटरी और लीगल मुद्दों की वजह से वापस लेना पड़ा था। उसके बाद से को-लोकेशन और डार्क फाइबर जैसे मामलों में जांच चल रही थी, जिसने IPO को रोक रखा था।

नए निवेशक OFS में शामिल नहीं हो पाएंगे

SEBI के मुताबिक OFS में शेयर बेचने के लिए निवेशक को ड्राफ्ट पेपर दाखिल होने से कम से कम एक साल पहले से शेयर होल्ड करने होंगे। यानी जून 2025 से पहले के खरीदार ही हिस्सा ले सकते हैं। जो निवेशक आज अनलिस्टेड मार्केट से शेयर खरीदेंगे, वे IPO में शेयर नहीं बेच पाएंगे। शेयरधारकों को OFS में शामिल होने के लिए 27 अप्रैल तक अपनी सहमति भी देनी होगी।

3 वजहों से गिर रहे अनलिस्टेड शेयर

  • पहली वजह: OFS की पात्रता शर्त ने लास्ट-मिनट निवेशकों को बाहर कर दिया है। पहले लोग देर से शेयर खरीदकर IPO का फायदा उठाते थे, अब यह संभव नहीं।
  • दूसरी वजह: वैल्युएशन को लेकर सवाल उठ रहे हैं। अनलिस्टेड कीमतें पहले ही काफी बढ़ चुकी है। अब जैसे-जैसे IPO स्ट्रक्चर स्पष्ट हो रहा है, बाजार कीमतों को फिर से आंक रहा है।
  • तीसरी वजह: प्राइमरी मार्केट में अब निवेशक केवल हाइप के पीछे नहीं भाग रहे, बल्कि लिस्टिंग के बाद के प्रदर्शन पर ध्यान दे रहे हैं।

1.8 लाख शेयरधारकों ने जटिलता बढ़ाई

NSE का शेयर होल्डर बेस एक साल में तेजी से बढ़ा है। 2025 की शुरुआत में जहां 39,000 निवेशक थे, वहीं साल के अंत तक यह बढ़कर 1.8 लाख के पार पहुंच गए।

इतने बड़े और बिखरे हुए बेस के कारण OFS की प्रक्रिया जटिल हो गई है। एक्सचेंज ने इस पूरी प्रक्रिया को संभालने के लिए बैंकर्स और कानूनी सलाहकारों की एक बड़ी टीम नियुक्त की है।

निवेशकों के लिए क्या है रिस्क?

शेयरधारकों के लिए सबसे बड़ी अनिश्चितता कीमत को लेकर है, क्योंकि फाइनल प्राइस बुक-बिल्डिंग प्रोसेस से ही तय होगा। इसके अलावा, यदि ऑफर किए गए शेयर पूरी तरह नहीं बिकते हैं, तो बचे हुए शेयरों पर लिस्टिंग के बाद 6 महीने का लॉक-इन पीरियड लागू हो सकता है।

नॉलेज पार्ट:

  • OFS: कंपनी के प्रमोटर या पुराने निवेशक अपनी हिस्सेदारी आम जनता को बेचते हैं। इससे मिलने वाला पैसा कंपनी के पास नहीं बल्कि शेयर बेचने वाले निवेशकों के पास जाता है।
  • अनलिस्टेड मार्केट: यहां उन कंपनियों के शेयरों की खरीद-बिक्री होती है जो NSE या BSE जैसे स्टॉक एक्सचेंज पर लिस्टेड नहीं हैं। इसमें निवेशक कंपनी के IPO आने से पहले ही उसके शेयर खरीद सकते हैं, लेकिन यहां जोखिम और उतार-चढ़ाव ज्यादा होता है।

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NSE के आईपीओ की खबरों के बीच इसके अनलिस्टेड शेयर ₹2,075 के हाई से गिरकर ₹1,885 पर आ गए हैं। इसकी वजह SEBI का वह नियम है जिसके तहत केवल वही निवेशक IPO में शेयर बेच सकते हैं जिन्होंने कम से कम एक साल पहले से शेयर होल्ड किए हों।

₹20,000 करोड़ से ज्यादा का IPO, पूरा OFS होगा

NSE अपने IPO के जरिए ₹20,000 करोड़ से ज्यादा जुटाना चाहती है। यह पूरी तरह ऑफर फॉर सेल (OFS) होगा यानी NSE खुद कोई नया पैसा नहीं जुटाएगी। सारी रकम मौजूदा शेयरधारकों को मिलेगी जो अपनी हिस्सेदारी बेचना चाहते हैं। NSE करीब 4 से 4.5% इक्विटी इस रास्ते से बेचेगी। ड्राफ्ट रेड हेरिंग प्रॉस्पेक्टस जून तक दाखिल होने की उम्मीद है।

