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इजराइल में नेतन्याहू को हटाने एकजुट हुए दो पूर्व प्रधानमंत्री:बेनेट-लैपिड अपनी पार्टी का विलय करेंगे, 2021 में दोनों ने मिलकर बेंजामिन को हराया था

इजराइल में नेतन्याहू को हटाने एकजुट हुए दो पूर्व प्रधानमंत्री:बेनेट-लैपिड अपनी पार्टी का विलय करेंगे, 2021 में दोनों ने मिलकर बेंजामिन को हराया था

इजराइल में दो पूर्व प्रधानमंत्रियों नफ्ताली बेनेट और येर लैपिड ने मौजूदा पीएम बेंजामिन नेतन्याहू के खिलाफ एक साथ चुनाव लड़ने का फैसला किया है। उनका मकसद लंबे समय से सत्ता में रहे नेतन्याहू को हटाना है। दोनों पहले भी 2021 में साथ आए थे और उन्होंने अलग-अलग विचारधाराओं वाली पार्टियों को जोड़कर 12 साल से चली आ रही नेतन्याहू की सत्ता गिरा दी थी। अब दोनों नेताओं ने फिर से साथ आने का फैसला किया है। उन्होंने तय किया है कि अपनी-अपनी पार्टियों को मिलाकर एक नई पार्टी बनाई जाएगी, जिसकी अगुवाई बेनेट करेंगे। इजराइल में अक्टूबर 2027 में चुनाव होने हैं लेकिन माना जा रहा है कि नेतन्याहू इसी साल संसद भंग कर चुनाव करा सकते हैं। 2022 में टूट गया था गठबंधन 2021 में हुए समझौते के तहत पहले बेनेट प्रधानमंत्री बने और बाद में लैपिड को यह जिम्मेदारी संभालनी थी। हालांकि यह सरकार बहुत कम बहुमत पर टिकी थी। इसमें दक्षिणपंथी, वामपंथी, मध्यमार्गी और एक अरब पार्टी शामिल थी। इनकी अलग-अलग विचारधारा वाली इन पार्टियों में सुरक्षा, फिलिस्तीन और बस्तियों जैसे मुद्दों पर सबकी सोच अलग थी, जिससे बार-बार टकराव होता रहा। आखिरकार हालात ऐसे बन गए कि सरकार चलाना मुश्किल हो गया। तब बेनेट और लैपिड ने संसद भंग करने का फैसला किया और नए चुनाव कराए गए। इसमें नेतन्याहू की जीत हुई और वे फिर से सत्ता में लौट आए। तब से लैपिड विपक्ष के नेता हैं, जबकि बेनेट कुछ समय के लिए राजनीति से दूर हो गए थे। उनकी पार्टी यमीना ने भी चुनाव नहीं लड़ा था। लैपिड की पार्टी का कहना है कि इस कदम का मकसद विपक्ष को एकजुट करना, आपसी झगड़ों को खत्म करना और आने वाले अहम चुनाव जीतने पर पूरा ध्यान लगाना है। बेनेट-लैपिड की सोच अलग-अलग
बेनेट की छवि एक कट्टरपंथी यहूदी राष्ट्रवादी नेता की रही है। वे लंबे समय से दक्षिणपंथी राजनीति से जुड़े रहे हैं और फिलिस्तीन मुद्दे पर उनका रुख काफी सख्त माना जाता है। वे वेस्ट बैंक में यहूदी बस्तियों के समर्थक रहे हैं और फिलिस्तीनी राज्य बनाने के विचार के खिलाफ भी रहे हैं। उनका मानना रहा है कि इजराइल की सुरक्षा सबसे ऊपर है और इस मामले में किसी तरह की ढील नहीं दी जानी चाहिए। इसके उलट, लैपिड को एक धर्मनिरपेक्ष और उदार सोच वाला नेता माना जाता है। उनकी राजनीति ज्यादा व्यावहारिक और संतुलित मानी जाती है। वे शहरी मध्यम वर्ग, प्रोफेशनल लोगों और उदार विचारधारा वाले मतदाताओं में काफी लोकप्रिय हैं। लैपिड और बेनेट दोनों के लिए यह गठबंधन जरूरी लैपिड के लिए यह गठबंधन बहुत अहम माना जा रहा है। उनकी पार्टी येश अतीद इस समय विपक्ष की सबसे बड़ी पार्टी है और संसद में 24 सीटें हैं, लेकिन हाल के सर्वे बताते हैं कि अगली बार यह घटकर सिर्फ 5 सीटें रह सकती हैं। ऐसे में बेनेट के