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बच्चों को भी हो सकता है स्ट्रेस, आपके बच्चे में दिख रहे ये लक्षण तो न करें नजरअंदाज

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आज के समय में बच्चे भी तनाव का सामना कर रहे हैं. पढ़ाई का दबाव, बढ़ती प्रतियोगिता, परिवार में झगड़े, सोशल मीडिया का असर या आसपास होने वाली नकारात्मक घटनाएं बच्चों के मानसिक स्वास्थ्य पर गहरा प्रभाव डालती हैं. कई बार बच्चे अपने तनाव को खुलकर नहीं बता पाते, इसलिए माता-पिता के लिए उनके व्यवहार में होने वाले बदलावों को समझना बहुत जरूरी हो जाता है.

विशेषज्ञों के अनुसार, हर उम्र के बच्चों में तनाव के संकेत अलग-अलग दिखाई देते हैं. कुछ बच्चे चुप हो जाते हैं, जबकि कुछ गुस्सैल या डरपोक बन सकते हैं. अगर समय रहते इन संकेतों को पहचान लिया जाए, तो बच्चों की सही मदद की जा सकती है.

उम्र के हिसाब से स्ट्रेस के लक्षण
यूनिसेफ के मुताबिक, छोटे बच्चों में तनाव के लक्षण अलग होते हैं.

0 से 3 साल तक के बच्चे तनाव होने पर अपने माता-पिता या देखभाल करने वाले लोगों से ज्यादा चिपकने लगते हैं. कुछ बच्चे फिर से अंगूठा चूसना या बिस्तर गीला करना जैसी पुरानी आदतें अपनाने लगते हैं. इसके अलावा बार-बार रोना, चिड़चिड़ापन, डरना, ठीक से न सोना और खाने की आदतों में बदलाव भी तनाव के संकेत हो सकते हैं.

4 से 6 साल की उम्र के बच्चों में तनाव के कारण ध्यान लगाने में परेशानी हो सकती है. वे खेलना कम कर सकते हैं, ज्यादा चुप रहने लगते हैं या बहुत बेचैन दिखाई देते हैं. कुछ बच्चे बार-बार अपने माता-पिता के पास रहना चाहते हैं और अकेले रहने से डरते हैं.

7 से 12 साल के बच्चों में तनाव का असर थोड़ा अलग दिखाई देता है. इस उम्र में बच्चे अकेले रहना पसंद कर सकते हैं. उन्हें छोटी-छोटी बातों की चिंता सताने लगती है. गुस्सा बढ़ना, डर महसूस करना, पढ़ाई में ध्यान न लगना, याददाश्त कमजोर होना और सिरदर्द या पेट दर्द जैसी समस्याएं भी तनाव के कारण हो सकती हैं.

13 से 17 साल के किशोरों में तनाव ज्यादा गंभीर रूप ले सकता है. वे उदासी, शर्मिंदगी या अपराधबोध महसूस कर सकते हैं. कई बार वे परिवार से दूरी बनाने लगते हैं, बात नहीं मानते या जोखिम भरे व्यवहार करने लगते हैं. कुछ मामलों में बच्चे खुद को नुकसान पहुंचाने जैसी सोच भी रखने लगते हैं, जिसे बिल्कुल नजरअंदाज नहीं करना चाहिए.

इन बातों का रखें ध्यान
अगर बच्चा पूरी तरह चुप हो जाए, लोगों से दूरी बनाने लगे, लगातार कांपे, बहुत ज्यादा गुस्सा करे या खुद को और दूसरों को नुकसान पहुंचाने की कोशिश करे, तो तुरंत विशेषज्ञ की मदद लेनी चाहिए.
बच्चों का तनाव कम करने के लिए माता-पिता का प्यार और साथ बहुत जरूरी होता है. बच्चे से खुलकर बात करें और उसकी भावनाओं को समझने की कोशिश करें. कई बार बच्चे अपनी बात शब्दों में नहीं कह पाते, इसलिए उन्हें ड्रॉइंग बनाने या कहानी सुनाने के लिए कह सकते हैं. इसके अलावा बच्चों को गहरी सांस लेने जैसी आसान एक्सरसाइज भी सिखाई जा सकती है.

सेहत, रिलेशनशिप, लाइफ या धर्म-ज्योतिष से जुड़ी है कोई निजी उलझन तो हमें करें WhatsApp, आपका नाम गोपनीय रखकर देंगे जानकारी.