NSE ने पहली बार 2016 में IPO के लिए DRHP फाइल किया था, लेकिन रेगुलेटरी और लीगल मुद्दों की वजह से वापस लेना पड़ा था। उसके बाद से को-लोकेशन और डार्क फाइबर जैसे मामलों में जांच चल रही थी, जिसने IPO को रोक रखा था।

NSE ने पहली बार 2016 में IPO के लिए DRHP फाइल किया था, लेकिन रेगुलेटरी और लीगल मुद्दों की वजह से वापस लेना पड़ा था। उसके बाद से को-लोकेशन और डार्क फाइबर जैसे मामलों में जांच चल रही थी, जिसने IPO को रोक रखा था।

नए निवेशक OFS में शामिल नहीं हो पाएंगे

SEBI के मुताबिक OFS में शेयर बेचने के लिए निवेशक को ड्राफ्ट पेपर दाखिल होने से कम से कम एक साल पहले से शेयर होल्ड करने होंगे। यानी जून 2025 से पहले के खरीदार ही हिस्सा ले सकते हैं। जो निवेशक आज अनलिस्टेड मार्केट से शेयर खरीदेंगे, वे IPO में शेयर नहीं बेच पाएंगे। शेयरधारकों को OFS में शामिल होने के लिए 27 अप्रैल तक अपनी सहमति भी देनी होगी।

3 वजहों से गिर रहे अनलिस्टेड शेयर

  • पहली वजह: OFS की पात्रता शर्त ने लास्ट-मिनट निवेशकों को बाहर कर दिया है। पहले लोग देर से शेयर खरीदकर IPO का फायदा उठाते थे, अब यह संभव नहीं।
  • दूसरी वजह: वैल्युएशन को लेकर सवाल उठ रहे हैं। अनलिस्टेड कीमतें पहले ही काफी बढ़ चुकी है। अब जैसे-जैसे IPO स्ट्रक्चर स्पष्ट हो रहा है, बाजार कीमतों को फिर से आंक रहा है।
  • तीसरी वजह: प्राइमरी मार्केट में अब निवेशक केवल हाइप के पीछे नहीं भाग रहे, बल्कि लिस्टिंग के बाद के प्रदर्शन पर ध्यान दे रहे हैं।

1.8 लाख शेयरधारकों ने जटिलता बढ़ाई

NSE का शेयर होल्डर बेस एक साल में तेजी से बढ़ा है। 2025 की शुरुआत में जहां 39,000 निवेशक थे, वहीं साल के अंत तक यह बढ़कर 1.8 लाख के पार पहुंच गए।

इतने बड़े और बिखरे हुए बेस के कारण OFS की प्रक्रिया जटिल हो गई है। एक्सचेंज ने इस पूरी प्रक्रिया को संभालने के लिए बैंकर्स और कानूनी सलाहकारों की एक बड़ी टीम नियुक्त की है।

निवेशकों के लिए क्या है रिस्क?

शेयरधारकों के लिए सबसे बड़ी अनिश्चितता कीमत को लेकर है, क्योंकि फाइनल प्राइस बुक-बिल्डिंग प्रोसेस से ही तय होगा। इसके अलावा, यदि ऑफर किए गए शेयर पूरी तरह नहीं बिकते हैं, तो बचे हुए शेयरों पर लिस्टिंग के बाद 6 महीने का लॉक-इन पीरियड लागू हो सकता है।

नॉलेज पार्ट:

  • OFS: कंपनी के प्रमोटर या पुराने निवेशक अपनी हिस्सेदारी आम जनता को बेचते हैं। इससे मिलने वाला पैसा कंपनी के पास नहीं बल्कि शेयर बेचने वाले निवेशकों के पास जाता है।
  • अनलिस्टेड मार्केट: यहां उन कंपनियों के शेयरों की खरीद-बिक्री होती है जो NSE या BSE जैसे स्टॉक एक्सचेंज पर लिस्टेड नहीं हैं। इसमें निवेशक कंपनी के IPO आने से पहले ही उसके शेयर खरीद सकते हैं, लेकिन यहां जोखिम और उतार-चढ़ाव ज्यादा होता है।

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