साथ आने से उनकी स्थिति मजबूत हो सकती है। दूसरी तरफ बेनेट के लिए भी यह गठबंधन जरूरी था। एक्सपर्ट का मानना है कि पूर्व चीफ ऑफ स्टाफ गादी आइजनकोट के आने से पूरा समीकरण बदल गया है। आइजनकोट की मजबूूत छवि और लोकप्रियता की वजह से वे बेनेट के वोट बैंक में सेंध लगा रहे थे। एक्सपर्ट्स के मुताबिक, सुरक्षा और सेना के मुद्दों को अहम मानने वाले वोटर अब आइजनकोट की तरफ जा रहे हैं। ऐसे में बेनेट के पास केंद्र की राजनीति छोड़कर लैपिड के साथ आने के अलावा ज्यादा विकल्प नहीं बचा था। इस गठबंधन से बेनेट को आर्थिक फायदा भी होगा। इजराइल में पार्टियों को मिलने वाला सरकारी फंड उनकी संसद में सीटों के आधार पर तय होता है। बेनेट की पार्टी को जहां करीब 11 मिलियन शेकेल मिलते, वहीं लैपिड की पार्टी को 27 मिलियन शेकेल मिलते हैं, क्योंकि उनके पास ज्यादा सीटें हैं। क्या यह गठबंधन नेतन्याहू को हरा पाएगा इजराइल की संसद में कुल 120 सीटें हैं। कुछ सर्वे बताते हैं कि अगर बेनेट, लैपिड और आइजनकोट तीनों साथ चुनाव लड़ें, तो उन्हें करीब 38 सीटें मिल सकती हैं और वे सबसे बड़ा दल बन सकते हैं। लेकिन इससे दोनों खेमों की कुल ताकत में बहुत बड़ा बदलाव नहीं होगा। एक्सपर्ट्स का मानना है कि इस गठबंधन का सबसे बड़ा असर मनोवैज्ञानिक हो सकता है। अगर लोगों को लगे कि विपक्ष एकजुट है और मजबूत है, तो ज्यादा वोटर वोट डालने के लिए बाहर आ सकते हैं। टाइम्स ऑफ इजराइल के मुताबिक इन सबमें सबसे बड़ा फैक्टर अब भी गादी आइजनकोट हैं। अगर वे इस गठबंधन में शामिल होते हैं तो विपक्ष और मजबूत हो सकता है। लेकिन अगर वे अलग चुनाव लड़ते हैं, तो वे दक्षिणपंथी वोटरों को ज्यादा आकर्षित कर सकते हैं, जो लैपिड के साथ नहीं जाना चाहते।

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इजराइल में दो पूर्व प्रधानमंत्रियों नफ्ताली बेनेट और येर लैपिड ने मौजूदा पीएम बेंजामिन नेतन्याहू के खिलाफ एक साथ चुनाव लड़ने का फैसला किया है। उनका मकसद लंबे समय से सत्ता में रहे नेतन्याहू को हटाना है। दोनों पहले भी 2021 में साथ आए थे और उन्होंने अलग-अलग विचारधाराओं वाली पार्टियों को जोड़कर 12 साल से चली आ रही नेतन्याहू की सत्ता गिरा दी थी। अब दोनों नेताओं ने फिर से साथ आने का फैसला किया है। उन्होंने तय किया है कि अपनी-अपनी पार्टियों को मिलाकर एक नई पार्टी बनाई जाएगी, जिसकी अगुवाई बेनेट करेंगे। इजराइल में अक्टूबर 2027 में चुनाव होने हैं लेकिन माना जा रहा है कि नेतन्याहू इसी साल संसद भंग कर चुनाव करा सकते हैं। 2022 में टूट गया था गठबंधन 2021 में हुए समझौते के तहत पहले बेनेट प्रधानमंत्री बने और बाद में लैपिड को यह जिम्मेदारी संभालनी थी। हालांकि यह सरकार बहुत कम बहुमत पर टिकी थी। इसमें दक्षिणपंथी, वामपंथी, मध्यमार्गी और एक अरब पार्टी शामिल थी। इनकी अलग-अलग विचारधारा वाली इन पार्टियों में सुरक्षा, फिलिस्तीन और बस्तियों जैसे मुद्दों पर सबकी सोच अलग थी, जिससे बार-बार टकराव होता रहा। आखिरकार हालात ऐसे बन गए कि सरकार चलाना मुश्किल हो गया। तब बेनेट और लैपिड ने संसद भंग करने का फैसला किया और नए चुनाव कराए गए। इसमें नेतन्याहू की जीत हुई और वे फिर से सत्ता में लौट आए। तब से लैपिड विपक्ष के नेता हैं, जबकि बेनेट कुछ समय के लिए राजनीति से दूर हो गए थे। उनकी पार्टी यमीना ने भी चुनाव नहीं लड़ा था। लैपिड की पार्टी का कहना है कि इस कदम का मकसद विपक्ष को एकजुट करना, आपसी झगड़ों को खत्म करना और आने वाले अहम चुनाव जीतने पर पूरा ध्यान लगाना है। बेनेट-लैपिड की सोच अलग-अलग