Disclaimer: इस खबर में दी गई दवा/औषधि और स्वास्थ्य से जुड़ी सलाह, एक्सपर्ट्स से की गई बातचीत के आधार पर है. यह सामान्य जानकारी है, व्यक्तिगत सलाह नहीं. इसलिए डॉक्टर्स से परामर्श के बाद ही कोई चीज उपयोग करें. Local-18 किसी भी उपयोग से होने वाले नुकसान के लिए जिम्मेदार नहीं होगा.

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विशेषज्ञों के अनुसार, हर उम्र के बच्चों में तनाव के संकेत अलग-अलग दिखाई देते हैं. कुछ बच्चे चुप हो जाते हैं, जबकि कुछ गुस्सैल या डरपोक बन सकते हैं. अगर समय रहते इन संकेतों को पहचान लिया जाए, तो बच्चों की सही मदद की जा सकती है.

उम्र के हिसाब से स्ट्रेस के लक्षण
यूनिसेफ के मुताबिक, छोटे बच्चों में तनाव के लक्षण अलग होते हैं.

0 से 3 साल तक के बच्चे तनाव होने पर अपने माता-पिता या देखभाल करने वाले लोगों से ज्यादा चिपकने लगते हैं. कुछ बच्चे फिर से अंगूठा चूसना या बिस्तर गीला करना जैसी पुरानी आदतें अपनाने लगते हैं. इसके अलावा बार-बार रोना, चिड़चिड़ापन, डरना, ठीक से न सोना और खाने की आदतों में बदलाव भी तनाव के संकेत हो सकते हैं.

4 से 6 साल की उम्र के बच्चों में तनाव के कारण ध्यान लगाने में परेशानी हो सकती है. वे खेलना कम कर सकते हैं, ज्यादा चुप रहने लगते हैं या बहुत बेचैन दिखाई देते हैं. कुछ बच्चे बार-बार अपने माता-पिता के पास रहना चाहते हैं और अकेले रहने से डरते हैं.

7 से 12 साल के बच्चों में तनाव का असर थोड़ा अलग दिखाई देता है. इस उम्र में बच्चे अकेले रहना पसंद कर सकते हैं. उन्हें छोटी-छोटी बातों की चिंता सताने लगती है. गुस्सा बढ़ना, डर महसूस करना, पढ़ाई में ध्यान न लगना, याददाश्त कमजोर होना और सिरदर्द या पेट दर्द जैसी समस्याएं भी तनाव के कारण हो सकती हैं.

13 से 17 साल के किशोरों में तनाव ज्यादा गंभीर रूप ले सकता है. वे उदासी, शर्मिंदगी या अपराधबोध महसूस कर सकते हैं. कई बार वे परिवार से दूरी बनाने लगते हैं, बात नहीं मानते या जोखिम भरे व्यवहार करने लगते हैं. कुछ मामलों में बच्चे खुद को नुकसान पहुंचाने जैसी सोच भी रखने लगते हैं, जिसे बिल्कुल नजरअंदाज नहीं करना चाहिए.

इन बातों का रखें ध्यान
अगर बच्चा पूरी तरह चुप हो जाए, लोगों से दूरी बनाने लगे, लगातार कांपे, बहुत ज्यादा गुस्सा करे या खुद को और दूसरों को नुकसान पहुंचाने की कोशिश करे, तो तुरंत विशेषज्ञ की मदद लेनी चाहिए.
बच्चों का तनाव कम करने के लिए माता-पिता का प्यार और साथ बहुत जरूरी होता है. बच्चे से खुलकर बात करें और उसकी भावनाओं को समझने की कोशिश करें. कई बार बच्चे अपनी बात शब्दों में नहीं कह पाते, इसलिए उन्हें ड्रॉइंग बनाने या कहानी सुनाने के लिए कह सकते हैं. इसके अलावा बच्चों को गहरी सांस लेने जैसी आसान एक्सरसाइज भी सिखाई जा सकती है.

सेहत, रिलेशनशिप, लाइफ या धर्म-ज्योतिष से जुड़ी है कोई निजी उलझन तो हमें करें WhatsApp, आपका नाम गोपनीय रखकर देंगे जानकारी.

Disclaimer: इस खबर में दी गई दवा/औषधि और स्वास्थ्य से जुड़ी सलाह, एक्सपर्ट्स से की गई बातचीत के आधार पर है. यह सामान्य जानकारी है, व्यक्तिगत सलाह नहीं. इसलिए डॉक्टर्स से परामर्श के बाद ही कोई चीज उपयोग करें. Local-18 किसी भी उपयोग से होने वाले नुकसान के लिए जिम्मेदार नहीं होगा.

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