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Himanta Biswa Sarma elected as NDA leader

Himanta Biswa Sarma elected as NDA leader

गुवाहाटी33 मिनट पहले

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रविवार को विधायक दल की बैठक में जेपी नड्डा ने हिमंता के नाम का ऐलान किया।

असम के अगले मुख्यमंत्री हिमंता बिस्वा सरमा होंगे। रविवार को बीजेपी की विधायक दल की बैठक में उनके ही नाम पर मुहर लगी। जेपी नड्डा ने उनके नाम का ऐलान किया। हिमंता 12 मई को सुबह 11 बजे लगातार दूसरी बार राज्य के मुख्यमंत्री पद की शपथ लेंगे। 4 मई को आए नतीजों में बीजेपी ने राज्य की 126 में से 82 सीटों पर बंपर जीत हासिल की थी।

शपथ ग्रहण समारोह में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी, भाजपा के शीर्ष नेतृत्व और एनडीए (NDA) के कई वरिष्ठ नेताओं के शामिल होंगे। हिमंता की ताजपोशी उत्तर-पूर्व में पार्टी की पैठ को और मजबूत करने के रूप में देखी जा रही है।

असम बीजेपी के अध्यक्ष दिलीप सैकिया ने कहा- हम दोपहर तक सरकार बनाने के अपने दावे के बारे में राज्यपाल को सूचित कर देंगे। 12 तारीख को होने वाले शपथ ग्रहण समारोह की तैयारियां चल रही हैं। यह एक ऐतिहासिक पल होगा, क्योंकि पीएम मोदी की उपस्थिति में हिमंता 102 विधायकों के साथ शपथ लेंगे।

असम में BJP की जीत के 4 बड़े फैक्टर

1. परिसीमन के बाद 36% मुस्लिम बहुल सीटें घटीं

2023 में असम में परिसीमन हुआ और विधानसभा सीटों की बाउंड्री दोबारा तय की गई। ST, SC की रिजर्व सीटें और बोडोलैंड ट्राइबल रीजन की सीटें बढ़ीं, लेकिन मुस्लिम बहुल सीटें 41 से घटकर 26 रह गईं।

2011 की जनगणना में असम में 34% मुसलमान थे। अनुमान के मुताबिक यह अब 40% के करीब हो गए हैं। फिर भी उनकी सीटें घट गई हैं। बीजेपी नॉर्थ-ईस्ट डेमोक्रेटिक अलायंस के साथ चुनाव में उतरी। बीजेपी के 90 उम्मीदावारों में कोई मुस्लिम नहीं था। साथी पार्टियों ने 36 में से 13 मुस्लिम उम्मीदवार उतारे। दूसरी तरफ कांग्रेस के नेतृत्व वाले महाजोत गठबंधन ने 22 मुस्लिम उम्मीदवार उतारे।

राजनीतिक विश्लेषक अशोक मलिक के मुताबिक, ‘नई सीमाओं ने मुस्लिम बहुल इलाकों के प्रभाव को सीमित कर दिया। साथ ही उन सीटों को भी फिर से व्यवस्थित किया जहां असमिया मुसलमान कम हो रहे थे। इससे हिमंत को उन सीटों पर बढ़त मिली जहां पहले भाजपा कमजोर थी।’

2. कांग्रेस और AIUDF के मुस्लिम वोट बंटे, बीजेपी को फायदा

2021 में कांग्रेस और बदरुद्दीन अजमल की AIUDF ने साथ चुनाव लड़ा था। उन्हें बंगाली मुसलमानों के 89% तो असमी मुसलमानों के 65% वोट मिले थे। 2026 में यह दोनों धड़े अलग-अलग चुनाव लड़ रहे हैं।

बीजेपी की स्ट्रैटजी साफ थी कि मुस्लिम वोट बांटकर विपक्ष को होने वाले फायदे को घटाया जाए। बीजेपी ने असम के मूल मुसलमानों को भी अपने पाले में करने की कोशिश की। राजनीतिक विश्लेषक डॉ. जयदीप बरुआ के मुताबिक, ‘हिमंता मुस्लिम समुदाय के भीतर दो गुट पैदा करने में सफल रहे हैं। पहले उन्होंने बांग्लादेश से आए ‘मियां मुसलमानों’ को असमी मुसलमानों के लिए खतरा बताया। फिर असमी मुसलमानों को विशेष दर्जा देकर, उन्हें अपने पाले में सुरक्षित कर लिया।’

3. हिमंता बिस्व सरमा की पॉपुलैरिटी और हिंदू वोटों का ध्रुवीकरण

हिमंता बिस्वा सरमा की रैलियों में उमड़ने वाली भीड़ वोट में कन्वर्ट हो गई। उन्होंने बांग्लादेशी घुसपैठ का मुद्दा उठाया। इससे असमी संस्कृति, परंपरा और भाषा को खतरा बताया। उन्होंने दावा किया कि हर हफ्ते 35-40 बांग्लादेशी घुसपैठियों को वापस भेज रहे हैं। इससे हिंदू वोटों में बीजेपी की पकड़ मजबूत होती चली गई।