बेनेट की छवि एक कट्टरपंथी यहूदी राष्ट्रवादी नेता की रही है। वे लंबे समय से दक्षिणपंथी राजनीति से जुड़े रहे हैं और फिलिस्तीन मुद्दे पर उनका रुख काफी सख्त माना जाता है। वे वेस्ट बैंक में यहूदी बस्तियों के समर्थक रहे हैं और फिलिस्तीनी राज्य बनाने के विचार के खिलाफ भी रहे हैं। उनका मानना रहा है कि इजराइल की सुरक्षा सबसे ऊपर है और इस मामले में किसी तरह की ढील नहीं दी जानी चाहिए। इसके उलट, लैपिड को एक धर्मनिरपेक्ष और उदार सोच वाला नेता माना जाता है। उनकी राजनीति ज्यादा व्यावहारिक और संतुलित मानी जाती है। वे शहरी मध्यम वर्ग, प्रोफेशनल लोगों और उदार विचारधारा वाले मतदाताओं में काफी लोकप्रिय हैं। लैपिड और बेनेट दोनों के लिए यह गठबंधन जरूरी लैपिड के लिए यह गठबंधन बहुत अहम माना जा रहा है। उनकी पार्टी येश अतीद इस समय विपक्ष की सबसे बड़ी पार्टी है और संसद में 24 सीटें हैं, लेकिन हाल के सर्वे बताते हैं कि अगली बार यह घटकर सिर्फ 5 सीटें रह सकती हैं। ऐसे में बेनेट के साथ आने से उनकी स्थिति मजबूत हो सकती है। दूसरी तरफ बेनेट के लिए भी यह गठबंधन जरूरी था। एक्सपर्ट का मानना है कि पूर्व चीफ ऑफ स्टाफ गादी आइजनकोट के आने से पूरा समीकरण बदल गया है। आइजनकोट की मजबूूत छवि और लोकप्रियता की वजह से वे बेनेट के वोट बैंक में सेंध लगा रहे थे। एक्सपर्ट्स के मुताबिक, सुरक्षा और सेना के मुद्दों को अहम मानने वाले वोटर अब आइजनकोट की तरफ जा रहे हैं। ऐसे में बेनेट के पास केंद्र की राजनीति छोड़कर लैपिड के साथ आने के अलावा ज्यादा विकल्प नहीं बचा था। इस गठबंधन से बेनेट को आर्थिक फायदा भी होगा। इजराइल में पार्टियों को मिलने वाला सरकारी फंड उनकी संसद में सीटों के आधार पर तय होता है। बेनेट की पार्टी को जहां करीब 11 मिलियन शेकेल मिलते, वहीं लैपिड की पार्टी को 27 मिलियन शेकेल मिलते हैं, क्योंकि उनके पास ज्यादा सीटें हैं। क्या यह गठबंधन नेतन्याहू को हरा पाएगा इजराइल की संसद में कुल 120 सीटें हैं। कुछ सर्वे बताते हैं कि अगर बेनेट, लैपिड और आइजनकोट तीनों साथ चुनाव लड़ें, तो उन्हें करीब 38 सीटें मिल सकती हैं और वे सबसे बड़ा दल बन सकते हैं। लेकिन इससे दोनों खेमों की कुल ताकत में बहुत बड़ा बदलाव नहीं होगा। एक्सपर्ट्स का मानना है कि इस गठबंधन का सबसे बड़ा असर मनोवैज्ञानिक हो सकता है। अगर लोगों को लगे कि विपक्ष एकजुट है और मजबूत है, तो ज्यादा वोटर वोट डालने के लिए बाहर आ सकते हैं। टाइम्स ऑफ इजराइल के मुताबिक इन सबमें सबसे बड़ा फैक्टर अब भी गादी आइजनकोट हैं। अगर वे इस गठबंधन में शामिल होते हैं तो विपक्ष और मजबूत हो सकता है। लेकिन अगर वे अलग चुनाव लड़ते हैं, तो वे दक्षिणपंथी वोटरों को ज्यादा आकर्षित कर सकते हैं, जो लैपिड के साथ नहीं जाना चाहते।

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