पॉलिटिकल एक्सपर्ट अदिप फुकन के मुताबिक, असम में पहली बार पूरा चुनाव हिमंता के चेहरे पर लड़ा गया। वे अपने तीखे बयानों से खुद को योगी जैसे कट्टर नेता के तौर पर स्थापित करने में सफल हुए।

अरुनोदोई योजना के तहत बांटे गए करीब 60 लाख कैश और चाय बागान की महिलाओं को एकमुश्त 5000 रुपए जैसी योजनाओं से महिलाओं ने बीजेपी को खुलकर सपोर्ट किया। इसके अलावा 15 लाख घर और 2 लाख नौकरियों के वादे ने भी जनता पर खासा असर डाला।

26 साल से असम में पत्रकारिता कर रहे राजीव दत्ता के मुताबिक, 10 साल सरकार में रहने के बाद भी बीजेपी के खिलाफ राज्य में खास एंटी-इनकम्बेंसी नहीं थी। कुछ सीटों पर पुराने विधायकों से लोग जरूर नाराज थे, लेकिन इससे खास अंतर नहीं पड़ा।

4 मई को चुनावी नतीजे आने के बाद जश्न में झूमते हुए हिमंता।

4 मई को चुनावी नतीजे आने के बाद जश्न में झूमते हुए हिमंता।

4. कांग्रेस के सीनियर नेता बीजेपी में आए

चुनाव से ठीक पहले कांग्रेस के दो सीनियर नेता भूपेन कुमार बोराह और प्रद्युत बोरदोलोई ने बीजेपी जॉइन कर ली। इससे कांग्रेस का अंदरूनी कलह और राजनीतिक कमजोरी सामने आई। सरमा बार-बार कहते रहे कि कांग्रेस के अच्छे नेताओं को बीजेपी में लाना है। कांग्रेस नेता एक शेड्यूल के मुताबिक बीजेपी में शामिल होंगे।

कांग्रेस ने इस बार पूर्व सीएम तरुण गोगोई के बेटे गौरव गोगोई की लीडरशिप में चुनाव लड़ा। एक्सपर्ट्स मानते हैं कि मई 2025 में असम कांग्रेस अध्यक्ष बने गौरव हिमंता के सामने खुद को स्थापित नहीं कर पाए।

असम नतीजों का क्या असर होगा?

पूरे नॉर्थ-ईस्ट में बीजेपी की पकड़ मजबूत होगी: हिमंता पहले ही अरुणाचल प्रदेश, मणिपुर, त्रिपुरा और मेघालय में BJP के विस्तार का काम कर चुके हैं। मेघालय, नागालैंड और सिक्किम में बीजेपी सहयोगी पार्टी है, जबकि मिजोरम में अभी एक छोटी पार्टी है। तीसरी बार असम जीतने का मतलब होगा कि नॉर्थ ईस्ट में उनका ‘हिंदुत्व मॉडल’ स्थापित हो रहा है।

हिमंता की राष्ट्रीय छवि चमकेगी: हिमंता बिस्वा सरमा का कद बढ़ेगा। अभी तक उन्हें नॉर्थ-ईस्ट की ही जिम्मेदारियां और अन्य राज्यों में चुनाव प्रचार का काम दिया गया है। इस जीत के बाद केंद्र में भी उनकी भूमिका बढ़ सकती है।

नॉर्थ ईस्ट में कांग्रेस के अस्तित्व पर संकट: कांग्रेस के सीनियर नेता लगातार बीजेपी में जा रहे हैं। इससे ग्राउंड कैडर और कार्यकर्ताओं में मोटिवेशन कम हो रहा है। ऐसे में नॉर्थ-ईस्ट में फिर से पार्टी को रिवाइव करना मुश्किल होगा।

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राजनीति

Himanta Biswa Sarma elected as NDA leader

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शपथ ग्रहण समारोह में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी, भाजपा के शीर्ष नेतृत्व और एनडीए (NDA) के कई वरिष्ठ नेताओं के शामिल होंगे। हिमंता की ताजपोशी उत्तर-पूर्व में पार्टी की पैठ को और मजबूत करने के रूप में देखी जा रही है।

असम बीजेपी के अध्यक्ष दिलीप सैकिया ने कहा- हम दोपहर तक सरकार बनाने के अपने दावे के बारे में राज्यपाल को सूचित कर देंगे। 12 तारीख को होने वाले शपथ ग्रहण समारोह की तैयारियां चल रही हैं। यह एक ऐतिहासिक पल होगा, क्योंकि पीएम मोदी की उपस्थिति में हिमंता 102 विधायकों के साथ शपथ लेंगे।

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2. कांग्रेस और AIUDF के मुस्लिम वोट बंटे, बीजेपी को फायदा

2021 में कांग्रेस और बदरुद्दीन अजमल की AIUDF ने साथ चुनाव लड़ा था। उन्हें बंगाली मुसलमानों के 89% तो असमी मुसलमानों के 65% वोट मिले थे। 2026 में यह दोनों धड़े अलग-अलग चुनाव लड़ रहे हैं।

बीजेपी की स्ट्रैटजी साफ थी कि मुस्लिम वोट बांटकर विपक्ष को होने वाले फायदे को घटाया जाए। बीजेपी ने असम के मूल मुसलमानों को भी अपने पाले में करने की कोशिश की। राजनीतिक विश्लेषक डॉ. जयदीप बरुआ के मुताबिक, ‘हिमंता मुस्लिम समुदाय के भीतर दो गुट पैदा करने में सफल रहे हैं। पहले उन्होंने बांग्लादेश से आए ‘मियां मुसलमानों’ को असमी मुसलमानों के लिए खतरा बताया। फिर असमी मुसलमानों को विशेष दर्जा देकर, उन्हें अपने पाले में सुरक्षित कर लिया।’

3. हिमंता बिस्व सरमा की पॉपुलैरिटी और हिंदू वोटों का ध्रुवीकरण

हिमंता बिस्वा सरमा की रैलियों में उमड़ने वाली भीड़ वोट में कन्वर्ट हो गई। उन्होंने बांग्लादेशी घुसपैठ का मुद्दा उठाया। इससे असमी संस्कृति, परंपरा और भाषा को खतरा बताया। उन्होंने दावा किया कि हर हफ्ते 35-40 बांग्लादेशी घुसपैठियों को वापस भेज रहे हैं। इससे हिंदू वोटों में बीजेपी की पकड़ मजबूत होती चली गई।

पॉलिटिकल एक्सपर्ट अदिप फुकन के मुताबिक, असम में पहली बार पूरा चुनाव हिमंता के चेहरे पर लड़ा गया। वे अपने तीखे बयानों से खुद को योगी जैसे कट्टर नेता के तौर पर स्थापित करने में सफल हुए।

अरुनोदोई योजना के तहत बांटे गए करीब 60 लाख कैश और चाय बागान की महिलाओं को एकमुश्त 5000 रुपए जैसी योजनाओं से महिलाओं ने बीजेपी को खुलकर सपोर्ट किया। इसके अलावा 15 लाख घर और 2 लाख नौकरियों के वादे ने भी जनता पर खासा असर डाला।

26 साल से असम में पत्रकारिता कर रहे राजीव दत्ता के मुताबिक, 10 साल सरकार में रहने के बाद भी बीजेपी के खिलाफ राज्य में खास एंटी-इनकम्बेंसी नहीं थी। कुछ सीटों पर पुराने विधायकों से लोग जरूर नाराज थे, लेकिन इससे खास अंतर नहीं पड़ा।

4 मई को चुनावी नतीजे आने के बाद जश्न में झूमते हुए हिमंता।

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4. कांग्रेस के सीनियर नेता बीजेपी में आए

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कांग्रेस ने इस बार पूर्व सीएम तरुण गोगोई के बेटे गौरव गोगोई की लीडरशिप में चुनाव लड़ा। एक्सपर्ट्स मानते हैं कि मई 2025 में असम कांग्रेस अध्यक्ष बने गौरव हिमंता के सामने खुद को स्थापित नहीं कर पाए।

असम नतीजों का क्या असर होगा?

पूरे नॉर्थ-ईस्ट में बीजेपी की पकड़ मजबूत होगी: हिमंता पहले ही अरुणाचल प्रदेश, मणिपुर, त्रिपुरा और मेघालय में BJP के विस्तार का काम कर चुके हैं। मेघालय, नागालैंड और सिक्किम में बीजेपी सहयोगी पार्टी है, जबकि मिजोरम में अभी एक छोटी पार्टी है। तीसरी बार असम जीतने का मतलब होगा कि नॉर्थ ईस्ट में उनका ‘हिंदुत्व मॉडल’ स्थापित हो रहा है।

हिमंता की राष्ट्रीय छवि चमकेगी: हिमंता बिस्वा सरमा का कद बढ़ेगा। अभी तक उन्हें नॉर्थ-ईस्ट की ही जिम्मेदारियां और अन्य राज्यों में चुनाव प्रचार का काम दिया गया है। इस जीत के बाद केंद्र में भी उनकी भूमिका बढ़ सकती है।

नॉर्थ ईस्ट में कांग्रेस के अस्तित्व पर संकट: कांग्रेस के सीनियर नेता लगातार बीजेपी में जा रहे हैं। इससे ग्राउंड कैडर और कार्यकर्ताओं में मोटिवेशन कम हो रहा है। ऐसे में नॉर्थ-ईस्ट में फिर से पार्टी को रिवाइव करना मुश्किल होगा।

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